बुधवार, 26 जुलाई 2023

मैं झाँसी नहीं दूँगी

 

बाल नाटक

लेखक-प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव

मैं झाँसी नहीं दूँगी



(महात्मा बुद्ध,बादशाह अकबर,संत कबीर जैसे लोगों ने इस देश को प्रेम प्रौर एकता का संदेश दिया।लेकिन हमारा देश सदियों से गुलाम चला आ रहा था।"सोने की चिड़िया" कहलाने वाले इस देश को अंग्रेजों ने धीरे धीरे अपने चंगुल में कर लिया।अंग्रेजों की गुलामी से छूटने के लिए देश में सन् 1857 में एक बहुत बड़ा गदर छिड़ गया।इसे स्वतंत्रता की पहली लड़ाई भी कहते हैं।इसमें साधारण जनता से लेकर राजाओं और जमींदारों तक ने भाग लिया। सेना में भी फूट पड़ गई और बहुत से सिपाही गदर में सम्मिलित हो गये।ऐसे ही समय में अंग्रेजों ने झाँसी का राज्य अंग्रेजों को देने से इन्कार कर दिया और वे कमर में तलवार बाँध कर लड़ाई के मैदान में कूद पड़ीं।)

 

पात्र:

लक्ष्मीबाई ---- झाँसी की रानी

दीवान    --- झाँसी का दीवान

गौस मोहम्मद---एक तोपची

कुछ अंग्रेज सिपाही और कुछ लक्ष्मीबाई के सैनिक।

दृश्य --1

(स्थान -- झाँसी का राज दरबार।महारानी लक्ष्मीबाई के पति झाँसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो चुकी है।वे बहुत दुःखी मन से बैठी दरबार के एक दीवान से बात कर रही हैं।पास ही में दो चोबदार खड़े हुए हैं।

दीवान--आप इतनी चिन्ता न करें रानी जी।इस संसार में जो आता है उसे एक दिन जाना ही पड़ता है।


लक्ष्मीबाई--दीवान जी, मुझे अपने तीन माह के प्यारे बच्चे के मरने का दुःख नहीं है।और न उस बच्चे के शोक में घुल कर राजा साहब के स्वर्गवासी हो जाने का ही इतना कष्ट है।


दीवान--फिर आपकी चिन्ता किस बात के लिए है ?


लक्ष्मीबाई--इस झाँसी का क्या होगा ?


दीवान--क्यों, अब आप इसकी रानी हैं ।


लक्ष्मीबाई--अंग्रेजों का कुछ भी ठीक नहीं है दीवान जी।यह तो आप जानते ही हैं कि जिस राजा के कोई पुत्र नहीं होता उसका राज्य अंग्रेजी राज्य में मिला लिया जाता है।वे अब झाँसी को भी हड़पना चाहते हैं।


दीवान--लेकिन आपके तो पुत्र है रानी जी।


लक्ष्मीबाई--वह दत्तक पुत्र है--गोद लिया हुआ बालक।पता नहीं क्यों मुझे सन्देह है कि अंग्रेज गवर्नर जनरल का इरादा नेक नहीं है।झाँसी को अपने राज्य में मिलाने के लिए वे किसी बालक को गोद लेने की स्वीकृति नहीं देंगे ।


दीवान--ऐसा नहीं होगा रानी जी।गवर्नर जनरल इतना नीच काम कभी नहीं करेंगे।


लक्ष्मीबाई--(हँसकर) आप बड़े भोले हैं दीवान जी।अंग्रेज कौन सी अनीति नहीं कर रहे हैं।हमारे गुप्तचरों ने सूचना दी है कि उनके खिलाफ बैरकपुर में देशभक्त सिपाही जल्द ही बगावत करने वाले हैं।आप देखियेगा, बगावत की यह आग बड़ी तेजी से सारे देश में फैल कर रहेगी।


दीवान--आपका क्या विचार है ?


लक्ष्मीबाई--इसमें हम कैसे पीछे रह सकेंगे।इस अवसर पर हमें एक होकर देश को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ाना होगा।इसके लिए हम सभी तरह के त्याग और बलिदान करेंगे।

 (सहसा एक सैनिक का एक पत्र लेकर प्रवेश।)


सिपाही--(अभिवादन करके) रानी जी, गवर्नर जनरल का आदमी यह पत्र लेकर आया है।


लक्ष्मीबाई--(पत्र लेकर पढ़ती हैं)आपको कोई बालक गोद लेने की स्वीकृति नहीं दी जाती।झाँसी का राज्य कानून के अनुसार हम अंग्रेजी राज्य में मिलाने जा रहे हैं।आपको पाँच हजार रुपया वेतन दिया जायेगा।आप झाँसी का किला खाली कर दें और शहर में रहें।(लक्ष्मीबाई का मुख क्रोध से तमतमा उठता है)सैनिक, जाओ और सेनापति जी को फौरन भेजो।

 (सैनिक तेजी से जाता है।)


दीवान--यह तो खुले आम हमारी गरदन काटी जा रही है।


लक्ष्मीबाई--मैं अपने जीते जी अंग्रेजों को झाँसी नहीं दूँगी।हमारे पास मुट्ठी भर फौज है तो क्या हुआ, हम आखिरी दम तक अंग्रेजों से लड़ेंगे।

(सेनापति का प्रवेश।)


सेनापति--महारानी की जय !


लक्ष्मीबाई--सेनापति जी, सेना को लड़ाई के लिए तैयार होने का हुक्म दीजिये।किले की हर बुर्जों पर तोपों में गोले रख दिये जायँ।फाटकों पर पूरी सावधानी रहे।हर आने जाने वाले रास्ते पर चौकसी रखी जाय।पूरी झाँसी को सूचना दे दीजिये, सब लड़ाई की तैयारी करें।झाँसी का एक एक बच्चा इस लड़ाई में अपनी बलि देगा।


सेनापति--मैं स्वयं यही निवेदन करने आ रहा था रानी जी।अंग्रेजी फौज ने पहले से ही किले पर घेरा डाल दिया है।


लक्ष्मीबाई--कोई परवाह नहीं।मैं इसी की आशा किये थी।हम खून की आखिरी बूँद तक लड़ेंगे जाइये, फौरन तैयारी कीजिये।


(सब “महरानी लक्ष्मीबाई की जय” बोलते हुए तेजी से जाते हैं लक्ष्मीबाई,दीवान और सेनापति का दूसरी ओर से प्रस्थान।तुरही, नगाड़ों और दौड़ते घोड़ों के टापों की आवाज सुनायी पड़ती है।बड़ा कोलाहल होता है जिसमें अनेक कंठों से “महारानी लक्ष्मीबाई की जय”,“ झाँसी की जय”,“ झाँसी की रानी की जय” की आवाज सुनायी पड़ती हैं।)

दृश्य—2



(स्थान-- झाँसी के किले का एक भाग।युद्ध का कोलाहल सुनायी पड़ता है।जगह जगह लगी हुई तोपें शत्रु की सेना पर आग उगल रही हैं।कभी हाथियों की चिग्घाड़ सुनायी पड़ती है तो कभी घोड़ों की हिनहिनाहट। बीच बीच में बाहर से अंग्रेजी तोप के गोले भीतर आकर धमाके के साथ फूट रहे हैं।झाँसी के वीर सिपाही घायल होकर गिर पड़ते हैं फिर भी हिम्मत करके लड़ने के लिए आगे बढ़ जाते हैं।सिपाहियों की भाग दौड़ के बीच लक्ष्मीबाई और गौस मोहम्मद का प्रवेश।गौस मोहम्मद खून से सराबोर है।)


लक्ष्मीबाई--गौस मोहम्मद, तुम्हारे जैसे तोपची पर झाँसी को गर्व है।तुम्हारी तोप से निकलने वाले गोले बड़े ही निशाने पर पड़ते हैं।उन्होंने अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिये हैं।


गौस मोहम्मद--मैं अपना फर्ज पूरा कर रहा हूँ रानी जी!यह खुदा की मेहरबानी है कि इतने घाव हो जाने के बाद भी मैं पूरी ताकत से अपने मोर्चे पर डटा हुआ हूँ ।


लक्ष्मीबाई--दुश्मन का क्या हाल है ?


गौस मोहम्मद-–(कुछ चिन्तित होकर)यह बात तो सच ही है कि दुश्मनों का पलड़ा हमसे भारी पड़ रहा है।वे तादाद में हमसे कई गुना ज्यादा है।जितने मरते हैं उससे दुगना उनकी जगह लेने के लिए आगे बढ़ाते हैं।लेकिन हमारा

हौसला उनसे कई गुना बढ़ा हुआ है।


लक्ष्मीबाई--गौस मोहम्मद, इन अंग्रेजों ने हिन्दू मुसलमानों में फूट डाल कर पूरे देश को ही निगल जाना चाहा।लेकिन अब हम उन्हें दिखा देंगे कि यह देश सभी जाति और मजहब वालों का है।इसकी रक्षा के लिए एक अपना पसीना

बहायेगा तो दूसरा अपना खून बहाने के लिए तैयार होगा।


गौस मोहम्मद--अंग्रेजी फौज अंधी न हो तो देखेगी कि गौस मोहम्मद के खून का टीका झाँसी के माथे पर लग रहा है।


लक्ष्मीबाई--तुम्हें पाकर मैं धन्य हूँ मेरे भाई|अच्छा अब तुम उधर जाकर देखो।मैं जरा दक्षिण के फाटक पर जा रही हूँ।वहाँ हमें विशेष सावधान रहने की जरूरत है।


(सहसा एक घबड़ाए हुए सैनिक का प्रवेश)


सैनिक--रानी जी, गजब हो गया।किसी विश्वासघाती ने दक्षिणी ओर का फाटक खोल दिया।अंग्रेजी फौज उससे बड़ी तेजी से भीतर घुस रही हैं।


लक्ष्मीबाई--(जरा भी घबड़ाये बिना)अच्छा चलो, मैं उधर ही आती हूँ।

    (सैनिक का प्रस्थान)


गौस मोहम्मद--रानी जी, मेरी एक विनती है।अब हमारे जीतने की कोई आशा नहीं है।आप फौरन किले से बाहर निकल जायँ।


लक्ष्मीबाई-–नहीं,यह नहीं हो सकता।झाँसी की रानी और किले के सिपाही एक साथ हो मरेंगे।


गौस मोहम्मद--समय बहुत कम है।आप मेरा कहा मानिये, देश को आपकी जरूरत है।


लक्ष्मीबाई--और तुम ?


गौस मोहम्मद--मैं यहाँ दुश्मन को तब तक रोके रहूँगा जब तक हमारे ज्यादा से ज्यादा लोग बाहर नहीं निकल जाते।


लक्ष्मीबाई--(आंखों में आंसू भर कर)इसका मतलब कि अपनी कुर्बानी दोगे ?


गौस मोहम्मद--झाँसी को उसकी जरूरत है।(अचानक पास ही एक गोला गिरकर फटता है।)देखिये, आप फौरन जाइये।


( लक्ष्मीबाई दुःखी मन से जाती हैं।गौस मोहम्मद तेजी से दूसरी ओर निकल जाता है।परदा गिरता है।)

दृश्य—3

(स्थान--एक जंगली नाला।लक्ष्मीबाई एक घोड़े पर सवार आती हैं। उनके शरीर के घावों से रक्त बह रहा है।पीठ पर वे अपने पाँच साल के दत्तक पुत्र को बाँधे हुए हैं।साथ में दो सैनिक हैं।रास्ते में एक नाला है जिसे उनका नया घोड़ा लांघ नहीं पाता और अड़ जाता है। उसी समय पीछे से दो तीन अंग्रेज सिपाही पहुँच जाते हैं।)


लक्ष्मीबाई--अच्छा हुआ तुम लोग आ गए।मरने से पहले और दो चारको हमेशा के लिए सुला देने का पुण्य लूट लूँ।


एक अंग्रेज--क्या बोलटा हाय ?


लक्ष्मीबाई---(अंग्रेज सिपाही पर तलवार का भरपूर वार करती हुई)देखो, यह बोलती हूँ।


(वह सिपाही अपनी जगह ढेर हो जाता है।मगर बाकी अंग्रेज सिपाही लक्ष्मीबाई और उनके साथ के सैनिकों पर टूट पड़ते हैं।दोनों ओर से घमासान लड़ाई होती है।रानी के साथ के सिपाही घायल होकर गिर पड़ते हैं।)


एक अंग्रेज--रानी, टुम अब भी गवर्नर जनरल की बाट मान लो।हम टुम्हारा जान बख्श सकटा हाय ।

लक्ष्मीबाई--मुझे अपनी जान नहीं, झाँसी चाहिए।मैं अपने प्राण रहते झाँसी को तुम्हारे हाथों में नहीं देख सकती।


दूसरा अंग्रेज-हा हा हा।टुम बहोट खटरनाक हाय।हम टुम्हें नहीं छोड़ सकटा।


( सब एक साथ लक्ष्मीबाई पर टूट पड़ते हैं।लक्ष्मीबाई वीरता पूर्वक लड़ती हुई अंत में घावों से अचेत होकर गिर पड़ती है।अंग्रेज उन्हें मरा हुआ समझ वापस लौट जाते हैं।थोड़ी ही देर में रानी को होश आ जाता है और वे कराहती हैं।)


एक सिपाही--(घिसट कर रानी के पास होता हुआ)रानी जी, बड़ा अफसोस है कि इस आखिरी वक्त में मैं आपकी कुछ भी मदद करने में लाचार हूँ।


लक्ष्मीबाई--नहीं भाई, मुझे मरने का कोई दुःख नहीं है।यह आत्मा तो अमर है।मैं फिर इसी भूमि पर जन्म लूँगी और अपने देश को स्वतंत्र करा कर रहूँगी।


दूसरा सिपाही--आप धन्य हैं रानी जी ।


( लक्ष्मीबाई के मुँह से टूटे-फूटे शब्द निकलते हैं-“जननी जन्म भूमि तेरी जय हो।"फिर उनके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।धीरे धीरे परदा गिरता है।)

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लेखकपरिचय –


प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव

जन्म-11मार्च,1929 निधन--31जुलाई 2016।

उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में नौकरी।बाल साहित्य की पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।“वतन है हिन्दोस्तां हमारा”“अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का तारा” “मौत के चंगुल में” “एक तमाशा ऐसा भी”आदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें। 

 

बुधवार, 6 अप्रैल 2022

गुड़िया का टेंट

 बाल कविता

 गुड़िया  का टेंट



 

गुड़िया ने एक टेंट मंगाया

बड़े जतन से उसे लगाया l

बिछा के उसमें अपना बिस्तर

पढ़ने लगी कथा एक सुंदर l

 

तभी चूहे ने बेल बजाई

गुड़िया उठकर गेट पे आई l

चूहा बोला बिल्ली  बाहर

मुझको कर लो टेंट के अंदर l



 

गुड़िया बोली यहां से खिसको

तुम तो बस कुतरोगे इसको l

सुनो कथा यदि शांत बैठकर

आ सकते हो टेंट के अंदर ll

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कवि- 


कौशल
  पाण्डेय 

मोबाइल-09532455570

कानपुर के अंकिन गाँव में 3 अगस्त 1956 को पैदा हुए कौशल पाण्डेय हिंदी बाल साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं l1977 से हिंदी की स्तरीय पात्र पत्रिकाओं में लगातार रचनाओं का प्रकाशन lबच्चों बड़ों की अभी तक लगभग 10 किताबें प्रकाशित lदेश की कई संस्थाओं द्वारा प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित l 2016 में आकाशवाणी से सहायक निदेशक राजभाषा पद से अवकाश ग्रहण करने के बाद स्वतन्त्र लेखन l  

 

सोमवार, 17 जनवरी 2022

धूप दिखी तो

 

धूप दिखी तो


 

जाड़े में सूरज दिखते ही

मन करता है नाचूँ गाऊँ।

पार्क से थोड़ी धूप उठाकर

एक छोटे डिब्बे में लाऊं।

 


दादी बाबा के कमरे में

खोल के डिब्बा धूप बिछाऊँ

गजक रेवड़ियां मूंगफली भी

धूप के संग मैं उन्हें खिलाऊँ।


 

बड़ी देर से मेरा शेरू

कूद रहा अपने बोरे पर

धूप में ला कर शेरू को भी

धमा चौकड़ी कुछ कर आऊं।

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हेमन्त कुमार

शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

बारिश में कुहरा छाया है!

 बंधु कुशावर्ती जी से मेरा परिचय लगभग चार दशक से है।मैं उन्हें अभी तक बाल रंगमंच और बाल साहित्य के समीक्षा और आलोचना पक्ष के लिए ही जानता था।लेकिन उनके द्वारा वहाट्सऐप पर भेजी गयी एक बाल कविता पढ़ कर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ।उन्होंने बताया कि उन्होंने यह बाल कविता लगभग बीस साल बाद लिखी है।बंधु जी इन दिनों अपने गाँव गए हुए हैं।यह सम्भवतः उनके गाँव प्रवास का ही असर है जो वहां की प्राकृतिक सुन्दरता से मुग्ध होकर उन्होंने यह प्यारी बाल कविता लिखी ।आप भी बंधु जी की इस रचना का आनंद उठाइये।      

बारिश में कुहरा छाया है!



गज़ब! गाँव में बारिश के दिन।

कुहरा-धुँन्ध भरे  नभ  के दिन।

अजब सुबह कुहरा  छाया  है !

जाड़े  बिना,  धुन्ध   आया  है!

 

पेड़  दिख  रहे  धुँधले - धुँधले !

हरियाली  भी  धुँधली - धुँधली !

खेत   धान  के   धुँधले - धुधले!

प्रकृति हुई सब , धुँधली-धुँधली!

 

सूरज   अभी  नहीं  निकला  है!

दिखता  सब धुँधला-धुँधला  है !

पूरब   में   जो   पीला - धुँधला !

शायद   यह   सूरज  का  गोला !

 


ताक-झाँक की कोशिश में अब !

सूरज   भी   बनने    को   बेढब!

पूरी     ताकत   लगा   रहा    है !

अजमाता  है  सब  के सब  ढब !

 

अब नीला आकाश  दिखा  कुछ!

धुँन्ध  औ' कुहरा भी छँटता कुछ!

प्रकृति-खेत-तरु भी कुछ दिखते!

दूर क्षितिज भी, दिखता  है कुछ !

 

सूरज   में   भी   चमक  बढी़  है।

धमक  धूप   की  भी  छितरी  है!

नभ   में   भी  आये   हैं   बादल!

धुँन्ध  औ'  कुहरे   हुए  बेदखल!

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कविता व चित्र--बंधु कुशावर्ती

परिचय:

० अवध-क्षेत्रीय शहर सुल्तानपुर(उ०प्र०) के सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले मध्यवर्गीय परिवार में 5 अक्टूबर1949 को जन्म।14-15वर्ष की छात्रावस्था से ही लेखन की शुरुआत।मूर्धन्य लेखकों का निरंतर सान्निध्य लाभ।विविध विधाओं में मुख्य-धारा के लेखन-प्रकाशन का पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत सिलासिला।समानांतर ही बाल साहित्य,बाल रंगमंच के बहुविध लेखन व क्रियाकलापों में संलग्न।सांस्कृतिक-साहित्यिक पत्रकारिता से भी सघन-जुड़ाव।बाल-साहित्य विषयक गहन मूल्यांकन व विवेचानापरक साहित्य इतिहास लेखन।समीक्षा-आलोचना केन्द्रित 3 खण्डों की लेखानाधीन शोधकृति।बाल्साहित्यालोचन:अभिनव हस्तक्षेप” प्रकाशित।2014में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा बाल साहित्य पत्रकारिता के लिए “लल्ली प्रसाद पाण्डेय बाल साहित्य पत्रकारिता” सम्मान से समादृत।  

संपर्क:456/247,दौलतगंज,(साजन मैरिज हाल के सामने),डाकघर:चौक,लखनऊ-226003,मोबाइल-08840655314           

 

सोमवार, 16 अगस्त 2021

बाल कहानी -- जंगल में सफाई अभियान

 

बाल कहानी

जंगल में सफाई अभियान



एक बार कानन वन के राजा शेर सिंह ने अपने दरबार में मंत्रियों की सभा बुलाई तो अचानक इस बुलावे पर सभी मंत्रीगणों में आपस में काना-फूसी होने लगी की आखिर बात क्या है।जंगल में तो सब ठीक-ठाक चल रहा है।

           खैर, राजा का बुलावा था तो सभा में जाना तो था ही।सभी मंत्रीगण निर्धारित समय पर सभा में पहुँच गए।

      राजा शेर सिंह भी आकर अपने सिंघासन पर आसीन हुए।उन्होंने एक जोर की दहाड़ मारी और बोलना शुरू किया कि—“आप सभी सोच रहे होंगे कि मैंने अचानक ये सभा क्यों बुलाई?” तो सभा में फिर थोड़ी हलचल मची।

राजा शेर सिंह ने कहा कि – “चिंता की कोई बात नही।बस मेरे मन में एक विचार आया तो सोचा की आप सभी मित्रों के सामने अपनी बात रक्खूं।”

सभी एक दूसरे का मुँह देखने लगे।राजा शेर सिंह ने कहा कि-“देखिये शहर में कितना प्रदूषण फैला हुआ है और उसको रोकने के लिए सरकार पर्याप्त व्यवस्था भी कर रही है।”

शेर सिंह ने एक बार जोर से जम्हाई ली और आगे फिर बोला—“ दूसरी ओर शहरों के विकास के लिए मनुष्य पेड़ों को तो काट ही रहा है साथ ही अपने यहाँ का सारा कचरा लाकर हमारे जंगल के बाहर फेंक रहा है जिससे हमारा जंगल भी प्रदूषित हो रहा है।तो क्यों ना हम भी ऐसी कोई व्यवस्था करें कि हमारा जंगल भी सुरक्षित बचा रहे।”

शेर के चुप होते ही जानवरों में खुसुर-पुसुर शुरू हो गयी।

शेर सिंह फिर से दहाड़ा—“भाई आपस में खुसुर-पुसुर मत करिए।सब एक एक कर बारी-बारी अपने विचार रखिये।”  

राजा शेर सिंह ने अपनी बात आगे बढाई—“लेकिन एक समस्या है।”

“वो क्या?”सभी एक साथ बोले।

  राजा शेर सिंह ने कहा-“ केवल अपना जंगल सुरक्षित रखने से कोई फायदा नहीं होगा।इसके लिए जरूरी है कि हमारे आस-पास के जंगल भी साफ़ सुथरे रहें।इसके लिए हम सबको एकजुट होना पड़ेगा।”

          तब इस जंगल के मंत्री बलवान भालू उठ कर खड़े हुए और बोले-“ इसके लिए हमें क्या करना होगा महाराज?” शेर सिंह ने कहा कि-“हमने एक उपाय सोचा है।क्यों न हम हर जंगल के राजा को इस अभियान के प्रति जागरूक करें।और सभी एक साथ मिलकर इस अभियान को पूरा करें।”

   राजा के इस विचार का सभी ने जोरदार तालियों द्वारा स्वागत किया।

अब समस्या ये थी कि हर जंगल में जाकर वहां के राजा को सूचित कैसे किया जाए? इस काम के लिए झुमरू बन्दर को चुना गया जो जल्दी-जल्दी हर जंगल में जाकर महाराजा शेर सिंह की  ये सूचना सबको  पहुंचा सके। 

झुमरू बंदर ने अगले दिन से ही फटाफट अपना कार्य शुरू कर दिया और तिन चार दिनों में  ही राजा शेर सिंह को सूचित कर दिया कि सभी जंगलों के राजा इसके लिए तैयार हैं।और उन्होंने अपना पूरा सहयोग देने का वादा किया है।यह सुन कर शेर सिंह बहुत प्रसन्न हुए।और इस तरह सभी के सहयोग से कुछ ही समय में कानन वन के साथ ही उसके आस पास के सभी जंगल साफ़ सुथरे होते चले गए।

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लेखिका--पूनम श्रीवास्तव

एक सामान्य गृहणी।देश,समाज,परिवार,प्रकृति को देख उसे अपने अंदर महसूस करके मन में होने वाले मंथन को अक्सर कागज पर कुछ शब्दों का आकार देने की कोशिश करती हैं  …।इन्हीं कोशिशों में कभी कविता,कभी गजल तो कभी गीत बन जाते  हैं। कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं,लेखों के साथ ही बाल कविताओं कहानियों का प्रकाशन।अभी तक बच्चों के लिए एक चित्रात्मक कहानी “रंग बिरंगी दुनिया” प्रौढ़ों के लिए दो किताबें—“चिट्ठी आई” और “अपना धन” प्रकाशित।प्राथमिक स्कूल की कुछ पाठ्य पुस्तकों में भी बच्चों की कहानी और कवितायेँ प्रकाशित।इन्टरनेट पर इनकी  कवितायें,गीत,ग़ज़ल,कहानियां,लेख इनके  ब्लाग पर भी पढ़ी जा सकती हैं।

ब्लाग का पता है;

http://jharokha-jharokha.blogspot.com

 

 

 

रविवार, 11 जुलाई 2021

बदले बदले शहर गांव हैं

 

बिटिया रेवा 

दीदी भैया मम्मी पापा

सुन लो बहुत जरूरी बात

बिना मास्क के कहीं न जाना

चाहे  दिन  हो या हो रात l

 

भीड़ भाड़  से  दूरी  रखना

सदा सफाई पर देना ध्यान

घर से पढ़ना घर से लिखना

घर से ही करो जरूरी काम l

 

बदले बदले शहर गांव हैं

तौर तरीके नए नए

पढ़ने लिखने के ढंग बदले

सीख रहे  हैं खेल  नए  l

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कवि-कौशल  पाण्डेय 

1310 ए, बसंत विहार, 

कानपुर-208021 मोबाइल-09532455570

कानपुर के अंकिन गाँव में 3 अगस्त 1956 को पैदा हुए कौशल पाण्डेय हिंदी बाल साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं l1977 से हिंदी की स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाओं का प्रकाशन lबच्चों बड़ों की अभी तक लगभग 10 किताबें प्रकाशित lदेश की कई संस्थाओं द्वारा प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित l 2016 में आकाशवाणी से सहायक निदेशक राजभाषा पदसे अवकाश ग्रहण करने के बाद स्वतन्त्र लेखन l