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मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

दानव से मानव


दानव से मानव
                                                                                                 प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव

                       वल्लभगढ़ के राजकुमार अक्सर घने जंगल में निकल जाते।उन्हें शिकार का कोई शौक नहीं था।बस,मित्रों के साथ घुड़दौड़ नदियों में तैराकी देखते देखते ऊंचे पेड़ों की चोटियों तक पहुंच जाना।ये ही थे उनके शौक।कोई भयानक जानवर आक्रमण कर बैठता तो उससे भी पीछे न हटते।सबसे बढ़कर अपनी मधुर वाणी और सुन्दर व्यवहार के लिये वे पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे।
   उस जंगल में एक नरभक्षी राक्षस और उसका जादुई महल भी था।पिता ने उससे सावधान रहने के लिये बार बार कहा।पर राजकुमार हंस कर उत्तर देते, मैं उसे पा गया तो चुटकियों में मार गिराऊंगा।
                    एक दिन भालू जैसे एक जंगली जानवर ने अचानक उनके ऊपर हमला कर दिया।राजकुमार ने तुरन्त भाला निकाल लिया।भाला देखते ही वह जानवर भाग निकला।बेहद तेज गति से।राजकुमार उसे पकड़ नहीं पा रहे थे।वह घोड़े की गति से तेज भाग रहा था।एक एक कर सभी पीछे छूट गये।अंधेरा घिर आया। अचानक राजकुमार को उस अंधेरे में चमकता हुआ एक महल दिखाई पड़ा।दीवारों से लेकर कंगूरे तक एक दम जैसे बिजली में नहाया हुआ।उधर वह जानवर भी ना जाने कहां गायब हो गया।राजकुमार को लगा----शायद यही उस नरभक्षी राक्षस का जादुई महल हो।
   राजकुमार अब बुत थक गये थे।वे फ़ाटक के बाहर बने एक चबूतरे पर बैठ गये।सामने चबूतरे पर तीन टोकरियों में ताजे ताजे फ़ल रखे थे।भूख से बेहाल राजकुमार ने एक फ़ल उठा लिया।
    मगर तभी फ़ाटक के पीछे से एक मधुर स्वर सुनाई दिया—“सावधान राजकुमार,यह नरभक्षी राक्षस का महल है।ये जादुई फ़ल हैं।इन्हें खाते ही आप बेहोश हो जाएंगे।तब राक्षस आप को खा जाएगा।मैं दूसरे फ़ल लेकर आती हूं।
   इसी के साथ फ़ाटक का एक पल्ला खुला।एक सुन्दर लड़की थाली में ताजे फ़ल लेकर राजकुमार के पास आई।
    राजकुमार ने पूछा—“तुम कौन हो?
    मैं भी एक राजकुमारी हूं।आप की तरह मुझे भी फ़ंसा कर यहां लाया गया है।जल्दी से फ़ल खा लो।राक्षस के आने का समय हो रहा है।राजकुमारी बोली।
    मेरे बचने का क्या उपाय है?
    बताती हूं,पहले पेट में कुछ डाल लो।
        “तुम अभी तक कैसे बची हो?
वह मुझे अपना मन बहलाने के लिये रखे है।कभी गाने सुनता है कभी मेरा नृत्य देखता है।लेकिन मेरे शरीर को उसने कभी छुआ तक नहीं।महल के कैदखाने में सैकड़ों लोग बंद हैं।जिस दिन इसे बाहर शिकार नहीं मिलता इन्हीं में से किसी एक से अपनी भूख मिटाता है।
 अब तक राजकुमार फ़ल खा चुका था।
देखो आंगन में खड़ा यह ऊंचा पेड़ देखते हो?क्या तुम इस पर चढ़ सकते हो?
राजकुमार हंस कर बोला—“क्या तुम यह कहना चाहती हो कि मैं इस पेड़ पर चढ़ कर अपनी जान बचाऊं?राक्षस वहां नहीं पहुंच पाएगा?
नहीं नहीं---इस पेड़ की चोटी पर एक फ़ल लगा है।वह फ़ल तुम्हारे हाथ में आते ही राक्षस तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।तुम उस फ़ल के जितने टुकड़े करोगे राक्षस के भी उतने टुकड़े होते जाएंगे।
देखो ,कैसे चुटकियों में वो फ़ल तोड़ कर लाता हूं?
राजकुमारी ने टोका—“यह काम इतना आसान नहीं है।पेड़ की एक एक डाल तुम्हें ऊपर चढ़ने से रोकेगी।
तुम उसकी चिंता मत करो।यह कह कर राजकुमार जल्दी से अपने से लिपटती हर डाल को तोड़ता मरोड़ता ऊपर पहुंच गया।क्षण मात्र में उसने फ़ल को तोड़ लिता।
    मगर यह क्या?पेड़ से फ़ल के अलग होते ही पेड़ पर चमकती रोशनी बुझ गई।पूरे महल की चमक गायब हो गई।राजकुमार समझ गया कि पेड़ से अलग होते ही अब इसमें कोई जादुई शक्ति नहीं।अब यह एक साधारण फ़ल मात्र है।
             इसी समय दूर से राक्षस के दहाड़ने की आवाज सुनाई पड़ी।दहाड़ से पूरा जंगल कांप रहा था।वह पागल की तरह भागा चला आ रहा था।
राजकुमार तुम जल्दी से छिप कर अपने प्राण बचाओ।राजकुमारी डर से कांपती हुई बोली।
  राजकुमारी तुम फ़ाटक बंद कर के भीतर जाओ।मैं उसे बाहर देखता हूं ड़रो मत। वह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
      इधर राजकुमार को देखते ही राक्षस गरजा---कौन हो तुम?तुमने कैसे इस फ़ल को तोड़ने का साहस किया?चलो पहले तुम्हें ही अपना निवाला बनाता हूं।
    राक्षस राज,वल्लभगढ़ के राजकुमार का प्रणाम स्वीकार करें।मैं तो आपके पुत्र समान हूं।क्या अपने पुत्र को ही अपना ग्रास बनाएंगे?
    मुझे बातों से मत बहलाओ।यहां का सब कुछ तुमने नष्ट कर दिया।मेरे प्राण भी अब तुम्हारी मुट्ठी में हैं।राक्षस चिल्लाया।
     अच्छा,आप इसी बात से भयभीत हैं?तो लीजिये संभालिये अपने प्राणों को।कहते हुए राजकुमार ने वह फ़ल राक्षस की ओर उछाल दिया।
   राक्षस आश्चर्य से बोला—“अरे तुम्हें अपने प्राणों का भय नहीं। अब अगर मैं तुम्हें मार कर खा जाऊं?
आप ऐसा कर ही नहीं सकते।मैं अब बाहर नहीं आपके हृदय में हूं तात।
        अब राक्षस के चौंकने की बारी थी।आज तक किसी ने उसे इतना आदर नहीं दिया था।न ही राक्षस राज कह कर प्रणाम किया।न तात ही कहा।सब उससे डरते और नफ़रत करते थे।पर यह तो जैसे सचमुच मेरा बेटा बन गया।
    तभी राजकुमार बोले—“मेरे तात कहने का आप बुरा तो नहीं मान रहे हैं?
बिल्कुल नहीं बेटे।दानव के मुख से अचानक निकल पड़ा। उसके भीतर पता नहीं कहां की ममता उमड़ आई।
तात,मैं चाहता हूं कि आपका यह जादुई महल पहले से भी शानदार हो जाए।
वह कैसे?अब तो सब नष्ट हो चुका है।
मेरे ऊपर विश्वास कीजिये।
ऐसा है तो मेरी भी एक इच्छा पूरी कर दो।कहते हैं कन्यादान से सारे पाप धुल जाते हैं।मैं कन्यादान करना चाहता हूं।
राजकुमार और राजकुमारी प्रसन्न हो उठे।वो दानव का मतलब समझ गये।
राजकुमार मैं जन्म से राक्षस नहीं हूं।मेरा नाम नीलमणि है।मेरे नीच कार्यों ने मुझे दानव बना दिया।राजकुमार ने सब समाचार पिता जी को भेज दिया।शुभ घड़ी में वल्लभगढ़ से बारात आई।नीलमणि ने धूम धाम से कन्यादान किया।
   तात,मैं भी दहेज में कुछ मांगना चाहता हूं।
   कहो राजकुमार,मैं तुम्हें दुनिया की हर चीज दूंगा।
     मुझे बस आपसे एक वादा चाहिये।इस जंगल में सैकड़ों मुसाफ़िर राह भटक कर भूख प्यास से मर जाते हैं।अब ऐसा नहीं होना चाहिये। आप यहां उनके खाने पीने और ठहरने का प्रबंध कर दें।इससे आपकी कीर्ति और बढ़ जाएगी।लोग दानव नहीं मानव नीलमणि को याद करेंगे।इससे आपका महल भी पहले की तरह जगमगाने लगेगा।
नीलमणि के हामी भरते ही चमत्कार हो गया।पूरा महल फ़िर पहले की तरह चमकने लगा।
       नीलमणि की आंखों में प्रसन्नता के आंसू छलक आए।वह महाराज से बोला—“राजन,राजकुमार के कारण ही मैं आज फ़िर से मानव बन गया।वरना मैं पता नहीं कब तक दानवों के नीच कर्म करता रहता।
       महाराज बोले—“नहीं नीलमणि,इसके पीछे राजकुमार का नहीं,उनकी वाणी और व्यवहार का हाथ है।इससे इंसान दुनिया में सब कुछ प्राप्त कर सकता है।
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प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव
 11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।31जुलाई 2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन। शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम0ए0।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन मे संलग्न।देश की प्रमुख स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।
          नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित बाल उपन्यास "मौत के चंगुल में " के साथ ही बाल कहानियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र 87 वर्ष की उम्र तक निर्बाध चला।बाल नाटकों का एक संग्रह नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशनाधीन।


बुधवार, 2 अगस्त 2017

इनाम

इनाम
                  लेखिका--मोनिका अग्रवाल 

        
राम एक बहुत शरारती लड़का था।वह अपनी क्लास में बहुत शैतानी करता  और सब बच्चों  को भी बहुत परेशान करता था।उसके पापा ने उसे कई बार समझाने की कोशिश की पर वो हँस कर कहता,मैं जानबूझकर कुछ भी नही करता पापा।बस अपने आप हो जाता है।गुस्से में उसके पापा ने राम की पाकेट मनी बंद कर दी और कहा,"अब कोई भी शिकायत नही आनी चाहिए।
        एक दिन सब बच्चे लाइब्रेरी में अपनी-अपनी पसंद की किताबें पढ़ रहे थे।लाइब्रेरी की नई टीचर देख राम ने सोचा,"मैं इन्हें अब नाराज नहीं होने दूंगा। तभी प्रिंसिपल मैडम ने नई लाइब्रेरियन को बुला लिया।लाइब्रेरी मैम के जाते ही बच्चे, बाल से खेलने लगे।एक बच्चा राम से बोला,"आओ बाल से खेलते हैं।अभी थोड़ी देर में ही ब्रेक हो जाएगी ।मैम को पता भी नहीं लगेगा।
राम ने सोचा," इसमें भला क्या बुराई है ? चलो एक बार खेल लेता हूं।राम के दोस्त ने उसकी तरफ बाल फेंकी।बाल राम के हाथ में आने की जगह सीधे जाकर खिड़की पर लगीबहुत तेज आवाज हुयी ---छन्नाक।खिड़की का शीशा टूट गया।कांच टूटने की आवाज से लाइब्रेरी मैम भाग कर आई।टूटे शीशे पर निगाह जाते ही वो सन्न रह गयींसारे बच्चे भी सहमे खड़े थे 
     
      बस मैम का गुस्सा सातवें असमान परगुस्से में वो सब को डांटने लगीं,"बताओ यह कांच किसने तोड़ा ?सच-सच बताओ।वरना आज मैं किसी को भी ब्रेक में जाने नहीं दूंगी।उनका गुस्सा देख बच्चे और भी डर गए किसी में भी सच बोलने की हिम्मत नहीं थी।इसी बीच राम ने लाइब्रेरियन मैम से कहा ,"मैम!यह शीशा मुझसे टूटा है।और उसने सारी बात बता दी।लाइब्रेरियन क्लास में रखी हुई किताबों की अलमारी की तरफ गई और वहां से एक मोटी सी किताब निकाल कर लायीं।मोटी सी किताब देखते ही राम डर गया।उसे लगा आज उसको बहुत जोर की मार पड़ेगी।इतनी मोटी किताब जो है!तभी लाइब्रेरियन मैम ने उसके हाथ में किताब देते हुए कहा," यह लो! यह तुम्हारा इनाम ! यह शीशा तोड़ने की सजा नहीं है यह सच बोलने का इनाम है।उस दिन राम की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

लेखिका--मोनिका अग्रवाल 
मैं  कंप्यूटर से स्नातकोत्तर हूं।मुझे अपने जीवन के  अनुभवों को कलमबद्ध करने का जुनून सा है जो मेरे हौंसलों को उड़ान देता है।मैंने कुछ वर्ष पूर्व टी वी व सिनेमाहाल के लिए 3 विज्ञापन और गृहशोभा के योगा विशेषांक के लिए फोटो शूट में भी काम किया  है।मेरी कविताएँ वर्तमान अंकुर, हमारा पूर्वांचल में प्रकाशित हुई हैं।वेब पत्रिका "हस्ताक्षर" में भी मेरी कविताओं को स्थान मिला है।साथ ही अमर उजाला, रूपायन,गृहशोभा में मेरी कुछ कहानियों और रचनाओं को भी जगह मिली है।


गुरुवार, 22 जनवरी 2015

आलस्य का फल

           
(चित्र-श्री राजीव मिश्र)
बहुत दिनों पहले की बात है जौनपुर जिले के पास एक छोटा सा गांव था परसरामपुर। इस गांव की आबादी बहुत कम थी। कुल आठ-दस परिवार पूरे गांव में रहे होंगे। इस गांव की मिट्टी उपजाऊ नहीं थी।इसीलिए गांव के लोग मजदूरी
, लुहारी, बढ़ईगीरी आदि अलग-अलग तरह के काम करके अपनी जीविका चलाते थे।
            इसी गांव में रघुनाथ नाम का एक बढ़ई रहता था। रघुनाथ का परिवार बहुत छोटा था। उसके परिवार में केवल उसकी पत्नी और उसका लड़का गोविन्द था।गोविन्द बहुत आलसी स्वभाव का था।वह दिन भर घर में बैठा रहता था कभी कोई काम नहीं करता था।इसी से रघुनाथ और उसकी पत्नी दोनों ही गोविन्द से नाराज रहते थे।रघुनाथ जंगल से लकड़ियां ले आता और उनसे छोटे-छोटे खिलौने बना कर बाजार में बेचने ले जाता।
                        एक दिन रघुनाथ की तबियत कुछ खराब थी। उसकी बाजार जाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी।इसलिए उसने गोविन्द को अपने पास बुलाया और उससे कहा,‘‘अरे गोविन्द! आज मेरी तबियत कुछ खराब है।मैं बाजार नहीं जा पाऊंगा। ऐसा कर कि तू ही बाजार चला जा और ये खिलौने बेचकर चला आ।रघुनाथ की बात सुनकर पहले तो गोविन्द बहुत आनाकानी करता रहा फिर जब रघुनाथ और उसकी पत्नी दोनों ने उसे डांटा तो वह किसी तरह बाजार जाने को तैयार हो गया।
                        गोविन्द जब लकड़ी के सारे खिलौने लेकर बाजार जाने लगा तो रघुनाथ ने उसे पास बुलाकर कहा,‘‘देखो बेटा गोविन्द अब तुम काफी बड़े और समझदार हो गये हो। आज मेरी तबियत खराब है इसलिए मैं तुम्हें बाजार भेज रहा हूं।तुम मेरी दो बातों का ध्यान रखना। पहली बात तो यह कि रास्ते में कहीं पर सोना मत।दूसरी बात यह कि तुम बाजार में किसी अनजान आदमी पर विश्वास करके उसका साथ मत करना।मेरी इन दो बातों का ध्यान रखोगे तो तुम अपने काम में जरूर सफल होगे।
                        गोविन्द ने उस समय तो रघुनाथ की दोनों बातों को बड़े ध्यान से सुन लिया लेकिन घर से निकलते ही वह उन बातों को भूल गया और बहुत आराम से धीरे-धीरे बाजार की तरफ बढ़ने लगा।
                        बाजार परसरामपुर गांव से करीब चार मील दूर था।रास्ते में एक बहुत घना आम का बगीचा भी पड़ता था।परसरामपुर से बाजार जाने वाले लोग बाजार जाते तथा लौटते समय उसी बगीचे में कुछ देर आराम करके तब आगे जाते थे।इसलिए हमेशा वहां पर दस बीस आदमी जरूर ठहरे रहते थे।
                        लेकिन उस बगीचे में ठहरने वालों को एक परेशानी होती थी।उस आम के बगीचे में बन्दर बहुत रहते थे जो जहां पर ठहरने वाले यात्रियों को काफी परेशान करते थे। बन्दर कभी किसी आदमी का खाना उठाकर भाग जाते, कभी किसी आदमी का कपड़ा या और दूसरा सामान लेकर भाग जाते।इसलिए उस बगीचे में ठहरने वाले लोग बड़े सावधान होकर आराम करते थे और प्रायः सोते नहीं थे।बस वहां कुछ देर आराम करके आगे बढ़ जाते थे।
                        गोविन्द भी पैदल चलते-चलते करीब एक घण्टे बाद उसी बगीचे में पहुंचा। बगीचे में पहुंचकर पहले उसने कुएं से पानी लेकर हाथ मुंह धोया फिर घर से लाया हुआ खाना वगैरह खाकर आराम से लेट गया।लेटते ही गोविन्द को नींद आने लगी।उसने सोचा कि क्यों न थोड़ी देर सो लिया जाय ? उसके बाद उठकर थोड़ा तेज चलकर मैं बाजार पहुंच जाऊंगा।बन्दरों से बचने के लिए उसने खिलौने की पोटली अपने सिरहाने रख लिया।गोविन्द तो आलसी था ही।थोड़ी ही देर में वह खर्राटे भरकर सोने लगा।
                        जब गोविन्द खाना खा रहा था उसी समय से आम के पेड़ पर बैठा मोटा बन्दर बड़े ध्यान से उसकी खिलौने की पोटली देख रहा था।उसने सोचा कि जरूर इस पोटली में भी कुछ खाने की चीज होगी।जब गोविन्द सो गया तो वह मोटा बन्दर धीरे से नीचे उतरा और गोविन्द के सिर के नीचे से खिलौने की पोटली लेकर बड़ी तेजी से भागा।मगर गोविन्द तो ठहरा आलसी उसकी नींद सिर के नीचे से पोटली निकल जाने पर भी नहीं खुली।परन्तु वहीं पर आराम कर रहे दूसरे कुछ लोगों ने बन्दर को पोटली ले जाते देख लिया।उन्होंने जल्दी से गोविन्द को हिला कर जगाया और उसे बताया कि उसकी पोटली बन्दर लेकर भागा जा रहा है।अब गोविन्द को होश आया।वह जल्दी से दूसरे लोगों के साथ बन्दर के पीछे लाठी लेकर दौड़ा।लेकिन बन्दर जल्दी से उछल कर पेड़ पर चढ़ गया और आराम से एक डाल पर बैठ गया।गोविन्द खड़ा देखता रहा।
           
(चित्र-राजीव मिश्र)
पेड़ पर बैठे बन्दर को जब पोटली खोलने पर उसमें खाने की कोई चीज नहीं मिली तो वह पोटली के सारे खिलौने उठा-उठा कर फेंकने लगा।कुछ खिलौने जमीन पर गिर कर टूट गये कुछ साबित बच गये।गोविन्द पेड़ के नीचे खड़ा रो रहा था।उसने जब बन्दर को खिलौने फेंकते देखा तो उसे थोड़ा सन्तोष हुआ कि चलो जो साबित खिलौने बचे हैं उन्हें ही बेचकर कुछ पैसा मिल जाएगा।बगीचे में ठहरे आदमियों की सहायता से उसने अपने टूटे तथा साबित दोनों तरह के खिलौनों को इकठ्ठा किया और बेचने के लिए बाजार चला गया।
                        गोविन्द जब खिलौने लेकर बाजार पहुंचा तो उसे काफी देर हो चुकी थी। बाजार में सभी दुकानदारों के सामान बिक चुके थे तथा वे सभी वापस जाने की तैयारी कर रहे थे।गांव से जो लोग सामान खरीदने आए थे वे भी अब वापस जाने की तैयारी कर रहे थे। गोविन्द अपने खिलौने सड़क पर सजाकर करीब एक घन्टे तक बैठा रहा परन्तु उसका कोई भी खिलौना नहीं बिका।गोविन्द को बहुत पछतावा हो रहा था कि बेकार ही बगीचे में सो गया था।अगर वह बगीचे में न सोया होता तो शायद उसका इतना नुकसान भी न होता और उसके सारे खिलौने भी बिक जाते।
                        अभी गोविन्द बैठा यह सोच ही रहा था कि घर चलकर वह अपने पिता को क्या जवाब देगा कि अचानक उसने एक मोटे आदमी को अपनी तरफ आते देखा।मोटा आदमी एक लुंगी और कुर्ता पहने हुए था।उसकी बड़ी-बड़ी मूंछें थीं और देखने में वह कोई बदमाश किस्म का आदमी लगता था।गोविन्द ने उसे अपनी तरफ आते देखा तो डर गया उसने सोचा कहीं ऐसा न हो कि यह आदमी मेरे खिलौने छीन ले।गोविन्द के पास आकर उस आदमी ने बहुत प्यार भरी आवाज में उसे पूछा,‘‘ क्यों बेटा।तुम्हारा अभी एक भी खिलौना नहीं बिक पाया ?
                        उसको इस तरह प्यार से बोलते देखकर गोविन्द को बड़ा आश्चर्य हुआ।उसने तो समझा था कि यह आदमी बड़ा बदमाश होगा।परन्तु यह तो बहुत सीधा आदमी लगता है। गोविन्द ने कहा, ‘‘नहीं बाबू जी।अभी तक मेरा कोई खिलौना नहीं बिका।
                        ‘‘इस पर वह आदमी बोला,ओहो..... बेटा! तब तुम्हें बड़ा दुःख होगा।तुम इतनी मेहनत से बनाकर खिलौने लाए पर अभी तक तुम्हारा एक भी खिलौना नहीं बिक सका। उस आदमी की बात सुनकर गोविन्द की आंखों में आंसू भर आए।वह धीरे-धीरे रोने लगा और मोटे आदमी से उसने जब तक घटी सभी घटनाएं बता दीं।
                        गोविन्द की बात सुनकर मोटे आदमी ने कहा,‘‘ऐसा करो बेटा!तुम ये सारे खिलौने मेरे हाथ बेच दो।मैं तुम्हें इन सारे खिलौनों के बदले में एक हजार रूपये दूंगा।                 एक हजार रूपये------ सुनकर गोविन्द की आंखें आश्चर्य से खुली रह गयीं।उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह आदमी इतने थोड़े से खिलौनों के लिए एक हजार रूपये दे सकता है।गोविन्द ने मोटे आदमी से पूछा, ‘‘आप सचमुच एक हजार रूपये देने की बात कर रहे हैं या मजाक कर रहे हैं ?
                        ‘‘भला मैं क्यों मजाक करूंगा ? अरे तुम्हें खिलौना बेचना है तो मुझे अभी दे दो और तुम यहीं बैठो।पास में ही मेरा घर है वहां जाकर मैं अभी एक हजार रूपये लेकर आता हूं। मोटे आदमी ने गोविन्द से कहा।
                        गोविन्द मोटे आदमी के बहकावे में आ गया। उसकी आंखों के सामने एक हजार रूपये के नोट नाच उठे।उसने सोचा चलो ठीक है मैं यहीं थोड़ी देर इसका इन्तजार करता हू।यह आदमी अभी घर से एक हजार रूपये लेकर आ जाएगा।मेरे पिता जी जब एक हजार रूपये देखेंगे तो वे कितने प्रसन्न होंगे।यह सोचकर गोविन्द ने अपने सारे खिलौने उस आदमी को दे दिए और उससे बोला, ‘‘बाबू जी! आप रूपये लेकर जरा जल्दी आइएगा।क्योंकि मुझे अभी बहुत दूर वापस जाना है।
                        मोटे आदमी ने हॅसते हुए कहा, ‘‘हां! हां! बेटा!मैं बस पन्द्रह मिनट में वापस आ जाऊंगा।लेकिन जब तक मैं वापस न आऊं तुम यहीं बैठे रहना और एक हजार रूपये वाली बात किसी से कहना मत।
                        इतना कहकर मोटा आदमी गोविन्द के सारे खिलौने लेकर वहां से चला गया। इसके बाद गोविन्द वहां बैठकर मोटे आदमी के वापस आने का इन्तजार करने लगा।गोविन्द को वहां बैठे-बैठे करीब बीस मिनट बीत गये और वह आदमी अभी तक वापस नहीं आया। गोविन्द को थोड़ी चिन्ता होने लगी।उसने सोचा कहीं ऐसा तो नहीं कि वह आदमी मुझे धोखा देकर चला गया। फिर उसने सोचा थोड़ी देर और देख लूं तब किसी से उसके बारे में पूछूं। इसके बाद गोविन्द करीब एक घन्टे तक वहां बैठा रहा पर मोटे आदमी को न वापस आना था न वह वापस आया।गोविन्द वहीं बैठकर रोने लगा।जब बाजार के दूसरे दूकानदारों ने उसके रोने का कारण पूछा तो गोविन्द ने रोते-रोते अपने साथ अब तक घटी घटनाएं उन्हें बता दी। उसकी बात सुनकर एक बूढ़े दूकानदार ने गोविन्द को डाटते हुए कहा, ‘‘अरे बेटा! पहली गलती तो तूने यह की, कि रास्ते में आलस्य करके सो गया और तेरे सारे खिलौने बन्दर ने तोड़ दिए।उसके बाद भी तेरी अक्ल ठीक नहीं हुई और तूने यहां आकर एक अन्जान आदमी पर विश्वास कर लिया।और एक हजार रूपये के लालच में अपने सारे खिलौने उसे दे दिए।  बेटा वह आदमी तो बहुत बड़ा ठग है।इस बाजार में बहुत से दूकानदारों को वह अब तक धोखा दे चुका है।
                        बूढ़े आदमी की बात सुनकर गोविन्द जोर-जोर से रोने लगा।उसे अपने पिता जी की बतायी बातें याद आने लगीं।उसे दुःख हो रहा था कि अगर उसने अपने पिता जी की बातें मान ली होती तो इतना नुकसान न होता।गोविन्द को रोते देखकर उस बूढ़े आदमी को दया आ गई।उसने अपने पास से कुछ रूपये निकालकर गोविन्द को दे दिए और उससे बोला, ‘‘बेटा! अब यहां खड़े होकर रोने से कोई फायदा नहीं होगा।तुम ये रूपये लेकर अपने घर वापस चले जाओ।लेकिन आगे से ध्यान रखना कि कभी किसी काम में आलस्य मत करना और अपने माता-पिता की बतायी बातों को हमेशा ध्यान में रखना।
                        गोविन्द को बड़ा पश्चाताप हो रहा था।वह बूढ़े आदमी से रूपये लेकर अपने गांव की तरफ वापस चल पड़ा और उसने निश्चय किया कि अब वह हमेशा अपने माता-पिता की सलाह मानेगा और किसी काम में आलस्य नहीं करेगा।
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डा0हेमन्त कुमार