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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

संगीतकार कोयल

कोयल का गाना सुन बोले
इक दिन भालू दादा
ले लो तुम अब एक पियानो
दाम नहीं कुछ ज्यादा।

भाग के दोनों शहर को पहुंचे
 दूर नहीं था ज्यादा
देख समझ के पसंद किया फ़िर
एक पियानो बाजा।

पैसे लाई थी कम कोयल
दाम थे थोड़े ज्यादा
सिटी बैंक का कार्ड निकाले
फ़ौरन भालू दादा।

जंगल में फ़िर धूम मच गयी
कोयल लाई बाजा
झूम झूम कर कोयल गाती
संगत दें भालू दादा।
000
डा0हेमन्त कुमार


रविवार, 29 नवंबर 2015

सूरज

रोज सबेरे आता सूरज,
हंसता और मुस्काता सूरज,
अंधियारे को दूर भगाकर,
उजियारे को लाता सूरज।
रोज सबेरे--------------।
 
(फ़ोटो-गूगल से साभार)
कभी सुनहली कभी लाल और,
पीली गेंद बनाता सूरज,
रोज सबेरे पूरब में उग,
शाम को पश्चिम जाता सूरज।
रोज सबेरे------------------।
 
(फ़ोटो-गूगल से साभार)
धूप रोशनी गर्मी देकर,
जाड़ा दूर भगाता सूरज,
सतरंगी किरणों से अपनी,
नई छटा बिखराता सूरज।
रोज सबेरे आता सूरज,
हंसता और मुस्काता सूरज।
**********

डा0हेमन्तकुमार

सोमवार, 10 अगस्त 2015

पहले चिट्ठी आती थी

पहले चिट्ठी आती थी
खबरें ढेरों लाती थी
बाबा दादी,नाना नानी
सबके हाल सुनाती थी।
पहले चिट्ठी------------।
बतियाती पापा से पहले
मां को कभी रुलाती थी
गांव की सोंधी मिट्टी के संग
थोड़ा सा गुड़ लाती थी।
पहले चिट्ठी------------।
गांव के मेले गुब्बारे संग
ढेरों कम्पट लाती थी
बाग बगीचों की हरियाली
चिट्ठी में दिख जाती थी।
पहले चिट्ठी आती थी
खबरें ढेरों लाती थी।
000

डा0हेमन्त कुमार

रविवार, 7 जून 2015

बरफ मलाई

बरफ मलाई,बरफ मलाई,
ठंढी मीठी बरफ मलाई।
गर्मी में सबको भाती है,
रंग बिरंगी बरफ मलाई।
बरफ मलाई--------।

गली में टुनटुन घंटी सुन,
दौड़े मुनिया राजू भाई,
फिर सबने हुड़दंग मचाई,
हमको बरफ खिलाओ भाई
बरफ  मलाई----।

घिस घिस करके काका ने फिर,
सबको  मीठी  बरफ   खिलाई,
मुनिया  क्यों  रुठी काका  से,
उसको  खांसी  आती   भाई।

बरफ  मलाई ,  बरफ  मलाई ,
ठंढी   मीठी  बरफ   मलाई ।
000000
डा0हेमन्त कुमार


रविवार, 22 मार्च 2015

चिड़ियों का अनशन (बाल नाटक)

मुख्य पात्र :नट
         नटी
         कोयल
         सोन चिरैया
         जंगल का ठेकेदार
         शांति(ठेकेदार की बेटी)
         तोता,गौरैय्या,बुलबुल,कौवा,बाज,नीलकंठ और कुछ अन्य पक्षी।
                               दृश्य-1
(नक्कारे की आवाज के साथ ही खाली मंच पर एक तरफ़ से नट और दूसरी ओर से नटी नाचते हुए आते हैं।दोनों बीच में रुक कर इधर उधर देखते हैं।नट पीछे दीवाल की ओर मुंह करके खड़ा होता है। नटी दर्शकों की ओर।)
नट-अरे आज कोई हमारी कहानी सुनने नहीं आयेगा?
(नटी अपने माथे पर दो तीन बार हाथ मारती है फ़िर बीच में बैठ जाती है)
नटी- ओफ़्फ़ोह मै तो इस सूरदास से परेशान हो गयी हूं।
नट-क्या हुआ?क्यों चिल्ला रही हो ?
नटी-(गुस्से में) तुम्हें सामने बैठे लोग नहीं दिख रहे?
           (नट उछल कर दर्शकों की तरफ़ मुंह करता है)
नट-अरे—अरे---।
नटी-क्या अरे-अरे कर रहे हो?
नट-ओफ़्फ़ोह—मेरा भी दिमाग पता नहीं कहां घूम गया है।(दर्शकों से)श्रीमान जी आप लोग यहां बैठे हैं और मैंने देखा ही नहीं।माफ़ी चाहता हूं।(नटी का हाथ पकड़ कर)अच्छा अब बहुत देर हो चुकी है चलो नाटक शुरू करते हैं।
         (संगीत शुरू होते हैइ दोनों मंच पर थिरकते हैं)
नट-(गाता है)
            एक घना जंगल था बच्चो
            रहती जहां थी ढेरों चिड़ियां
            चीं-चीं चूं-चूं से ही उनकी
            फ़ैली वहां थी ढेरों खुशियां।
 नटी-(गाती है)       
            पर एक जालिम व्यापारी को
            भाई नहीं थी उनकी खुशियां
            काट-काट सुंदर पेड़ों को
            छीन रहा था उनकी खुशियां।
(मंच के एक सिरे पर नट-नटी गाते रहते हैं।दूसरे सिरे पर जंगल का सेट।दो-तीन मजदूर पेड़ काटते दिखाई पड़ते हैं।पक्षी बने कुछ बच्चे मंच पर इधर-उधर भागते दिखायी देते हैं।)
नट-        
           उन सारी चिड़ियों में बच्चों
           कोयल बुद्धिमान थी सबसे।
नटी-
           बड़े बड़े प्रश्नों को भी वो
           हल करती चुटकी में झट से।
नट-
           कोयल ने इक दिन जल्दी से
           सब चिड़ियों को पास बुलाया।
           कटते जाते पेड़ सभी अब
           उसने सबको समझाया।
          (नट नटी नाचते हुये मंच पर से जाते हैं।दृश्य फ़ेड आउट होता है)
                               दृश्य-2
(जंगल का दृश्य। चिड़ियों की सभा।कोयल एक पेड़ के ऊंचे ठूंठ पर बैठी दिखाई दे रही। उसके एक बगल में गौरैय्या दूसरी ओर नीलकंठ बैठे हैं।बुलबुल,तोता,मैना,बाज,कौवा,सोन चिरैया और कुछ पक्षी सामने बैठे हैं।)
कोयल-(कुहू कुहू करके मीठे स्वरों में)मेरी सभी प्यारी सहेलियों और दोस्तों,मैंने आप सब को आज यहां क्यों बुलाया है ये तो आपको पता ही होगा।ये जालिम व्यापारी लकड़ियां बेच कर पैसे कमाने के लिये इस जंगल के सारे पेड़ों को एक-एक कर काटता जा रहा।
मैना-हां बहना,इस तरह तो वो जंगल के सारे पेड़ काट देगा।
तोता-फ़िर हम लोगों को खाने के लिये फ़ल कहां से मिलेंगे?
कौवा-(कांव कांव करके) लो भाई सुन लो इनकी बात। अरे पहले रहने की जगह बचा लो फ़िर फ़लों के बारे में सोचना।
नीलकंठ- हां अगर सारे पेड़ कट गये तो हम सब रहेंगे कहां?
कबूतर- हमारे नन्हें-नन्हें बच्चे कहां फ़ुदकेंगे?
पेंडुकी- और तो और हम अपने अंडे कहां देंगे?
गौरैय्या- कोयल बहना,बात सिर्फ़ जंगल की नहीं है। आज आदमी तो अपने गांवों,शहरों के भी पेड़ काटता जा रहा। इसी तरह पेड़ कटते रहे तो एक दिन ऐसा भी आएगा कि हमें घोसला बनाने की भी जगह नहीं मिलेगी।
कोयल- आप सब ठीक कह रहे हैं। हमें जंगल के ठेकेदार और उसके आदमियों को पेड़ काटने से रोकना होगा।
मैना-(चिंतित स्वरों में) पर यह काम होगा कैसे?
कोयल-हां मैना बहन,यही जानने के लिये ही तो मैंने आप सभी को आज यहां बुलाया है। कि किस तरीके से हम उन्हें रोकें?
              (कुछ पल के लिये शान्ति)
कौवा-(गुस्से में) मैं उन सभी के ऊपर अपने पंजों से हमला कर दूंगा।
कठफ़ोड़वा- मैं अपनी नुकीली चोंच से मार मार कर उन्हें घायल कर दूंगा।
बाज-(घमण्ड भरे स्वरों में) अरे दोस्तों तुम सब को ये करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।मैं उनके लिये अकेला काफ़ी हूं।मैं पेड़ काटने वालों की आंखें नोच कर उन्हें अंधा कर दूंगा।
(कोयल,मैना,तोता एवं अन्य पक्षी उनकी बात सुनते हैं।कोयल कुछ देर सोचती है)
कोयल-शान्त भाइयों शान्त—इस तरह क्रोधित होने से काम नहीं चलेगा।ये मत भूलो कि मनुष्य हमसे ज्यादा चालाक और ताकतवर है। हम उसे लड़ कर नहीं हरा सकते।
बाज-तो क्या हम हाथ पर हाथ रखे बैठे रहें?और अपना विनाश देखते रहें?
कोयल-नहीं –मैं यह नहीं कह रही। हमें कोई दूसरा रास्ता ढूंढ़ना होगा।
कौवा-(व्यंग्य से)-तो फ़िर तुम्हीं बताओ कोयल रानी।
(कोयल सोचने की मुद्रा में अपने पंजों से सर खुजलाती है फ़िर अपने पंख फ़ड़फ़ड़ाती है।)
सोन चिरैया-(संकोच से) मैं कुछ कहूं कोयल बहना?
कोयल-हां हां—बताओ बताओ—तुम हो तो नन्हीं सी पर तुम्हारा दिमाग सबसे तेज है।
सोन चिरैया-(गाती है)-  चीं चीं चीं चीं
                    चीं चीं चीं चीं
                    याद करें इतिहास जरा हम
                    याद करें बापू की माया
                    गांधी बाबा ने अनशन से
                    गोरों को था दूर भगाया।
                    क्यों ना हम भी मिल कर कोई
                    नई अनोखी राह बनाएं
                    पेड़ों का कटना भी रोकें
                    अपने घर जंगल को बचाएं।
कोयल-(सोचते हुए) बात तो तुम्हारी ठीक है सोन चिरैया।पर हम कौन सा ऐसा रास्ता बनाएं?जिससे व्यापारी की समझ में हम चिड़ियों के दुख और मुसीबतें आ सकें?
सोन चिरैया-(सोचते हुये)बहना—मैंने तरीका सोच लिया है।
कौवा-तो जल्दी बताओ सोन चिरैया---।
सोन चिरैया-सुनो साथियों इन मनुष्यों को हमारी बोली—मधुर स्वर बहुत अच्छी लगती है।अगर हम कुछ समय के लिये चहकना छोड़ कर मौन का व्रत कर लें तो?
कौवा—तो—फ़िर इससे क्या होगा?
कोयल-(खुश होकर)बात तो तुम्हारी ठीक है।पर इससे मनुष्य पेड़ काटना बंद कर देगा?
तोता-पेड़ काटना बंद तो नहीं करेगा—हां वो ये सोचेगा जरूर कि अचानक इन चिड़ियों ने गाना क्यों बंद कर दिया?
कौवा-हो सकता है उसके मन में हमारी तकलीफ़ों की बात भी आ जाय।
नीलकंठ—मैं भी सोन चिरैया की बातों से सहमत हूं।
कोयल-तो दोस्तों आप सभी कल से मौन का व्रत रखने को तैयार हैं?
सारे पक्षी-(समवेत स्वरों में) हां हम सभी तैयार हैं।कल से ही हमारा चहकना बंद।
           (सारे पक्षी अपने घोसलों की ओर जाते हैं।
                           दृश्य-3
(ठेकेदार के घर का बगीचा।कई चिड़िया पेड़ों पर बैठी हैं पर चुप हैं।कोई चहक नहीं रही।शांति हाथ में चावल का कटोरा लेकर आती है।पेड़ के नीचे बिखेरती है।पर कोई चिड़िया चावल चुगने नहीं आती हैं।न ही चहकती है।)
शांति-(अपने आप से बोलती है)-अरे आज इन चिड़ियों को क्या हो गया?कोई पास नहीं आ रही।कल तक तो चिल्ला चिल्ला कर टूट पड़ती थीं चावल के दानों पर।कहीं बीमार तो नहीं?
(ठेकेदार का प्रवेश)
ठेकेदार-अरे शांति तू किससे बातें कर रही?
शांति-(चिंतित स्वरों में)देखिये न बापू—कोई चिड़िया दाना नहीं खा रही—न ही चहक रही।
ठेकेदार-अरे तुझे खिलाना नहीं आता।ये देख अभी सब खायेंगी भी और चहकेंगी भी।
(ठेकेदार एक मुट्ठी में चावल लेकर चिड़ियों की तरफ़ उछालता है।पर कोई चिड़िया पेड़ से नहीं उतरती।ठेकेदार उनकी तरफ़ आश्चर्य से देखता है।)
ठेकेदार-अरे क्या हो गया इन सभी को अचानक?कोई आवाज भी नहीं कर रहीं।कहीं बीमार तो नहीं हो गयीं?
(अचानक ठेकेदार के सामने पहले एक गौरैया फ़िर दूसरी कैइ चिड़िया आकर बैठ जाती हैं।ठेकेदार जमीन पर बैठ कर उनकी तरफ़ ध्यान से देखता है।सबकी आंखों में आंसू।सब सर नीचा किये हैं।शान्ति भी बैठ जाती है।)
शांति-(दुख भरे स्वरों में) अरे बापू ये तो रो रही हैं।---सब की सब---।
ठेकेदार-(परेशान स्वर में) पर इन्हें हुआ क्या है?
 (गौरैया और दूसरी चिड़िया सर उठाती हैं।सब सामने एक कटे हुये पेड़ के ठूंठ की तरफ़ दुखी हो कर देखती हैं।ठेकेदार और शांति भी उधर ही देखते हैं।)
शांति—कहीं इस काटे गये पेड़ पर ही इनका घोसला तो नहीं था?
ठेकेदार—(चिन्तित मुद्रा में) ओह अब समझा---क्यों गुस्सा हैं ये चिड़िया लोग?शांति बिटिया अनजाने में मुझसे बहुत बड़ी भूल हो रही थी।
शांति-(आश्चर्य से) कैसी भूल बापू?
ठेकेदार—(दुखी मन से)बिटिया इसमें गलती इनकी नहीं।मेरी गलती है।मैं ही पैसों के लालच में पेड़ों को कटवा कर इनके घर उजाड़ रहा था।मैं पैसों के पीछे पागल हो गया था।---ओह—ये क्या पाप कर रहा था मैं।इतने पक्षियों के घर छीन रहा था?
  (ठेकेदार खड़ा हो जाता है,उसी के साथ शांति भी। चिड़िया उसी तरह दुखी बैठी हैं)
ठेकेदार-(पश्चाताप से)हे ईश्वर मुझे माफ़ कर दो—अब और नहीं---आज के बाद से मैं किसी चिड़िया का नीड़ नहीं उजाड़ूंगा।कोई पेड़ नहीं काटूंगा---कोई नहीं।(गौरैया को सहला कर) जाओ गौरैया---जाओ चिड़िया—सारे पक्षियों से कह दो अब आज के बाद से कोई पेड़ नहीं कटेगा।
     (शांति आश्चर्य से ठेकेदार को देखती है।कई चिड़िया और गौरैया आकर चीं चीं
     करती हुयी चावल खाने लगती हैं।कुछ उड़ कर जंगल की ओर जाती हैं।)
दृश्य-4
 (जंगल का दृश्य।मधुर संगीत।हरे भरे पेड़ों के बीच ठेकेदार और उसकी बेटी शांति नाचते दिखायी दे रहे।उनके चारों ओर पक्षी बने बच्चे उड़ने का अभिनय कर रहे।)
शांति—(गाती है)
               देखो बापू सुन लो बापू
               बात को पूरी समझ लो बापू।
               जिन पेड़ों को काट रहे थे
               वहीं बसी थीं चिड़ियां सारी
               पर अब उनको मिला अभय जो
               चहक रही फ़िर चिड़िया सारी।
ठेकेदार--        बेटी मैं था गलत राह पर
               सबने सच्ची राह दिखाया
               मुझसे पाप बड़ा था होता
               पर चिड़ियों ने मुझे बचाया।
              (शांति,ठेकेदार गोल घेरे में घूमते हैं।उनके चारों ओर कुछ चिड़िया भी फ़ुदकती घूम रहीं।मंच के एक तरफ़ से नट और दूसरी तरफ़ से नटी भी नाचते हुयी आती हैं और उन्हीं के साथ नाचते हैं।)
नट—(गाता है)        
             मौन रखा सारी चिड़ियों ने
             उसका मीठा फ़ल भी पाया।
नटी—(गाती है)
             खुशहाल किया जंगल को फ़िर से
             मानव को भी मार्ग दिखाया।
              (सभी साथ में गाते हैं)
ठेकेदार--      मौन रखा सारी चिड़ियों ने
             उसका मीठा फ़ल भी पाया।
शांति--        खुशहाल किया जंगल को फ़िर से
             मानव को भी राह दिखाया।
कोरस--      खुशहाल किया जंगल को फ़िर से
            मानव को भी राह दिखाया।
(सब गोल घेरे में घूमते हुये गाते रहते हैं।धीरे धीरे उनका स्वर धीमा होता जाता है। और संगीत के साथ ही प्रकश कम होता जाता है।दृश्य फ़ेड आउट होता है।)
                             000

लेखक--डा0हेमन्त कुमार

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

आलस्य का फल

           
(चित्र-श्री राजीव मिश्र)
बहुत दिनों पहले की बात है जौनपुर जिले के पास एक छोटा सा गांव था परसरामपुर। इस गांव की आबादी बहुत कम थी। कुल आठ-दस परिवार पूरे गांव में रहे होंगे। इस गांव की मिट्टी उपजाऊ नहीं थी।इसीलिए गांव के लोग मजदूरी
, लुहारी, बढ़ईगीरी आदि अलग-अलग तरह के काम करके अपनी जीविका चलाते थे।
            इसी गांव में रघुनाथ नाम का एक बढ़ई रहता था। रघुनाथ का परिवार बहुत छोटा था। उसके परिवार में केवल उसकी पत्नी और उसका लड़का गोविन्द था।गोविन्द बहुत आलसी स्वभाव का था।वह दिन भर घर में बैठा रहता था कभी कोई काम नहीं करता था।इसी से रघुनाथ और उसकी पत्नी दोनों ही गोविन्द से नाराज रहते थे।रघुनाथ जंगल से लकड़ियां ले आता और उनसे छोटे-छोटे खिलौने बना कर बाजार में बेचने ले जाता।
                        एक दिन रघुनाथ की तबियत कुछ खराब थी। उसकी बाजार जाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी।इसलिए उसने गोविन्द को अपने पास बुलाया और उससे कहा,‘‘अरे गोविन्द! आज मेरी तबियत कुछ खराब है।मैं बाजार नहीं जा पाऊंगा। ऐसा कर कि तू ही बाजार चला जा और ये खिलौने बेचकर चला आ।”रघुनाथ की बात सुनकर पहले तो गोविन्द बहुत आनाकानी करता रहा फिर जब रघुनाथ और उसकी पत्नी दोनों ने उसे डांटा तो वह किसी तरह बाजार जाने को तैयार हो गया।
                        गोविन्द जब लकड़ी के सारे खिलौने लेकर बाजार जाने लगा तो रघुनाथ ने उसे पास बुलाकर कहा,‘‘देखो बेटा गोविन्द अब तुम काफी बड़े और समझदार हो गये हो। आज मेरी तबियत खराब है इसलिए मैं तुम्हें बाजार भेज रहा हूं।तुम मेरी दो बातों का ध्यान रखना। पहली बात तो यह कि रास्ते में कहीं पर सोना मत।दूसरी बात यह कि तुम बाजार में किसी अनजान आदमी पर विश्वास करके उसका साथ मत करना।मेरी इन दो बातों का ध्यान रखोगे तो तुम अपने काम में जरूर सफल होगे।”
                        गोविन्द ने उस समय तो रघुनाथ की दोनों बातों को बड़े ध्यान से सुन लिया लेकिन घर से निकलते ही वह उन बातों को भूल गया और बहुत आराम से धीरे-धीरे बाजार की तरफ बढ़ने लगा।
                        बाजार परसरामपुर गांव से करीब चार मील दूर था।रास्ते में एक बहुत घना आम का बगीचा भी पड़ता था।परसरामपुर से बाजार जाने वाले लोग बाजार जाते तथा लौटते समय उसी बगीचे में कुछ देर आराम करके तब आगे जाते थे।इसलिए हमेशा वहां पर दस बीस आदमी जरूर ठहरे रहते थे।
                        लेकिन उस बगीचे में ठहरने वालों को एक परेशानी होती थी।उस आम के बगीचे में बन्दर बहुत रहते थे जो जहां पर ठहरने वाले यात्रियों को काफी परेशान करते थे। बन्दर कभी किसी आदमी का खाना उठाकर भाग जाते, कभी किसी आदमी का कपड़ा या और दूसरा सामान लेकर भाग जाते।इसलिए उस बगीचे में ठहरने वाले लोग बड़े सावधान होकर आराम करते थे और प्रायः सोते नहीं थे।बस वहां कुछ देर आराम करके आगे बढ़ जाते थे।
                        गोविन्द भी पैदल चलते-चलते करीब एक घण्टे बाद उसी बगीचे में पहुंचा। बगीचे में पहुंचकर पहले उसने कुएं से पानी लेकर हाथ मुंह धोया फिर घर से लाया हुआ खाना वगैरह खाकर आराम से लेट गया।लेटते ही गोविन्द को नींद आने लगी।उसने सोचा कि क्यों न थोड़ी देर सो लिया जाय ? उसके बाद उठकर थोड़ा तेज चलकर मैं बाजार पहुंच जाऊंगा।बन्दरों से बचने के लिए उसने खिलौने की पोटली अपने सिरहाने रख लिया।गोविन्द तो आलसी था ही।थोड़ी ही देर में वह खर्राटे भरकर सोने लगा।
                        जब गोविन्द खाना खा रहा था उसी समय से आम के पेड़ पर बैठा मोटा बन्दर बड़े ध्यान से उसकी खिलौने की पोटली देख रहा था।उसने सोचा कि जरूर इस पोटली में भी कुछ खाने की चीज होगी।जब गोविन्द सो गया तो वह मोटा बन्दर धीरे से नीचे उतरा और गोविन्द के सिर के नीचे से खिलौने की पोटली लेकर बड़ी तेजी से भागा।मगर गोविन्द तो ठहरा आलसी उसकी नींद सिर के नीचे से पोटली निकल जाने पर भी नहीं खुली।परन्तु वहीं पर आराम कर रहे दूसरे कुछ लोगों ने बन्दर को पोटली ले जाते देख लिया।उन्होंने जल्दी से गोविन्द को हिला कर जगाया और उसे बताया कि उसकी पोटली बन्दर लेकर भागा जा रहा है।अब गोविन्द को होश आया।वह जल्दी से दूसरे लोगों के साथ बन्दर के पीछे लाठी लेकर दौड़ा।लेकिन बन्दर जल्दी से उछल कर पेड़ पर चढ़ गया और आराम से एक डाल पर बैठ गया।गोविन्द खड़ा देखता रहा।
           
(चित्र-राजीव मिश्र)
पेड़ पर बैठे बन्दर को जब पोटली खोलने पर उसमें खाने की कोई चीज नहीं मिली तो वह पोटली के सारे खिलौने उठा-उठा कर फेंकने लगा।कुछ खिलौने जमीन पर गिर कर टूट गये कुछ साबित बच गये।गोविन्द पेड़ के नीचे खड़ा रो रहा था।उसने जब बन्दर को खिलौने फेंकते देखा तो उसे थोड़ा सन्तोष हुआ कि चलो जो साबित खिलौने बचे हैं उन्हें ही बेचकर कुछ पैसा मिल जाएगा।बगीचे में ठहरे आदमियों की सहायता से उसने अपने टूटे तथा साबित दोनों तरह के खिलौनों को इकठ्ठा किया और बेचने के लिए बाजार चला गया।
                        गोविन्द जब खिलौने लेकर बाजार पहुंचा तो उसे काफी देर हो चुकी थी। बाजार में सभी दुकानदारों के सामान बिक चुके थे तथा वे सभी वापस जाने की तैयारी कर रहे थे।गांव से जो लोग सामान खरीदने आए थे वे भी अब वापस जाने की तैयारी कर रहे थे। गोविन्द अपने खिलौने सड़क पर सजाकर करीब एक घन्टे तक बैठा रहा परन्तु उसका कोई भी खिलौना नहीं बिका।गोविन्द को बहुत पछतावा हो रहा था कि बेकार ही बगीचे में सो गया था।अगर वह बगीचे में न सोया होता तो शायद उसका इतना नुकसान भी न होता और उसके सारे खिलौने भी बिक जाते।
                        अभी गोविन्द बैठा यह सोच ही रहा था कि घर चलकर वह अपने पिता को क्या जवाब देगा कि अचानक उसने एक मोटे आदमी को अपनी तरफ आते देखा।मोटा आदमी एक लुंगी और कुर्ता पहने हुए था।उसकी बड़ी-बड़ी मूंछें थीं और देखने में वह कोई बदमाश किस्म का आदमी लगता था।गोविन्द ने उसे अपनी तरफ आते देखा तो डर गया उसने सोचा कहीं ऐसा न हो कि यह आदमी मेरे खिलौने छीन ले।गोविन्द के पास आकर उस आदमी ने बहुत प्यार भरी आवाज में उसे पूछा,‘‘ क्यों बेटा।तुम्हारा अभी एक भी खिलौना नहीं बिक पाया ?”
                        उसको इस तरह प्यार से बोलते देखकर गोविन्द को बड़ा आश्चर्य हुआ।उसने तो समझा था कि यह आदमी बड़ा बदमाश होगा।परन्तु यह तो बहुत सीधा आदमी लगता है। गोविन्द ने कहा, ‘‘नहीं बाबू जी।अभी तक मेरा कोई खिलौना नहीं बिका।”
                        ‘‘इस पर वह आदमी बोला,“ओहो..... बेटा! तब तुम्हें बड़ा दुःख होगा।तुम इतनी मेहनत से बनाकर खिलौने लाए पर अभी तक तुम्हारा एक भी खिलौना नहीं बिक सका।” उस आदमी की बात सुनकर गोविन्द की आंखों में आंसू भर आए।वह धीरे-धीरे रोने लगा और मोटे आदमी से उसने जब तक घटी सभी घटनाएं बता दीं।
                        गोविन्द की बात सुनकर मोटे आदमी ने कहा,‘‘ऐसा करो बेटा!तुम ये सारे खिलौने मेरे हाथ बेच दो।मैं तुम्हें इन सारे खिलौनों के बदले में एक हजार रूपये दूंगा।”                 एक हजार रूपये------ सुनकर गोविन्द की आंखें आश्चर्य से खुली रह गयीं।उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह आदमी इतने थोड़े से खिलौनों के लिए एक हजार रूपये दे सकता है।गोविन्द ने मोटे आदमी से पूछा, ‘‘आप सचमुच एक हजार रूपये देने की बात कर रहे हैं या मजाक कर रहे हैं ?”
                        ‘‘भला मैं क्यों मजाक करूंगा ? अरे तुम्हें खिलौना बेचना है तो मुझे अभी दे दो और तुम यहीं बैठो।पास में ही मेरा घर है वहां जाकर मैं अभी एक हजार रूपये लेकर आता हूं।” मोटे आदमी ने गोविन्द से कहा।
                        गोविन्द मोटे आदमी के बहकावे में आ गया। उसकी आंखों के सामने एक हजार रूपये के नोट नाच उठे।उसने सोचा चलो ठीक है मैं यहीं थोड़ी देर इसका इन्तजार करता हू।यह आदमी अभी घर से एक हजार रूपये लेकर आ जाएगा।मेरे पिता जी जब एक हजार रूपये देखेंगे तो वे कितने प्रसन्न होंगे।यह सोचकर गोविन्द ने अपने सारे खिलौने उस आदमी को दे दिए और उससे बोला, ‘‘बाबू जी! आप रूपये लेकर जरा जल्दी आइएगा।क्योंकि मुझे अभी बहुत दूर वापस जाना है।”
                        मोटे आदमी ने हॅसते हुए कहा, ‘‘हां! हां! बेटा!मैं बस पन्द्रह मिनट में वापस आ जाऊंगा।लेकिन जब तक मैं वापस न आऊं तुम यहीं बैठे रहना और एक हजार रूपये वाली बात किसी से कहना मत।”
                        इतना कहकर मोटा आदमी गोविन्द के सारे खिलौने लेकर वहां से चला गया। इसके बाद गोविन्द वहां बैठकर मोटे आदमी के वापस आने का इन्तजार करने लगा।गोविन्द को वहां बैठे-बैठे करीब बीस मिनट बीत गये और वह आदमी अभी तक वापस नहीं आया। गोविन्द को थोड़ी चिन्ता होने लगी।उसने सोचा कहीं ऐसा तो नहीं कि वह आदमी मुझे धोखा देकर चला गया। फिर उसने सोचा थोड़ी देर और देख लूं तब किसी से उसके बारे में पूछूं। इसके बाद गोविन्द करीब एक घन्टे तक वहां बैठा रहा पर मोटे आदमी को न वापस आना था न वह वापस आया।गोविन्द वहीं बैठकर रोने लगा।जब बाजार के दूसरे दूकानदारों ने उसके रोने का कारण पूछा तो गोविन्द ने रोते-रोते अपने साथ अब तक घटी घटनाएं उन्हें बता दी। उसकी बात सुनकर एक बूढ़े दूकानदार ने गोविन्द को डाटते हुए कहा, ‘‘अरे बेटा! पहली गलती तो तूने यह की, कि रास्ते में आलस्य करके सो गया और तेरे सारे खिलौने बन्दर ने तोड़ दिए।उसके बाद भी तेरी अक्ल ठीक नहीं हुई और तूने यहां आकर एक अन्जान आदमी पर विश्वास कर लिया।और एक हजार रूपये के लालच में अपने सारे खिलौने उसे दे दिए।  बेटा वह आदमी तो बहुत बड़ा ठग है।इस बाजार में बहुत से दूकानदारों को वह अब तक धोखा दे चुका है।”
                        बूढ़े आदमी की बात सुनकर गोविन्द जोर-जोर से रोने लगा।उसे अपने पिता जी की बतायी बातें याद आने लगीं।उसे दुःख हो रहा था कि अगर उसने अपने पिता जी की बातें मान ली होती तो इतना नुकसान न होता।गोविन्द को रोते देखकर उस बूढ़े आदमी को दया आ गई।उसने अपने पास से कुछ रूपये निकालकर गोविन्द को दे दिए और उससे बोला, ‘‘बेटा! अब यहां खड़े होकर रोने से कोई फायदा नहीं होगा।तुम ये रूपये लेकर अपने घर वापस चले जाओ।लेकिन आगे से ध्यान रखना कि कभी किसी काम में आलस्य मत करना और अपने माता-पिता की बतायी बातों को हमेशा ध्यान में रखना।”
                        गोविन्द को बड़ा पश्चाताप हो रहा था।वह बूढ़े आदमी से रूपये लेकर अपने गांव की तरफ वापस चल पड़ा और उसने निश्चय किया कि अब वह हमेशा अपने माता-पिता की सलाह मानेगा और किसी काम में आलस्य नहीं करेगा।
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डा0हेमन्त कुमार