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रविवार, 11 जुलाई 2021

बदले बदले शहर गांव हैं

 

बिटिया रेवा 

दीदी भैया मम्मी पापा

सुन लो बहुत जरूरी बात

बिना मास्क के कहीं न जाना

चाहे  दिन  हो या हो रात l

 

भीड़ भाड़  से  दूरी  रखना

सदा सफाई पर देना ध्यान

घर से पढ़ना घर से लिखना

घर से ही करो जरूरी काम l

 

बदले बदले शहर गांव हैं

तौर तरीके नए नए

पढ़ने लिखने के ढंग बदले

सीख रहे  हैं खेल  नए  l

००००००



कवि-कौशल  पाण्डेय 

1310बसंत विहार

कानपुर-208021 मोबाइल-09532455570

कानपुर के अंकिन गाँव में 3 अगस्त 1956 को पैदा हुए कौशल पाण्डेय हिंदी बाल साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं l1977 से हिंदी की स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाओं का प्रकाशन lबच्चों बड़ों की अभी तक लगभग 10 किताबें प्रकाशित lदेश की कई संस्थाओं द्वारा प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित l 2016 में आकाशवाणी से सहायक निदेशक राजभाषा पदसे अवकाश ग्रहण करने के बाद स्वतन्त्र लेखन l   

 

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

गांव की पुकार


गांव की पुकार

चल बापू
अब लौट चलें हम
फिर से अपने गांव।

बचपन की यदों की गठरी
खुलने को बेताब
सोंधी माटी दरवज्जे की
क्यूँ खोती अपनी ताब
महुआ टपक रहा सोने सा
पर खो गई उसकी आब।
चल बापू
अब लौट चलें हम
फिर से अपने गांव।


गिल्ली डंडा सीसो पाती
छुटपन के सब संगी साथी
बूढ़ी गैया व्याकुल नजरें
रास्ता रही निहार
खेतों में पसरा सन्नाटा
जैसे चढ़ा बुखार।
चल बापू
अब लौट चलें हम
फिर से अपने गांव।

नीम तले की चौरा माई
बरगद बाबा से अब तो बस
करती ये मनुहार
लौटा लो सारे बच्चों को
जो बसे समुंदर पार।
चल बापू
अब लौट चलें हम
फिर से अपने गांव।


गांव छोड़ते बखत तो तूने
आजी से बोला ही होगा
जल्दी ही आऊंगा वापस
पाती भी भेजा होगा
आजी की पथराई आंखें
तुझको रहीं पुकार
चल बापू
अब लौट चलें हम
फिर से अपने गांव।
00000
डॉ हेमन्त कुमार


बुधवार, 15 अप्रैल 2020

गर्मी आई


(मेरा यह बालगीत अप्रैल 2004 में नेशनल बुक ट्रस्ट की पत्रिका "पाठक मंच बुलेटिन"में प्रकाशित हुआ था)
गर्मी आई


जाड़ा गया लो गर्मी आई,
बरफ मलाई संग ले आई।

दिन छोटे से बड़े हुए अब,
रातें  हो   गईं   छोटी,
बंदर जी ने सिल बट्टे पर,
ठंढाई      है    घोटी।

भालू  भी  क्यों  रहता पीछे,
उसने     ली     अंगड़ाई,
झट  से पहुंचा  नदी  किनारे,
डुबकी    एक      लगाई।

 घोड़े को जब कुछ ना सूझा
उसने  दौड़  लगाई
गधे ने अपने पैर पटक कर
ढेरों  धूल  उडाई।

 जाड़ा  गया  लो  गर्मी आई,
बरफ   मलाई  संग ले आई।
00000
डा0हेमन्त कुमार



मंगलवार, 17 सितंबर 2019

रग्घू काका


रग्घू काका
फोटो:गूगल से साभार 
रग्घू काका चाक पे अपने
बर्तन खूब बनाते
रंग बिरंगे ढेरों खिलौने
दीवाली पर लाते।
रग्घू काका--------।

कभी कोई बच्चा मांगे तो
मोटर कार बनाते
गुड़िया गुड्डे की पूरी
बारात उसे दे जाते।
रग्घू काका--------।
फोटो:गूगल से साभार 
सब बच्चों के प्यारे काका
 गुस्सा नहीं दिखाते
कोई खिलौना टूट गया तो
वो फ़ौरन नया बनाते।

रग्घू काका चाक पे अपने
बर्तन खूब बनाते।
000
डा0हेमन्त कुमार





बुधवार, 28 अगस्त 2019

पिंकी के बिल्ले ---।


पिंकी के बिल्ले ---।

पिंकी के घर दो थे बिल्ले
दोनों बड़े चिबिल्ले।
धमा चौकड़ी सबसे करते
राजू दीपू टिल्ले।

पिंकी पढ़ने जैसे बैठे
बगल में बैठें बिल्ले।
गीत शुरू करती ज्यों पिंकी
नाचें दोनों बिल्ले।

इक दिन पिंकी गयी बाजार
साथ थे उसके बिल्ले।
आगे आगे पिंकी चलती
पीछे पीछे बिल्ले।

पिंकी ने थी टिक्की खाई
रबड़ी दोंनों बिल्ले।
पिंकी रास्ता भूल गयी जब
घर ले आये बिल्ले।
000
डा0हेमन्त कुमार

गुरुवार, 4 जनवरी 2018

जाड़ा

जाड़ा ताल ठोंक जब बोला,
सूरज का सिंहासन डोला,
कुहरे ने जब पांव पसारा,
रास्ता भूला चांद बिचारा।

छिपे सितारे ओढ़ रजाई,
आसमान नहिं दिखता भाई,
पेड़ और पौधे सिकुड़े सहमे,
झील में किसने बरफ़ जमाई।

पर्वत धरती सोये ऐसे,
किसी ने उनको भंग पिलाई,
सुबह हुयी सब जागें कैसे,
मुर्गे ने तब बांग लगाई।

जाड़ा ताल ठोंक जब बोला,
सूरज का सिंहासन डोल॥
000

डा0हेमन्त कुमार

सोमवार, 11 सितंबर 2017

सर्कस से भागा जब भालू----।

सर्कस से भागा इक भालू
साथ में उसके बंदर कालू
भालू के था हाथ में सोटा
सीटी लिये था साथ में कालू।

चौराहे पर जाम दिखा तो
पहुंचे पुलिस बूथ पर दोनों
बंदर सीटी बजा रहा था
सोटा ले के जुट गया भालू।

सारे पुलिस बूथ से भागे
नया दरोगा सबसे आगे
बंदर भालू ने जल्दी से
जाम हटा के सड़क की चालू।
000

डा0हेमन्त कुमार