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रविवार, 5 अगस्त 2012

क्या होता है बादल फटना


      रिमझिम बारिश में भीगना और बारिश के पानी में कागज की नावें चलाना सभी को अच्छा लगता है। ये बारिश हमारी पृथ्वी के लिए, मानव जीवन के लिए बहुत जरूरी है और फायदे मंद भी। इससे हमारी फसलें, नदियों का जल स्तर मौसम सभी कुछ प्रभावित होता है। कभी ज्यादा बारिश हो गयी तो नुकसान भी होता है।
            आज ही आपने अखबारों में पढ़ा होगा कि अपने पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में बादल फ़टने से भारी तबाही हुयी है।बहुत सारे व्यक्तियों की जानें गयी हैं और बहुत से लोग लापता हैं।कई घर,होटल और दूकानें बाढ़ की तेज धार में बह गये हैं।
         आपने कभी सोचा है  कि ये बादल फटना क्या होता है? बादल फटना यूं समझ लीजिये कि किसी छोटी सी जगह पर आसमान से पूरी की पूरी एक नदी का पानी  एकदम से बह उलट तो इसी घटना को बादल फटना कहेंगे। बादल फटने की घटना के बारे में पूरी तरह जानने के लिए हमें ये जानना जरूरी है कि बादल कितनी तरह के होते हैं ?
            बादलों की आकृति, ऊंचाई के आधार पर इन्हें तीन मुख्य वर्गों में बांटा गया है। और इन वर्गो में कुल दस तरह के बादल होते हैं। पहले वर्ग में आते है निम्न मेघ या लो क्लाउड्स।इनकी ऊंचाई ढाई किलोमीटर तक होती है। इनमें एक जैसे दिखने वाले भूरे रंग के स्तरी या स्ट्रेटस बादल, कपास के ढेर जैसे कपासी या क्यूमलस, गरजने वाले काले रंग के कपासी-- वर्षी,(क्यूमलोनिंबस) भूरे काले वर्षा स्तरी  (निम्बोस्ट्रेटस) और भूरे सफेद रंग के स्तरी-कपासी (स्ट्रेटोक्यूमलस) बादल आते हैं। बादलों का दूसरा वर्ग है मध्य मेघ का। इनकी ऊंचाई ढ़ाई से साढे़ चार किलोमीटर तक होती है। इस वर्ग में दो तरह के बादल हैं अल्टोस्ट्रेटस और अल्टोक्यूमलस। तीसरा वर्ग है उच्च मेघों का। इनकी ऊंचाई साढ़े चार किलोमीटर से ज्यादा रहती है। इस वर्ग में सफेद रंग के छोटे-छोटे साइरस बादल, लहरदार साइरोक्यूमलस और पारदर्शक रेशेयुक्त साइरोस्ट्रेटस बादल आते हैं।
बादलों के प्रकार
क्यूमोलोनिंबस बादल 
                            इन बादलों में से कुछ हमारे लिए फायदेमंद बारिश लाते हैं तो कुछ प्राकृतिक विनाश। बादल फटने की घटना के लिए क्यूमोलोनिंबस बादल जिम्मेदार हैं।ये बादल देखने में गोभी की शक्ल  के लगते हैं। ऐसा लगाता है आकाश में कोई बहुत बड़ा गोभी का फूल तैर रहा हो। इनकी लंम्बाई 14 किलोमीटर तक होती है।
            अब आप सोचेंगे कि देखने में इतने सुन्दर बादल कैसे इतनी बारिश एक साथ कर देते हैं। दरअसल जब क्यूमोलोनिंबस बादलों में एकाएक नमी पहुंचनी बन्द हो जाती है या कोई बहुत ठंडी  हवा का झोंका उनमें प्रवेश कर जाता है, तो ये सफेद बादल गहरे काले रंग में बदल जाते हैं। और तेज गरज के साथ उसी जगह के ऊपर अचानक बरस पड़ते हैं। ऐसी बारिश ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में ही होती है।क्यूमोलोनिंबस बादलों के बरसने की रफ्तार इतनी तेज होती है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। यूं समझ लें कि कुछ ही देर में आसमान से एक पूरी की पूरी नदी जमीन पर  उतर आती है। जरा सोचिये कितनी खतरनाक होती है ये बारिश। हमारे पड़ोसी राज्य उत्तराखण्ड के नैनीताल शहर में बादल फटने से अभी तक की आधिकतम बारिश होने का रिकार्ड  24 घण्टों में 509.3 मिलीमीटर का दर्ज है।

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डा0हेमन्त कुमार

मंगलवार, 19 मई 2009

जीवों की निराली दुनिया (भाग -२)

जिस तरह हम आदमियों का स्वभाव,आदतें व रहन सहन अलग-अलग होता है।
उसी तरह इस धरती पर रहने वाले विभिन्न प्रकार के जन्तुओं में भी बहुत सी
भिन्नतायें पाई जाती हैं।आज हम आपको ऐसे ही जन्तुओं में से दो की आदतों के
बारे में बता रहे हैं।
गिलहरी भागे दोनों ओर:
आपने अपने घरों के आस-पास,बगीचों में,पेड़ों की पतली-पतली
टहनियों पर उछलती-कूदती,उतरती-चढ़ती गिलहरियों को जरूर देखा होगा।लेकिन हम जिसके बारे में आपको बताने जा रहे हैं ,वो इन सब आम गिलहरियों से थोड़ा अलग हट
कर है। और इसकी सबसे खास बात तो यही है कि इसे आप अपनी जेब में भी रख सकते हैं।जी हां मैं जिसकी बात कर रहा हूं उसका नाम ही है जेबी गिलहरी।
इसकी दूसरी खासियत यह है कि यह जितनी तेजी के साथ आगे की ओर भागती है ,उतनी ही तेजी से बिना पीछे मुड़े वापिस भी लौट सकती है।

एकता की मिसाल जेलीफ़िश:
आपने अपने घरों में चीनी य गुड़ की तलाश में इधर उधर
भागती चींटियों की लंबी कतार तो जरूर देखी होगी।कितनी अच्छी लगती है ये कतार।
लेकिन यह विशेषता सिर्फ़ चींटियों में ही नहीं पाई जाती है।
समुद्री मछली जेली फ़िश भी इन्हीं चींटियों की ही तरह कतार बना कर चलती हैं।जेली फ़िश मुख्य रूप से अरब सागर में पाई जाती है। ये हजारों की संख्या में एक दूसरे के पीछे आपस में सटी हुई चलती हैं। ऐसा लगता है जैसे चमकती हुई एक लंबी सी जंजीर नीले पानी ले ऊपर तैर रही हो ।
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हेमन्त कुमार

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

विज्ञान---जीवों की निराली दुनिया










बच्चों हमारी इस धरती पर हजारों,लाखों तरह के जीव जंतु रहते हैं. कुछ जमीन पर चलने वाले कुछ पानी में तैरने वाले,हवा में उड़ने वाले या फ़िर जमीन पानी दोनों में रहने वाले.जिस तरह हमारी आदतें,रहन —सहन के ढंग अलग —अलग होते हैं.वैसे ही जानवरों की भी आदतें अलग —अलग तरह की होती हैं.हम आज तुम्हें इन्हीं में से कुछ की मजेदार बातें बता रहे हैं.
सबसे पहले हम बात करेंगे मानीटर छिपकली की.तुम्हारे घरों में दीवालों पर दिखने वाली छिपकली कितनी लम्बी होती है?तुम कहोगे ४ या ५ इंच.लेकिन हम जिस मानीटर छिपकली की बात कर रहे हैं इसकी लम्बाई होती है १० फीट और वजन लगभग १३६ किलोग्राम.चौंक पड़े न पढ़ कर.ये छिपकली इंडोनेशिया के कमोडो द्वीप समूह में पाई जाती है.इसीलिये पूरी दुनिया में इसे कमोडो ड्रैगन कें नाम से जाना जाता है.ये मानीटर छिपकली की ३० प्रजातियों में से एक है.

इसके मुंह में साँपों की तरह दो नोकों वाली जीभ होती है.इंडोनेशिया के आलावा ये अफ्रीका,पश्चिमी एशिया तथा आस्ट्रेलिया में भी पाई जाती है.मादा कमोडो ड्रैगन एक से तीन अन्डे एक बार में देती है.ये चिडियों,रेंगने वाले जीवों मसलन मेढक,काक्रोच,गिलहरी को अपना भोजन बनाती है.
एक मजेदार बात और है.इस छिपकली में कई विशेषताएं साँपों वाली होती हैं.ये साँपों की ही तरह अपने शिकार को समूचा निगलती है.ये जहरीली तो होती ही है.दूसरी छिपकलियों की तरह अपनी दुम भी नहीं गिराती .इन विशेषताओं को देख कर लगता है की साँपों और मानीटर छिपकलियों का परिवार कभी एक ही रहा होगा.

जब साँपों जैसी आदतों वाली छिपकली की बात चल रही है,तो हम तुम्हें साँपों की भी एक खास बात बता देते हैं.हम और तुम किसी गंध या महक को सूंघने के लिए अपनी नाक का इस्तेमाल करते हैं.क्या तुम जानते हो कि सांप किसी चीज को कैसे सूंघता है?सांप किसी चीज को सूंघता है अपनी जीभ से.हाँ,ये बात पूरी तरह सच है.सांप अपनी जीभ से एक तरह की भीनी गंध प्राप्त करते हैं.और इसी से वे शत्रु या अपने जोड़े की पहचान करते हैं.ये अपनी जीभ से हल्की से हल्की गंध को जितनी आसानी से सूंघ सकते हैं उतनी तेज कोई रेंगने वाला जीव नहीं सूंघ सकता.

छिपकली की ही तरह अपने घरों के बगीचों में या पौधों पर दौड़ते गिर्गिटान को तो तुम पहचानते ही हो.ये भी अपने आप में एक अलग तरह का जीव है.इसकी सबसे बड़ी खूबी तो यही है यह जगह के हिसाब से छिपने के लिए अपना रंग बदल लेता है.हरे पत्तों के बीच हरा,कभी गाढा भूरा या लाल.इसमें और भी कई खास बातें हैं.गिरगिट अपनी दोनों आँखों को अलग अलग किसी भी दिशा में घुमा सकता है.यानी दायी आँख से पूरब तो बांयी आंख से पश्चिम में देख सकता है.जब यह अपनी एक आंख खाने की तलाश में ऊपर घुमाता है तो दूसरी से नीचे किसी दूसरे शिकार या दुश्मन की टोह लेता है.मतलब कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना.

इसकी एक आश्चर्यजनक विशेषता और है.ये अपनी लम्बी जीभ को बहुत तेजी के साथ बाहर फेंक कर शिकार के साथ मुंह में खींच लेता है.और तुम्हें मालूम है इस काम में कितना समय लगता है? मात्र ०.०४ सेकेण्ड.अरे भाई इतने कम समय में तो हमारी पलक भी नहीं झपकती.सोचो कितना फुर्तीला होता है ये गिरगिट.

चलते -- चलते हम तुम्हें एक और जीव के बारे में बता देते हैं.इसे आग भी नहीं जला पाती.यह जीव है आस्ट्रेलिया में पाया जाने वाला एक छोटा सा गुबरैला.इसका असली नाम “मरीना अल्ट्राटा” है.इसकी खास बात यह है कि यह लाल दहकते कोयले पर भी रेंग सकता है.लेकिन इन गर्म कोयलों का इसके पैरों पर या इसके शरीर पर कोई असर नहीं होता है.
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हेमंत कुमार