रविवार, 7 मार्च 2010

गोरी गोरी कोयल



कोयल ने जब शीशा देखा
हो गई वह तो बहुत उदास
गोरी मैं कैसे बन जाऊं
सोच के पहुंची वैद के पास।

भालू वैद ने कूट पीस कर
दे दी ढेरों क्रीम दवायें
फ़ीस दवा की कीमत उसने
वसूले पूरे दो सौ पचास।

क्रीम दवायें लगा लगा कर
सुन्दर पंख झड़े कोयल के
तौबा की उसने शीशे से
फ़िर से दौड़ी वैद के पास।

फ़ेंक दवायें क्रीम सभी वह
गुस्से में भालू से बोली
गोरी नहीं है बनना मुझको
रखो दवायें अपने पास।

0000000
हेमन्त कुमार

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

जाड़ा--2


जाड़ा ताल ठोंक जब बोला,
सूरज का सिंहासन डोला,
कुहरे ने जब पांव पसारा,
रास्ता भूला चांद बिचारा।

छिपे सितारे ओढ़ रजाई,
आसमान नहिं दिखता भाई,
पेड़ और पौधे सिकुड़े सहमे,
झील में किसने बरफ़ जमाई।


पर्वत धरती सोये ऐसे,
किसी ने उनको भंग पिलाई,
सुबह हुयी सब जागें कैसे,
मुर्गे ने तब बांग लगाई।

जाड़ा ताल ठोंक जब बोला,
सूरज का सिंहासन डोल॥
000
हेमन्त कुमार


गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

गुडिया घर


गुड़िया का ये न्यारा घर,
उसको सबसे प्यारा घर।
झाड़ पोंछ कर इसको रखती,
चंदा सा उजियारा घर।

नीली पीली पन्नी लेकर,
हमने बहुत संवारा घर।
धूल न इस पर पड़ने दी है,
हमने रोज बुहारा घर।

आओ सब मिल खेलें इसमें,
ये मेरी गुड़िया का घर।
इसमें मेरी गुड़िया रहती,
ये है प्यारा गुड़िया घर।
000
कवि---डा0 अरविन्द दुबे
पेशे से बच्चों के चिकित्सक डा0 अरविन्द दुबे के अन्दर बच्चों को साधने (हैण्डिल करने),उनके मनोभावों को समझने,और रोते शिशुओं को भी हंसा देने की अद्भुत क्षमता है। उनकी इसी क्षमता ने उन्हें लेखक और कवि भी बना दिया। डा0 अरविन्द कविता ,कहानी के साथ हिन्दी में प्रचुर मात्रा में विज्ञान साहित्य भी लिख रहे हैं।
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

जाड़े के दिन


देखो आये जाड़े के दिन
आलू भरे पराठों के दिन
धूप गुनगुनी मन ललचाए
गिल्ली डंडा हाकी के दिन।
देखो आए----------------।

स्वेटर कोट रजाई के दिन
भुनती आलू घुंघरी के दिन
सुबह शाम सन्नाटा छाए
दिन भर सैर सपाटे के दिन।
देखो आये------------------।

तपनी हुक्का बिरहा के दिन
गुड़मुड़ हो बतियाने के दिन
पीली सरसों मन को भाये
छोटे अपने साये से दिन
देखो आये जाड़े के दिन।
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हेमन्त कुमार

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

दाने चुन चुन खाना रे


चिड़िया के दो बच्चे थे।पिंकू और चिंकू। आज वे उड़ने के लिये पहली बार घोसले से बाहर निकले थे। मां उनके पीछे थी।दोनों ने पेड़ से नीचे झांका।
“ऊं—हूं मैं नहीं उड़ूंगा।मुझे डर लग रहा है।” पिंकू चूं चूं कर बोला।
“ बाप रे---कितनी उंचाई पर रहते हैं हम।” चिंकू ने मां से कहा।
“बच्चों कोशिश करो।उड़ने लगोगे।” चिड़िया ने उन्हें प्यार से समझाया।दोनों ने एक साथ पंख फ़ैलाया। नीचे की डाली पर आ गये। चिड़िया भी उनके साथ आई।सामने वाले पेड़ पर बैठा बंदर जामुन खा रहा था। दोनों को देखकर खी खी हंस पड़ा।
“बच्चों सावधानी से,कौवों से बच कर उड़ना।” बंदर ने उन्हें समझाया।
पिंकू चिंकू ने दुबारा पंख फ़ैला कर उड़ने की कोशिश की।पिंकू तो उड़कर नीचे की डाली पर बैठ गया। चिंकू पत्तियों से टकराकर नीचे गिर पड़ा। उसे चोट तो नहीं लगी पर दिल अभी तक धक धक कर रहा था।चिड़िया के साथ एक कोयल भी चिंकू के पास आई। बंदर भी कूद कर उनके पास आ गया।
“बेटा चोट तो नहीं आई?” कोयल ने उसे पुचकार कर कहा।
“नहीं---पर अब मैं नहीं उड़ूंगा ड़र लग रहा है।”चिंकू चूं चूं कर रोने लगा।कोयल ने एक जामुन का टुकड़ा उसके मुंह में डाला। चिंकू खुश हो गया।
पिंकू चिंकू फ़िर उड़े।इस बार नीचे से ऊपर की ओर। नीम की नीची डाली पर दोनों बैठ गये।“बहुत खूब।”नीम के कोटर से झांकता तोता टांय टांय कर बोला।बच्चों का हौसला बढ़ गया।
दोनों ने फ़िर पंख फ़ैलाये।इस उड़ान में वे नीम की एक ऊंची डाल पर बैठ गये। कुछ देर रुक कर पिंकू बोला,“चलें फ़िर उड़ें?”
“गिर गये तो?”चिंकू अभी भी डर रहा था।
“घबराओ मतअम सब तुम्हें बचायेंगे।”जंगली मुर्गे ने बांग लगाई।वह बरगद की ऊंची डाल पर बैठा इनकी बातें सुन रहा था।
चिंकू पिंकू ने फ़िर पंख फ़ैलाया और उड़ान भरी। अब दोनों का डर दूर हो गया।

दोनों ने नीम का एक चक्कर लगाया।फ़िर दूसरा।फ़िर कई चक्कर।
अचानक एक कौवा उन पर झपटा।पिंकू तो नहीं डरा।पर चिंकू चिल्लाया।मुर्गे और कोयल ने कौवे को चोंच से घायल कर भगा दिया।
पिंकू चिंकू फ़िर उड़ने लगे।दोनों को उड़ता देख कर बंदर किलकारियां भर कर नाचने लगा।जंगली मुर्गा जोर जोर से बांग देने लगा।कोयल कुहू कुहू कर गीत गाने लगी।पिंकू चिंकू का हौसला बढ़ा।वे देर तक उड़ते रहे।कोयल के साथ मुर्गा,बंदर,चिड़िया सभी गाते रहे -------

पहले पंख फ़ैलाना रे
पंख हिलाते जाना रे
उड़कर नीचे आना रे
दाने चुन चुन खाना रे।
पहले पंख------------।
000
हेमन्त कुमार


शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

सिंहराज को चढ़ा बुखार


सिंहराज को चढ़ा बुखार
टेम्प्रेचर था एक सौ चार
दर्द हुआ फ़िर पेट में भारी
समझ न पाये वे बीमारी।

धीरे धीरे सिर चकराया
सिर चकराते मन घबराया
वैद्य राज हाथी फ़िर आये
जड़ी बूटियां ढेरों लाये।

रात कौन सी दावत छानी
कहां पिया फ़िर तुमने पानी
सच सच तुम बतलाना भाई
सुनी बात तब डांट लगाई।

गंदा खाना --- गंदा पानी
क्यों करते ऐसी नादानी
अगर चाहते सुख से जीना
अच्छा खाना --- अच्छा पीना।
0000
कवि –कौशल पाण्डेय
हिन्दी अधिकारी
आकाशवाणी,शिवाजीनगर
पुणे—411005


शनिवार, 14 नवंबर 2009

फरियाद


काली कोट में लाल गुलाब,
चाचा तुमको करते याद,
बाल दिवस हम संग मनायें,
बस इतनी सुन लो फ़रियाद।

बचपन क्यों अब रूठा रहता,
हर बच्चा क्यों रोता रहता,
आओ चाचा नेहरू आओ,
सारे जहां को तुम बतलाओ।

खेल खिलौने साथ छीन कर,
क्यूं सब हमें रुलाते हैं,
भारी बस्तों और किताबों,
में हमको उलझाते हैं।

क्या हमने कुछ गलत किया है,
जिसकी हमको सजा मिली है,
प्यारे थे सब बच्चे तुमको,
सुन लो इनकी ये फ़रियाद।

आओ चाचा नेहरू आओ,
जन्म दिवस हम संग मनाओ।
000
पूनम