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मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

नदी

सिर  से  उतर  पहाड़  के  बहती  जाए नदिया।
बिना   रुके   मैदानों   में  चलती  जाए नदिया।

गीत    सुनाते   हंसते-गाते,
उसको  आगे  तक  जाना है
रास्ते  में  जो भी मिल जाए
सबकी   प्यास   बुझाना  है

कल-कल करती कभी न थकती, बहती जाए नदिया।
बिना   रुके   मैदानों  में  चलती  जाए  नदिया।

थोड़ी  देर अगर  तुम ठहरो
मैं  भी  चलूं  तुम्हारे  साथ
नहीं  रुकूंगी  ना-ना   भैया
बोली  नदी  हिला  कर हाथ

समय है कम और दूर है जाना कहती जाए नदिया।
बिना  रुके   मैदानों   में  चलती  जाए  नदिया।
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गीतकार-डा0 अरविन्द दुबे
*पेशे से चिकित्सक एवम शिशु रोग विशेषज्ञ डा0 अरविन्द दुबे बाल एवम विज्ञान साहित्य लेखन के क्षेत्र में एक चर्चित एवम प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं।अरविन्द जी की अभी तक बाल साहित्य और विज्ञान साहित्य की लगभग दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।


बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

घमंडी का सिर नीचा

तेज-तेज   जो   चली  हवा,
लगी   सोचने   वह   ऐसा।

मुझमें   बहुत   बड़ी  ताकत,
मुझमें   है   इतनी  हिम्मत।
चाहूं  जड़  से  पेड़  उखाडूं,
चाहूं जिसको  दूर उडा दूं।

तभी  मिला  उसे छोटा पत्थर,
बोला  हवा  से  ऐसे हंसकर।
आओ मुझ  पर जोर लगाओ,
मैं  न  हिलूंगा  मुझे उड़ाओ।

बहुत  हवा  ने  जोर  लगाया,
मगर न वह पत्थर हिल पाया।
और  हवा  ने  तब ये सीखा,
सदा  घमंडी  का  सिर नीचा
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डा0अरविन्द दुबे
पेशे से बच्चों के चिकित्सक डा0 अरविन्द दुबे के अन्दर बच्चों को साधने (हैण्डिल करने),उनके मनोभावों को समझने,और रोते शिशुओं को भी हंसा देने की अद्भुत क्षमता है। उनकी इसी क्षमता ने उन्हें लेखक और कवि भी बना दिया। डा0 अरविन्द कविता ,कहानी के साथ हिन्दी में प्रचुर मात्रा में विज्ञान साहित्य भी लिख रहे हैं।