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शनिवार, 23 मई 2020

एक गिलहरी


एक गिलहरी
बड़े सबेरे मेरे आंगन
एक गिलहरी आती
किट किट कुट कुट
किट किट कुट कुट
अपने दांत बजाती।

उसी समय सारी गौरैया
चूं चूं करती आती
नहीं दिया क्यूं दाना पानी
फ़ुदक फ़ुदक सब गातीं।

झुंड कई चिड़ियों का भी
अपने संग वो लातीं
ढकले में पानी पड़ते ही
सब मिल खूब नहाती।

चावल के दाने मिलते ही
बड़े प्रेम से खातीं
शाम को फ़िर आयेंगे हम सब
कह कर के उड़ जातीं।
0000

डा0हेमन्त कुमार

मंगलवार, 10 मई 2016

कहां छुपे हो बादल भैय्या----।

सूखी धरती सूखी नदियां
सूख गये सब ताल तलैया
हवा में उड़ते पाखी चीखे
अब तो गुस्सा छोड़ो भैय्या।
कहां छुपे हो बादल भैय्या।

आग उगलती हवा में देखो
जीव सभी अब झुलस रहे हैं
थोड़ी दया करो अब सब पर
छाया थोड़ी कर दो भैय्या।
कहां छुपे हो बादल भैय्या।

टप टप करता गिरे पसीना
पर्वत जंगल चैन कहीं ना
सूरज से समझौता कर लो
बारिश थोड़ी कर दो भैय्या।
कहां छुपे हो बादल भैय्या।
000

डा0हेमन्तकुमार

मंगलवार, 30 जून 2015

पानी है कितना अनमोल

                                                                       
      
       
हम पानी को खूब बहाते
बूँद-बूँद भर लाते लोग
जितना दिन भर खर्च करें वे
उतना नहा बहाते हम
हम पानी को खूब बहाते।


हमको घर बैठे मिल जाता
पाइप के रस्ते से आता
मीलों चलकर गागर भर भर
पानी लेकर आते लोग
हम पानी को खूब बहाते।

सोचो बच्चो तुम भी सोचो
ये पानी कितना अनमोल
इसे बचा कर रखना हमको
जिसको व्यर्थ बहाते लोग
हम पानी को खूब बहाते।
000
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गीतकार-सुधाकर अदीब
हिन्दी साहित्य के स्थापित कथाकार सुधाकर अदीब जी की अब तक दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।आपकी प्रमुख पुस्तकें हैं--अथ मूषक उवाच,चींटे के पर,हमारा क्षितिज,मम अरण्य,शाने तारीख़,रंग राची(उपन्यास)/मृगतृष्णा, देहयात्रा,उजाले अँधेरे,पगडण्डी (कहानी संग्रह)/हिन्दी उपन्यासों में प्रशासन (आलोचना)/अनुभूति, संवेदना, जानी जग की पीर , हथेली पर जान (काव्य संग्रह)।अदीब जी एक अच्छे साहित्यकार,गीतकार और गायक होने के साथ ही एक बेहतरीन इन्सान हैं।आजकल मीराबाई के जीवन पर एक नया उपन्यास लिख रहे हैं।संप्रति:निदेशक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,लखनऊ। 



सोमवार, 17 मार्च 2014

ऐनक-----।

बाबा जी की ऐनक देखो
कितनी प्यारी ऐनक
खबर पढ़ाती बाबा जी को
दिल्ली से लंदन तक।

बाबा जी की पतली है पर
दादी की मोटी ऐनक
क्यों मेरे नाना नानी जी भी
नहीं लगाते ऐनक।

चाचा चाची मामा मामी
सबकी काली ऐनक
पर मेरे मम्मी पापा की
रंग बिरंगी ऐनक।

मैं भी जब मेले जाती हूं
लाती सुंदर ऐनक
पर शीशे की नहीं है होती
पन्नी की मेरी ऐनक।
000

नित्या शेफ़ाली

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

घमंडी का सिर नीचा

तेज-तेज   जो   चली  हवा,
लगी   सोचने   वह   ऐसा।

मुझमें   बहुत   बड़ी  ताकत,
मुझमें   है   इतनी  हिम्मत।
चाहूं  जड़  से  पेड़  उखाडूं,
चाहूं जिसको  दूर उडा दूं।

तभी  मिला  उसे छोटा पत्थर,
बोला  हवा  से  ऐसे हंसकर।
आओ मुझ  पर जोर लगाओ,
मैं  न  हिलूंगा  मुझे उड़ाओ।

बहुत  हवा  ने  जोर  लगाया,
मगर न वह पत्थर हिल पाया।
और  हवा  ने  तब ये सीखा,
सदा  घमंडी  का  सिर नीचा
0000
डा0अरविन्द दुबे
पेशे से बच्चों के चिकित्सक डा0 अरविन्द दुबे के अन्दर बच्चों को साधने (हैण्डिल करने),उनके मनोभावों को समझने,और रोते शिशुओं को भी हंसा देने की अद्भुत क्षमता है। उनकी इसी क्षमता ने उन्हें लेखक और कवि भी बना दिया। डा0 अरविन्द कविता ,कहानी के साथ हिन्दी में प्रचुर मात्रा में विज्ञान साहित्य भी लिख रहे हैं।



गुरुवार, 10 जनवरी 2013

चुहिया अलबेली


चुनमुन चुहिया थी अलबेली
रहती थी वो बिल में अकेली
रोज सुबह जल्दी उठ जाती
झटपट सारे काम निपटाती।

पास पेड़ पर रहता कौवा
तन का काला मन का गंदा
कांव कांव कर खाता कान
और न था उसको कोई काम।

देख देख चुनमुन को जलता
मुंह बना कर हरदम कहता
बड़ी सयानी चुहिया रानी
करती क्यूं हरदम मनमानी।

एक दिन आई जो आंधी
टपके नीचे कौवा भाई
हाय हाय कर लगे चिल्लाने
कोई न आया पास बचाने।

आई दौड़ के चुनमुन चुहिया
दिया दिलासा पोंछा घाव
ठण्ढा पानी तुरत पिलाया
और खिलाया  भाजी पाव।

आंसू भरकर बोला कौवा
मुझको माफ़ करो तुम बहना
तुम तो सच में हो अलबेली
मैं ही था मूरख नादान।
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शिखा दुबे
रेडियो,टी0वी0 की कलाकार एवं ऐंकर शिखा जी एक अच्छी कवियत्री भी हैं। यहां उनका एक रोचक बालगीत प्रकाशित करते हुये खुशी हो रही है।