सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

नन्हें चित्रकार

नन्हें बच्चों की अपनी दुनिया होती है।उनकी अपनी कल्पनाएं होती हैं।उनकी अपनी सोच होती है और किसी चीज को देखने परखने का नजरिया भी एकदम अनोखा होता है।जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। आज मैं यहां ऐसे ही कुछ नन्हें मुन्ने चित्रकारों के खुद के बनाए चित्रों को प्रदर्शित कर रहा हूं।जरा आप भी देखिये इन चित्रों में इन बच्चों ने अपनी किन कल्पनाओं को रंगों के माध्यम से साकार किया है।



चित्रकार- 
       
धान्या यादव
कक्षा-नर्सरी
सेण्ट डोमिनिक सेवियो कालेज
लखनऊ


चित्रकार
       
चैतन्य शर्मा।
इनकी उम्र मात्र 6 साल है।राजस्थान में इनका घर है।चित्र बनाना इनका प्रिय शौक है।इनका अपना एक ब्लाग भी हैचैतन्य का कोना।जिसे आप इस लिंक पर देख पढ़ सकते हैं।-- http://chaitanyakakona.blogspot.com



चित्रकार-
       
मौलिक यादव
कक्षा-2 ए
सेण्ट डोमिनिक सेवियो कालेज
लखनऊ













चित्रकार-
       
खुशबू
कक्षा-4
सरोज शिक्षा मान्टेसरी स्कूल
लखनऊ





गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

कीड़े खाने वाले पौधे

        आप ये तो जानते ही होंगे कि पेड़-पौधों का भोजन पानी और खाद है।लेकिन क्या आपको पता है कि कुछ पेड़-पौधे इन्सेक्ट्स ईटिंग प्लांट्स (कीटभक्षी) भी होते हैं।यानि मिट्टी में पनप रहे कीडे-मकोड़ों को अपना आहार बनाते हैं।
      दरअसल ये पौधे दलदली जमीन पर उगते हैं।दलदली जमीन पर नाइट्रोजन बहुत कम मात्रा में पाई जाती है इसलिये मिट्टी से पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन न मिल पाने के कारण ये पौधे अपने लिये प्रोटीन नहीं बना पाते।यही कारण है कि यह अपना भोजन कीड़े-मकोड़ों को बनाते हैं।
       
फ़्लाईट्रैप(चित्र-गूगल से साभार)
विश्व में कीड़े खाने वाले पौधों की लगभग 400 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं।
वीनस या फ़्लाईट्रैप प्रजाति के कीटभक्षी पौधों का भोजन करने का अंदाज़ काफ़ी दिलचस्प होता है। वीनस की ऊपरी सतह पर छोटे-छोटे बाल उगे होते हैं, जैसे ही कोई कीड़ा इन पौधों की पत्तियों के बालों से छू जाता है, वैसे ही पत्ती किताब की तरह बंद हो जाती है।कुछ ही सेकेंड्स में कीड़े का दम घुट जाता है।जानते हो यह पौधा कीड़े को पचाता कैसे है?जब कीड़ा पत्ती के अंदर बंद हो जाता है,उसी समय पत्ती की ऊपरी सतह में मौजूद ग्लैंड्स (ग्रंथियां) कीड़े के मुलायम हिस्से को पचा लेती हैं।इस पूरे काम में सिर्फ़ एक सेकेंड लगता है। एक सेकेंड के बाद ही पत्ती खुल जाती है और कीड़े मृत शरीर को नीचे फ़ेंक देती है।
           
ड्रासेरा(चित्र-गूगल से साभार)
सनड्यू
या ड्रासेरा भी इसी तरह का पौधा होता है,जिसकी लंबाई आठ से बीस सेंटीमीटर तक होती है।इस कीटभक्षी पौधे की पत्तियों से चिपचिपा पदार्थ निकलता रहता है।यह पदार्थ ओस की तरह दिखता है,जिसमें से बहुत तेज़ महक निकलती है।इस महक से कई कीट-पतंगे पौधे की ओर खिंचे चले आते हैं। लेकिन पत्ती पर बैठते ही कीट-पतंगे उसमें चिपक जाते हैं।उसी समय पौधे में निकले रोएं कीड़ों को अपनी चपेट में ले लेते हैं।इस चिपचिपे पदार्थ में एंजाइम होते हैं,जो कीड़े के शरीर से नाइट्रोजन सोख लेते है। कीड़े के शरीर से रस चूसने के बाद पत्तियों के रोएं फ़िर से सीधे हो जाते हैं और मरा हुआ कीड़ा नीचे गिर जाता है।
            
रैफ़्लेशिया(चित्र-गूगल से साभार)
इन कीड़े खाने वाले पौधों के अलावा भी
अमरबेल, रैफ़लेशिया जैसे परजीवी पौधे भी हैं,जो दूसरे पेड़-पौधों के सहारे अपना भोजन तैयार करते हैं। ये पौधे लताओं की शक्ल में होते हैं। ये जिस पेड़ या पौधे पर बेल कि तरह चढ़े होते हैं उसी के शरीर से पोषक तत्व खींचकर अपना काम चलाते हैं। धीरे-धीरे वह पौधा सूखता जाता है और परजीवी पौधा या बेल हरा-भरा होता जाता है।

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रविवार, 21 सितंबर 2014

अखबार पढ़ा जब मुर्गे जी ने---।

मुर्गे जी को मिला कहीं से
अखबार पुराना एक
खबर सुनाकर सबको भैया
काम करूं मैं नेक।

खोज रहा खबरों में मुर्गा
जंगल पर्वत नदी की बातें
पर इनकी ना खबर थी कोई
ना ही फोटो छपी थी एक।



खबरें थीं बस लूट पाट की
चोरी झूठ फ़रेब की
दुनिया के हर कोने में बस
दुर्घाटनाएं हुयीं अनेक।

खबरें पढ़ गुस्साया मुर्गा
अखबार दिया फ़िर फ़ेंक
हवा में गर्दन ऊंची करके
बांग लगाई एक।
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डा0हेमन्त कुमार


रविवार, 14 सितंबर 2014

विज्ञान लेख--चींटियां सिखाती हैं सहयोग और काम के प्रति लगन---।

(चित्र-गूगल से साभार)
      अपने घरों की रसोई में छोटी छोटी लाल या काली चींटियों की लम्बी लम्बी कतारें तो आपने देखी  ही होंगी।कैसा एक दूसरे के पीछे एक लाइन बना कर चलती हैं।कभी ये अपने खाने की खोज में रहती हैं तो कभी नए घर की तलाश में।क्या आपने कभी इन नन्हीं चींटियों के जीवन के बारे में सोचा है।क्यों ये एक दूसरे के पीछे ही चलती हैं?कभी इनकी कतार को छेड़ दो तो ये सब एक ही दिशा में भागती हैं?क्योंकि इनके अंदर आपस में एक दूसरे का सहयोग करने के साथ ही अपने काम को पूरी जिम्मेदारी से पूरा करने की जबर्दस्त भावना होती है।आइये हम इन नन्हीं चींटियों के जीवन के बारे में विस्तार से जानते हैं।
(चित्र-गूगल से साभार)
0प्रजातियां : हमारी पूरी धरती पर चींटियों की लगभग 11,000प्रजातियां मिलती हैं।ये धरती के हर कोने में मौजूद हैं इनकी कुछ मुख्य प्रजातियों के नाम हैं-आर्मी ऐण्ट्स,ड्राइवर ऐण्ट्स ये दक्षिणी अमेरिका और अफ़्रीका में ज्यादा पाई जाती हैं।हार्वेस्टर चींटियां रेगिस्तानों में ज्यादा पाई जाती हैं।इनका मुख्य भोजन बीज है।एफ़िड टेण्डिंग चींटियां छोटे छोटे कीड़ों से एक रस निकाल कर खाती हैं।स्लेव मेकर चींटियां दूसरी जाति की चींटियों के बच्चों को उठा ले जाती हैं।इन बच्चों को पालकर इनसे वो अपने सारे काम करवाती हैं।चींटियों की एक और प्रजाति प्रसिद्ध है—“हनीपाट वर्कर।ये अपने शरीर में पौधों का मीठा रस इकट्ठा करके अपनी बस्ती की सारी चींटियों को खिलाती हैं।
0सबके काम अलग-अलग:जैसे तुम्हारे स्कूल में हर व्यक्ति का काम अलग अलग बंटा है उसी तरह चींटियों की बस्तियों में भी सभी के काम बंटे हुये होते हैं।इनकी हर बस्ती में तीन तरह की चींटियां रहती हैं।
0मजदूर चींटियां:मजदूर चींटियों के जिम्मे थोड़ा ज्यादा काम रहते हैं।ये बिल बनाने,छोटे बच्चों को पालने,खाना इकट्ठा करने और बिल को साफ़ सुथरा रखने का काम करती हैं।
0रानी चींटियां:इनका काम सिर्फ़ अंडे देना और बच्चे पैदा करना रहता है।ये और कोई दूसरा काम नहीं करती हैं।
0पुरुष चींटियां:ये रानी चींटियों को गर्भवती बनाते हैं और कुछ समय बाद मर जाते हैं।
     
(चित्र-गूगल से साभार)
0तरह तरह के घर:इन चींटियों की बस्ती में ज्यादातर काम बिल के अंदर ही होते हैं।इनमें भी हर प्रजाति के बिल बनाने के तरीके अलग होते हैं।कुछ जमीन के नीचे मिट्टी में बिल बनाती हैं।कुछ जमीन की सतह के ऊपर मिट्टी के ढूहों पर बांबी बना कर उसमें रहती हैं।कुछ अपना बिल पेड़ों के कोटरों में तो कुछ चट्टानों के बीच अपना बिल बनाती हैं।दुनिया में ऐसी भी चींटियां हैं जिनका अपना कोई घर नहीं होता।
0 चींटियों का शरीर:इतनी नन्हीं चींटियों के शरीर की बनावट तो सामान्य आंख से नहीं दिखाई देगी।किसी माइक्रोस्कोप से देखकर ही उसके शरीर की बनावट को समझ जा सकता है।
 
(चित्र-गूगल से साभार)
इनके छः तो नन्हें नन्हें पैर होते हैं।तुम्हें जान कर आश्चर्य होगा दुनिया की सबसे छोटी चींटी की लम्बाई कुल 0.7होती है।जबकि सबसे बड़ी की लंबाई 1इंच तक होती है।इनके शरीर के बीच एक बहुत पतली कमर होती है।जमीन के नीचे बिलों में जाते समय चींटियां अपने शरीर को इसी पतली कमर से मोड़ लेती हैं।पुरुष और रानी चींटियों के पंख भी होते हैं।कुछ जातियों की मजदूर चींटियों के शरीर पर नुकीले रोएं होते हैं।इनसे वो दुश्मनों से लड़ती भी हैं।
           इनके मुंह के भीतर तीन हिस्से होते हैं।इनका जबड़ा सबसे काम का होता है।इसे ये हर तरफ़ घुमा लेती हैं।ये अपने जबड़ों का इस्तेमाल खोदने,खाना इकट्ठा करने,बिल बनाने,दुश्मनों से लड़ने और काटने में कर सकती हैं।ये अपने छोटे जबड़े से चबाती हैं।और नन्हीं सी जीभ से तरल पदार्थ पीती हैं।कुछ चींटियों की दो और कुछ की एक आंख होती है।कुछ अंधी भी होती हैं।इनके कान तो नहीं होते पर वो अपने आस पास होने वाले कंपनों से आवाज का पता लगा लेती हैं।शायद आपको जान कर आश्चर्य होगा कि हमारी तरह ये आपस में बातें भी करती हैं।चींटियों की सबसे खास बात ये है कि वो बोल तो नहीं सकतीं पर एक दूसरे को छू कर,शरीर से गंध छोड़ कर,जमीन में कंपन पैदा करके भी एक दूसरे तक अपनी बातें पहुंचाती हैं।
                   000

डा0हेमन्त कुमार

सोमवार, 1 सितंबर 2014

घायल हुये शिकारी


जंगल  में जैसे ही पहुंचे,
मोटे कई शिकारी,
सभी जानवर भागे फ़ौरन
आया संकट भारी।

कोई भागा गुफ़ा में अपनी
कोई नदी में कूदा
पर भालू सियार ने मिलकर
तरकीब निकाली न्यारी।

दोनों ने पत्थर फ़ेंके फ़िर
मधु मक्खी के छ्त्तों में
भन भन करती टूट पड़ीं सब
जिधर  छुपे थे शिकारी।


कुछ के चेहरों पर था काटा
किसी के डंक चुभोया
चीख चीख कर वापस भागे
घायल सभी शिकारी।
0000
हेमन्त कुमार

रविवार, 17 अगस्त 2014

धूर्त भेडि़या

                     
आज से सैकड़ों साल पहले विन्ध्याचल की पहाडि़यों से घिरा हुआ एक अत्यन्त मनोरम जंगल था। उस जंगल में सभी पशु-पक्षी चैन से रहते थे। क्योंकि वहां का राजा सिंह और उसका मन्त्री बन्दर दोनों ही बहुत न्यायप्रिय और प्रजापालक थे। राजा सिंह सदैव प्रजा के कष्टों को दूर करने के लिए तत्पर रहता था। इसीलिए वहां की प्रजा को किसी प्रकार का दुःख नहीं था और सब सुख-चैन की वंशी बजाते थे।

      जंगल के एक छोर पर एक सुन्दर झरना था। उसका पानी बड़ा मीठा था। जंगल के सभी पशु-पक्षी वहीं पानी पीते थे। उसी झरने के पास एक धूर्त भेडि़या रहता था। वह जंगल में रहने वाले सभी पशु-पक्षियों को हमेशा परेशान किया करता था। जंगल में कोई उत्सव होता अथवा किसी भी प्रकार का अच्छा कार्य होता तो वह सदैव उसमें विघ्न उत्पन्न करता था। उससे सभी पशु-पक्षी परेशान थे। कई बार सिंहराज के दरबार में फरियाद भी की गई, परन्तु कोई असर नहीं हुआ। भेडि़या धूर्त होने के साथ ही बहुत चालाक भी था। वह अपराध करते हुए कभी भी रंगे हाथ नहीं पकड़ा गया। तब सिंहराज ने सभी पशु-पक्षियों को सान्त्वना दी कि समय आने पर इसे उचित दण्ड दिया जाएगा।
          कुछ दिनों बाद ही पूरे जंगल भर में सूखा पड़ गया। एक ओर गर्मी का महीना, ऊपर से वह सूखा। अब झरने का पानी भी धीरे-धीरे सूखने लगा था। कुछ दिनों बाद झरने का पानी एकदम सूख गया। जंगल के पशु-पक्षी प्यासे मरने लगे। पूरे जंगल में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई थी। जंगल में सभी परेशान हो उठे थे।अन्त में सिंहराज ने एक दिन जंगलवासियों की एक सभा बुलाई। जंगल में डुग्गी पीट दी गई कि इस सभा में सभी का आना आवश्यक है।
          दूसरे दिन पूरा दरबार खचाखच भरा हुआ था, कहीं भी तिल रखने की जगह नहीं थी। सिंहराज के लिए एक ऊंचा सिंहासन बना था। उसके नीचे प्रधान मन्त्री बन्दर का स्थान था। उसके बाद अन्य मन्त्रियों तथा सभी प्रजाजनों का। सभी जानवर आ चुके थे और बड़ी उत्सुकता से सिंहराज तथा मन्त्री बन्दर के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। थोड़ी ही देर में सभाभवन के द्वार पर खड़े द्वारपाल कुत्ता प्रसाद ने ऐलान किया--‘‘महाराजधिराज ‘‘ सिंहराज पधार रहे हैं ..सभी लोग सावधानी से बैठ गये।
          जैसे ही सिंहराज पधारे सभी पशु-पक्षी उनके सम्मान में खड़े हो गये। सिंहराज बैठ गये तथा उन्होंने सभी को बैठने का संकेत किया। सिंहराज के चेहरे पर छायी हुई चिन्ता की रेखाएं साफ झलक रही थीं। बैठने के बाद सिंहराज ने एक बार उत्पन्न गम्भीर दृष्टि से पूरे दरबार में नजर दौड़ाई। इसके बाद सिंहराज ने एक गम्भीर गर्जना की जिससे सारा जंगल कांप उठा।
          सिंहराज ने कहना आरम्भ किया--‘‘इस जंगल के सभी प्रजागण तथा मन्त्रीगण ! आप जैसा देख रहे हैं कि इस समय चारों ओर अकाल का भीषण प्रकोप है तथा सारे जंगल के पशु-पक्षी उससे परेशान हैं। मुझे यह भी पता लगा है कि जिस झरने से हमस ब जल लेते थे वह भी सूख गया है। अब आप लोग भी अत्यन्त परेशान हैं। मैंने यह समस्या इस जंगल के प्रसिद्ध इंजीनियर नन्हें चीता के सामने रखी थी जो कि अभी पिछले दिनों ही अफ्रीका के जंगलों से इंजीनियरिंग का विशेष अध्ययन करके लौटे हैं। काफी सोच-विचार के बाद वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यदि जंगल के सभी लोग मिलकर सभा भवन के द्वार पर एक कुआं खोद लें तो उससे अच्छी जल की व्यवस्था और कोई नहीं होगी। क्योंकि सभा भवन जंगल के बीचों-बीच स्थित है। यहां से जल ले जाने में सभी को सुविधा रहेगी। यही बात कहने के लिए मैंने आज की यह सभा बुलाई है। मैं यह जानना चाहूंगा कि क्या आप लोग नन्हें चीता की इस योजना से सहमत हैं ? क्या आप लोग उन्हें इस कार्य में सहयोग देंगे ?”
          महाराज सिंह के चुप होते ही सारे जानवर बोल पड़े --‘‘हां, हम लोग इस योजना से सहमत हैं और हम लोग उन्हें पूरी-पूरी सहायता देंगे। सिंहराज ने यह सुनकर कहा, --‘‘आप लोग इस कार्य में सहयोग देंगे, यह जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। मेरा विचार है कि इस शुभ कार्य में देर नहीं करनी चाहिए। कल से ही यह कार्य आरम्भ कर दिया जाय। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आज की यह सभा समाप्त करता हूं।यह कहकर सिंहराज सभा भवन से निकलकर मन्त्रियों के साथ चले गये। उनके जाने के बाद के बाद सभी पशु-पक्षी भी अपने-अपने घर चले गये।
          दूसरे दिन से इंजीनियर नन्हें चीता की देख-रेख में कुए की खुदाई शुरू हो गई। थोड़ी-थोड़ी देर पर खोदने वाले बदल दिए जाते थे। शाम तक सभी लोगों ने मिलकर करीब दस फुट गहरा गड्ढा खोद लिया। इसके बाद दूसरे दिन आने का निश्चय करके सब अपने-अपने निवास में चले गये।
          अगले दिन जब सब लोग वहां पहुंचे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, क्योंकि उन लोगों ने जितना गड्ढा खोदा था वह किसी ने पाट दिया था। किसी की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि यह काम किसने किया। खैर, उस दिन फिर मेहनत करके उन लोगों ने गड्ढा खोदा। परन्तु जब वे तीसरे दिन वहां आए तो फिर उस गड्ढे में मिट्टी भरी हुई थी। इसी तरह प्रतिदिन होने लगा।
          परेशान होकर सभी पशु-पक्षियों ने एक सभा की और उसमें निश्चय किया कि दो लोग मिलकर रात में गड्ढे के पास पहरा देंगें। सबसे पहले दिन खरगोश और हिरन को पहरा देना था। दोनों शाम होते ही अपने-अपने घरों से खाना खाकर सभा-भवन के पास पहुंच गये। दोनों वहीं टहलते हुए आपस में बात करने लगे। बात करते-करते जब काफी रात हो गयी तो दोनों वहीं सभा-भवन के द्वार पर बैठ गये। उनको बैठे हुए अभी थोड़ी ही देर हुई होगी कि उन्हें तरह-तरह की भयानक आवाजें सुनाई पड़ने लगीं। दोनों ने ही इधर-उधर देखा कहीं कुछ नहीं था।
          थोड़ी देर बाद फिर उसी तरह की आवाजें आने लगीं। इस बार जब दोनों ने सामने देखा तो चीख पड़े। उन्हें उस गड्ढे के पास एक सफेद काली छाया हिलती हुई दिखलाई पड़ी जो उन्हीं की तरफ बढ़ रही थी। दोनों भूत-भूत चिल्लाते हुए भाग निकले।

          दूसरे दिन सुबह जब सभी पशु-पक्षी गड्ढे के पास पहुंचे तो गड्ढा फिर पटा हुआ था। खरगोश और हिरन से पूछा गया तो रात की पूरी घटना उन्होंने बता दी। उस घटना को सुनकर किसी भी जानवर को उस पर विश्वास नहीं हो रहा था। तभी भेडि़या बोला, ‘‘अरे मैंने तो पहले ही मना किया था कि वहां पर कुआं मत खोदो। वहां पर तो भूतों का राजा रहता है। भेडि़ये की यह बात सुनकर सभी जानवर डर गये । तब गधे ने कहा, ‘‘अच्छा आज हम और घोड़ा भाई पहरा देंगे। देखते हैं कौन आता है। उस दिन घोड़ा तथा गधा पहरा देने गये। रात में इन लोगों के साथ भी वही घटना घटी। भूत को देखते ही दोनों डर का भाग गये।
          अगले दिन जंगल के सभी जानवर भयभीत होकर सिंहराज के पास पहुंचे और उन्होंने अपनी समस्या उनको बतायी। सिंहराज ने काफी सोच-विचार के यह मामला जंगल के गुप्तचर विभाग की चीफ चुलबुल लोमड़ी को सौंपा। चुलबुल लोमड़ी रात को अकेले ही कुएं के पास गई। रात में जब भूत निकला तो पहले वह डर गयी। फिर ध्यान से देखने पर उसने पहचान लिया। यह तो झरने के पास वाला धूर्त भेडि़या था। वह उस समय चुपचाप उठकर चली गयी।
          दूसरे दिन रात में वह जंगल के पुलिस कप्तान शेरू कुत्ते तथा पुलिस के चार जवानों को लेकर वहां पहुंची। रात में जैसे ही भूत के वेश में भेडि़या निकला चुलबुल लोमड़ी ने तुरन्त पुलिस कप्तान शेरू कुत्ते तथा उसके पुलिस के जवानों को इशारा किया। उन लोगों ने दौड़कर भेडि़ये को दबोच लिया और जंजीरों से बांध दिया।    
          रात किसी तरह व्यतीत हुई। सुबह चुलबुल लोमड़ी तथा पुलिस कप्तान शेरू उस भेडि़ए को लेकर सिंहराज के दरबार में पहुंचे और सिंहराज को बताया कि यी प्रतिदिन भूत बनकर लोगों को डराता था और यही गड्ढे में मिट्टी भर देता था। अब इसे जो चाहें सजा दें।
         सिंहराज ने उस भेडि़ए  की नाक-कान कटवाकर और उसके मुंह में कालिख लगवा कर पूरे जंगल में घुमाया और उसको सभी जानवरों ने मिलकर जंगल से बाहर खदेड़ दिया। इसके बाद सभा-भवन के द्वार पर एक बहुत ही सुन्दर कुआं बना और जंगल के सभी पशु-पक्षी सुख-पूर्वक रहने लगे।
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डा0हेमन्त कुमार