मंगलवार, 31 जुलाई 2018

बाल कहानी---हमारा कालू


(हिन्दी के प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार हमारे पिताजी आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की आज पुण्य तिथि है।आज 31 जुलाई 2016 को वो हम सभी को अकेला छोड़ गए थे।आज वो भौतिक रूप से हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं लेकिन उनकी रचनात्मकता तो हर समय हमारा मार्ग दर्शन करेगी।मैं आज पिताजी द्वारा लिखी गयी बाल कहानी “हमारा कालू”को फुलबगिया पर पुनः प्रकाशित कर रहा..और शीघ्र ही उनके द्वारा लिखितअंतिम बाल उपन्यास को भी इस ब्लॉग पर सीरियलाइज करूंगा।यही पिता जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।)
                                                          
 
              (पिताश्री आदरणीय प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी )


हमारा कालू   

             अखबार उठाने के लिए पापा ने दरवाजा खोला मगर चौंक उठे।अखबार के पास एक कुत्ता खड़ा था।दुम हिलाता,आंखें मटकाता हुआ। रंग?उसकी तो बात ही मत पूछो।जैसे अभी-अभी काली बूट-पालिश से चमकाया गया हो।
      पापा चिल्लाए जल्दी से बाहर आओ।पता नहीं कहां से एक आवारा कुत्ता भटक कर आ गया है।हम सब वाइपर लेकर उसे भगाने दौड़े।देखा-- वह पापा की ओर देख कर आंखे मटका रहा था।जैसे कहना चाह रहा हो।आवारा तो मत कहो यार।हां,घुमन्तू जरूर कह सकते हो।इस घर से तो मेरा पुराना याराना है।मैं अब कुछ दिन यहां बिताने आया हूं।मगर तुम सब तो छड़ी लेकर मेरा स्वागत करने आ गये।
                                

              पहले तो उसे डांटा-डपटा गया।उसका उस पर कोई असर नहीं हुआ।तब पापा ने वाइपर उठाया।उसने आंखे मटकायी।पापा बोले “बड़ा ढीठ है।और पापा ने वाइपर लेकर उसे दौड़ाया।वह भागा जरूर मगर पीछे मुड़ कर देखता भी जाता था।मटकती आंखें कह रहीं थीं--अब बस भी करो यार।मुझे यह सब बिल्कुल पसंद नही है।
   मगर पापा ने उसे भागा कर ही दम लिया।सब ने संतोष की सांस ली।पर पापा हांफ़ रहे थे।
      घंटे भर बाद दूध वाले ने आवाज दी।दरवाजा खोला गया तो सब भौंचक्क रह गये।वह फ़िर आ गया था।इस बार आराम से लेटा दुम हिला रहा था।आंखें मटका कर जैसे कह रहा हो----कैसी रही।
पापा फ़िर चिल्लाए—“यह कालू राम बिना कुछ लिये जाने वाला नहीं है।दे दो इसे एकाध रोटी का टुकड़ा।”
“पापा आप इसे कालू क्यों कह रहें हैं?”हम सब ने पूछा।
पापा गुस्से से बोले---“तब क्या सफ़ेद कहूं?ला कर पोत दो इसे चूना।”
      बहरहाल आगे का किस्सा मजेदार रहा।वह भगा दिया जाता घंटे भर बाद  फ़िर लौट आता।जाने और लौटने का क्रम जारी रहा।एक दिन ऐसा भी आया कि कालू राम जम ही गया हमारे दरवाजे पर।उसे खाने के लिये कुछ ना कुछ दे ही देते।भारतीय संस्कृति में मेहमान को  भूखा रखने का रिवाज नहीं है जो।
    फ़िर सबने सोचा कि जैसे आया है वैसे चला भी जायेगा।मगर ऐसा हुआ नहीं।लाट साहब आराम से खाते रहे।आंखें मटक-मटका कर हम सब को चिढ़ाते भी रहे।अब इस खेल में दोनों को मजा आ रहा था।
 धीरे-धीरे हमने उसे कुछ खेल भी सिखाने शुरू कर दिये।फ़ेंकी हुई गेंद को उठा कर ले आना।इसी तरह लकड़ी के खिलौने आदि भी।वह समझ गया,मुंह में दबा कर ले आता।
  हां,वह अपनी सीमा रेखा भी पहचान गया।
 दरवाजे से बाहर।उसके लिये एक फ़टा पावदान बिछा दिया गया।खाने के लिए अलमुनियम का प्लेट।वैसे ही पानी का बर्तन।अब क्या चाहिए था।कभी–कभी पापा से छिपाकर दो-एक बिस्कुट भी।
     इस बीच शहर से बाहर हमारे एक रिश्तेदार के यहां शादी भी पड़ गई।सभी को जाना था।अब सवाल यह उठा----कालू का क्या किया जाए। साथ ले नहीं जा सकते थे।इधर एक आवारा कुत्ते की जिम्मेदारी भी कौन पड़ोसी उठाता?
“कुछ नहीं।इसके लिए दो-चार दिन का खाना छोड़ देते हैं।”पापा ने कहा।
“भला इतने से कालू का पेट भरेगा?”हमने पूछा।
“तब क्या हम लोगों ने इसके खाने–पीने का ठेका ले रखा है?जैसे इधर–उधर से अब तक पेट भरता रहा,वैसे ही काम चला लेगा।”पापा बोले।
 पापा–मम्मी के डर से हम लोग चुप लगा गए।जाने के दिन स्टेशन के लिए एक टैक्सी मंगा ली गई।देर  हो रही थी।ट्रेन का टाइम भी हो गया था।हम लोग हड़बड़ी में टैक्सी में बैठ गए।
तभी कालू का ध्यान  टैक्सी से नीचे कुछ गिरने पर गया।रूमाल में बंधी एक पोटली। कालू समझ गया।उसने पोटली को मुंह में दबाया फ़िर टैक्सी के पीछे भागा।मगर टैक्सी कुछ ही पलों में उसकी आंखो से ओझल हो गई।कालू फ़िर भी उसी दिशा में दौड़ता रहा।
  ट्रेन प्लेटफ़ार्म नंबर दो पर आ रही थी।हम ओवर ब्रिज से होकर वहां पहुंच गए।अचानक हम लोगों की नजर प्लेटफ़ार्म एक पर गई।
 वहां कालू मुंह में पोटली दबाए इधर से उधर भाग रहा था।जरूर हम लोगों की तलाश में।मम्मी ने पहचान लिया।उनकी जरूरी दवाएं थीं उसमें। जाने की हड़बड़ी में वह दरवाजे पर टैक्सी से नीचे गिर गई होगी।मगर हममें से कोई नहीं चाहता था कि कालू उसे अपनी मौत की कीमत पर यहां पहुंचाए।
 तभी उसकी नज़र हम लोगों पर पड़ी।मौत सिर पर थी।हम लोगों ने हाथ के इशारे से उसे उधर ही रहने के लिए कहा।इधर ना आने के लिए चिल्लाए भी।मगर कालू कुछ समझ नहीं पाया।वह प्लेट फ़ार्म से नीचे  कूद कर अपनी मौत के मुंह में कूद पड़ा।
       ट्रेन से उसका कटना तय था।एक बार तो लगा कि वह बच जाएगा।वह इंजन के आगे से इस पार निकल आया प्लेटफ़ार्म पर पैर जमाने की कोशिश की।पर वे जम नहीं पाए।हमने उसके मुंह से पोटली तो ले ली।मगर उसे ऊपर नहीं खींच सके।वहां ट्रेन का पड़ाव बहुत कम था।इस लिए हमें सीट पर जाने की जल्दी थी।मगर डिब्बे में घुसते-घुसते यह जरूर देखा --कालू प्लेटफ़ार्म पर चढ नहीं पाया था।फ़िसल कर नीचे जा गिरा।
    वह थक चुका था।घबराया भी।हम लोग आगे की कल्पना से ही सिहर उठे।जैसे तैसे हम अपने रिश्तेदार के यहां पहुंचे।वहां शादी का माहौल था।पर हम उस जश्न को नहीं मना पाए।सबका मन बुझा-बुझा सा था।बार-बार उस आवारा कुत्ते का चेहरा सामने आ खड़ा होता।जिसका नाम कालू था और जिसने हमारे लिए अपनी जान दे दी।
    चौथे दिन घर पहुंच रहे थे।यह सोच कर ही अजीब लग रहा था कि कालू के बिना घर कैसा लगेगा।मगर चमत्कार हो गया।टैक्सी की आवाज सुनते ही दरवाजे पर बैठा कालू हम लोगों की तरफ़ दौड़ पड़ा।मौत को धता बता कर घर पहुंच जाने वाला कालू।खुशी के मारे सबके पैर सूंघ रहा था।
     पापा को देख कर उसने आंखे मटकाईं----देखो यार,अब मुझे परेशान ना करना।मुझे यह सब बिल्कुल पसंद नहीं है।
     पापा की आंखों में आंसू आ गए।एक आवारा कुत्ते की सूझ-बूझ और वफ़ादारी के जज्बे से उन्होंने उसे सलाम किया।हमारी आंखें भी छल-छला आयीं।
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लेखक--प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव



रविवार, 11 मार्च 2018

महमूद बघर्रा


(हिन्दी के प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार हमारे पिताजी आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी का आज 89वां जन्म दिवस है।वो भौतिक रूप से हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं लेकिन उनकी रचनात्मकता तो हर समय हमारा मार्ग दर्शन करेगी .---ऐतिहासिक व्यक्तित्व “महमूद बघर्रा” के विषय में रोचक जानकारियां देने वाला यह लेख पिता जी ने देहावसान से एक दो माह पहले ही लिखा था। उनकी अभी तक अप्रकाशित इस रचना को आज मैं “फुलबगिया” पर प्रकाशित कर रहा हूँ।)    
                                 
                    महमूद बघर्रा
                         

प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
      दोस्तों पता नहीं तुमने कभी महमूद बघर्रा का नाम पढ़ा है या नहीं। अगर नहीं तो चलो आज पढ़ ही लेते हैं।मगर यह काल्पनिक नाम नहीं इतिहास का एक सच है।एक अद्भुत व्यक्तित्व।पढ़ोगे तो दांतों तले उंगली दबाए रह जाओगे।
    इतिहास में कहीं कहीं इनका नाम महमूद बघेला भी मिलता है।यह लोदी वंश से था और सन पन्द्रह सौ के आस पास गुजरात का सुल्तान था।पन्द्रह सौ ग्यारह म्में इसकी मृत्यु हुयी।
    इतिहास में कुछ सुल्तान क्रूरता के लिये,कुछ वीरता के लिये और कुछ दयालुता के लिये प्रसिद्ध हैं।मगर बघर्रा में ऐसा कुछ नहीं था।वह मशहूर है अपने भोजन के लिये।जैसे रावण का भाई कुम्भकर्ण सोने के लिये।गनीमत थी कि कुम्भकर्ण साल में छः महीने सोता था।मगर बघर्रा तो पूरे साल जागता था। चलो कुछ उसके भोजन के बारे में बताएं। अच्छा हुआ कि वह आज के जमाने में नहीं हुआ।वरना उसके कारण सौ डेढ़ सौ लोगों को रोज खाना ही नसीब न होता।
     आओ,उसके सुबह के नाश्ते से बात शुरू करते हैं।सुबह नाश्ते में वह डेढ़ से दो दर्जन तक मुर्गे खाता था।दो से लेकर चार दर्जन तक अंडे।यह कम से कम मात्रा बतायी गयी है इतिहास में।पता नहीं कितनी मटकी दूध,दही,मक्खन,मलाई। इसी तरह और बहुत कुछ।
    अब आओ उसके भोजन पर एक नजर डालते हैं।उसके लिये एक देग भर कर चावल पकता था।सोच लो कि एक देग में चार से लेकर पांच बाल्टी तक पानी आ सकता है।सोचो उस पूरे देग में कितना चावल पकता होगा।चावल के अलावा सौ से लेकर डेढ़ सौ तक रोटियां।साथ में कितने मांस मछली की जरूरत पड़ती होगी सोच लो।
    उसके पलंग के चारों ओर थालों और परातों में भोजन भरा रहता था।वह जिस थाल पर चाहता था हाथ मारता रहता था।मिनटों में थाल खाली हो जाता था।वह जब सोता था तो उसके खर्राटों की आवाज बड़ी भयानक होती थी।जैसे आस पास भेड़िए गुर्रा रहे हों।
    उसमें एक बात खास थी।वह बड़ी आसानी से अनुमान लगा लेता था कि उसके भोजन में कोई कटौती तो नहीं हुयी।उदाहरण के लिये तुमने पालतू हाथियों के बारे में सुना होगा।उसकी खुराक के रूप में गन्ना,पीपल य बरगद की टहनियां तो दी ही जाती हैं।मगर उसका मालिक उसकी रोटियों के लिये कुछ आटा भी बराबर देता है।पांच से लेकर दस किलो तक।ये रोटियां प्रायः महावत ही तैयार करता है।
   कभी कभी लालचवश महावत कुछ आटा निकाल भी लेता है।हाथी रोटियां देखते ही समझ जाता है कि आज कुछ गड़बड़ है।महावत उसकी सजा जानते हैं।इसलिये उस दिन तो हाथी से दूर रहने की कोशिश करते हैं।मगर नौसिखिया महावत फ़ंस जाते है।प्रायः ही हाथी महावत को सूंड़ से लपेटकर पटक पटक कर मार डालता है।या पैरों से कुचल डालता है।
   एक बार ऐसा ही महमूद बघर्रा के साथ भी हुआ।उसे अनुमान लग गया कि बावर्ची ने चावल में चोरी की है।बस उसने बावर्ची का हाथ पकड़ लिया।बावर्ची समझ गया कि उसकी मौत पक्की है।वह बघर्रा के पैरों पर माथा पटक पटक कर लगा रोने।अपनी गरीबी के दुखड़े रोये।
   महमूद बघर्रा ने तरस खाकर उसकी जान तो बख्श दी।मगर उसने बावर्ची के जिस हाथ को पकड़ा था उसकी हड्डियों का चूरा चूरा हो गया था।क्यों था न बघर्रा इतिहास का एक बेमिसाल व्यक्ति।
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लेखक—

प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।
31जुलाई 2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन।
        शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम0ए0।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन मे संलग्न।देश की प्रमुख स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।
बाल कहानियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।“वतन है हिन्दोस्तां हमारा”(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)“अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का तारा”आदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें। सन 2012 में नेशनल बुक ट्रस्ट,इण्डिया से प्रकाशित बाल उपन्यास “मौत के चंगुल में” काफी चर्चित।नेशनल बुक ट्रस्ट,इण्डिया से प्रकाशनाधीन  बालनाटक संग्रह”एक तमाशा ऐसा भी” 
   इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र 87 वर्ष की उम्र तक निर्बाध चला। 

     







गुरुवार, 4 जनवरी 2018

जाड़ा

जाड़ा ताल ठोंक जब बोला,
सूरज का सिंहासन डोला,
कुहरे ने जब पांव पसारा,
रास्ता भूला चांद बिचारा।

छिपे सितारे ओढ़ रजाई,
आसमान नहिं दिखता भाई,
पेड़ और पौधे सिकुड़े सहमे,
झील में किसने बरफ़ जमाई।

पर्वत धरती सोये ऐसे,
किसी ने उनको भंग पिलाई,
सुबह हुयी सब जागें कैसे,
मुर्गे ने तब बांग लगाई।

जाड़ा ताल ठोंक जब बोला,
सूरज का सिंहासन डोल॥
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डा0हेमन्त कुमार

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

दानव से मानव


दानव से मानव
                                                                                                 प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव

                       वल्लभगढ़ के राजकुमार अक्सर घने जंगल में निकल जाते।उन्हें शिकार का कोई शौक नहीं था।बस,मित्रों के साथ घुड़दौड़ नदियों में तैराकी देखते देखते ऊंचे पेड़ों की चोटियों तक पहुंच जाना।ये ही थे उनके शौक।कोई भयानक जानवर आक्रमण कर बैठता तो उससे भी पीछे न हटते।सबसे बढ़कर अपनी मधुर वाणी और सुन्दर व्यवहार के लिये वे पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे।
   उस जंगल में एक नरभक्षी राक्षस और उसका जादुई महल भी था।पिता ने उससे सावधान रहने के लिये बार बार कहा।पर राजकुमार हंस कर उत्तर देते, “मैं उसे पा गया तो चुटकियों में मार गिराऊंगा।”
                    एक दिन भालू जैसे एक जंगली जानवर ने अचानक उनके ऊपर हमला कर दिया।राजकुमार ने तुरन्त भाला निकाल लिया।भाला देखते ही वह जानवर भाग निकला।बेहद तेज गति से।राजकुमार उसे पकड़ नहीं पा रहे थे।वह घोड़े की गति से तेज भाग रहा था।एक एक कर सभी पीछे छूट गये।अंधेरा घिर आया। अचानक राजकुमार को उस अंधेरे में चमकता हुआ एक महल दिखाई पड़ा।दीवारों से लेकर कंगूरे तक एक दम जैसे बिजली में नहाया हुआ।उधर वह जानवर भी ना जाने कहां गायब हो गया।राजकुमार को लगा----शायद यही उस नरभक्षी राक्षस का जादुई महल हो।
   राजकुमार अब बुत थक गये थे।वे फ़ाटक के बाहर बने एक चबूतरे पर बैठ गये।सामने चबूतरे पर तीन टोकरियों में ताजे ताजे फ़ल रखे थे।भूख से बेहाल राजकुमार ने एक फ़ल उठा लिया।
    मगर तभी फ़ाटक के पीछे से एक मधुर स्वर सुनाई दिया—“सावधान राजकुमार,यह नरभक्षी राक्षस का महल है।ये जादुई फ़ल हैं।इन्हें खाते ही आप बेहोश हो जाएंगे।तब राक्षस आप को खा जाएगा।मैं दूसरे फ़ल लेकर आती हूं।”
   इसी के साथ फ़ाटक का एक पल्ला खुला।एक सुन्दर लड़की थाली में ताजे फ़ल लेकर राजकुमार के पास आई।
    राजकुमार ने पूछा—“तुम कौन हो?”
    “मैं भी एक राजकुमारी हूं।आप की तरह मुझे भी फ़ंसा कर यहां लाया गया है।जल्दी से फ़ल खा लो।राक्षस के आने का समय हो रहा है।”राजकुमारी बोली।
    “मेरे बचने का क्या उपाय है?”
    “बताती हूं,पहले पेट में कुछ डाल लो।”
        “तुम अभी तक कैसे बची हो?”
“वह मुझे अपना मन बहलाने के लिये रखे है।कभी गाने सुनता है कभी मेरा नृत्य देखता है।लेकिन मेरे शरीर को उसने कभी छुआ तक नहीं।महल के कैदखाने में सैकड़ों लोग बंद हैं।जिस दिन इसे बाहर शिकार नहीं मिलता इन्हीं में से किसी एक से अपनी भूख मिटाता है।”
 अब तक राजकुमार फ़ल खा चुका था।
“देखो आंगन में खड़ा यह ऊंचा पेड़ देखते हो?क्या तुम इस पर चढ़ सकते हो?”
राजकुमार हंस कर बोला—“क्या तुम यह कहना चाहती हो कि मैं इस पेड़ पर चढ़ कर अपनी जान बचाऊं?राक्षस वहां नहीं पहुंच पाएगा?”
“नहीं नहीं---इस पेड़ की चोटी पर एक फ़ल लगा है।वह फ़ल तुम्हारे हाथ में आते ही राक्षस तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।तुम उस फ़ल के जितने टुकड़े करोगे राक्षस के भी उतने टुकड़े होते जाएंगे।”
“देखो ,कैसे चुटकियों में वो फ़ल तोड़ कर लाता हूं?”
राजकुमारी ने टोका—“यह काम इतना आसान नहीं है।पेड़ की एक एक डाल तुम्हें ऊपर चढ़ने से रोकेगी।”
“तुम उसकी चिंता मत करो।”यह कह कर राजकुमार जल्दी से अपने से लिपटती हर डाल को तोड़ता मरोड़ता ऊपर पहुंच गया।क्षण मात्र में उसने फ़ल को तोड़ लिता।
    मगर यह क्या?पेड़ से फ़ल के अलग होते ही पेड़ पर चमकती रोशनी बुझ गई।पूरे महल की चमक गायब हो गई।राजकुमार समझ गया कि पेड़ से अलग होते ही अब इसमें कोई जादुई शक्ति नहीं।अब यह एक साधारण फ़ल मात्र है।
             इसी समय दूर से राक्षस के दहाड़ने की आवाज सुनाई पड़ी।दहाड़ से पूरा जंगल कांप रहा था।वह पागल की तरह भागा चला आ रहा था।
“राजकुमार तुम जल्दी से छिप कर अपने प्राण बचाओ।” राजकुमारी डर से कांपती हुई बोली।
  “राजकुमारी तुम फ़ाटक बंद कर के भीतर जाओ।मैं उसे बाहर देखता हूं ड़रो मत। वह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”
      इधर राजकुमार को देखते ही राक्षस गरजा---“कौन हो तुम?तुमने कैसे इस फ़ल को तोड़ने का साहस किया?चलो पहले तुम्हें ही अपना निवाला बनाता हूं।”
    “राक्षस राज,वल्लभगढ़ के राजकुमार का प्रणाम स्वीकार करें।मैं तो आपके पुत्र समान हूं।क्या अपने पुत्र को ही अपना ग्रास बनाएंगे?”
    “मुझे बातों से मत बहलाओ।यहां का सब कुछ तुमने नष्ट कर दिया।मेरे प्राण भी अब तुम्हारी मुट्ठी में हैं।”राक्षस चिल्लाया।
     अच्छा,आप इसी बात से भयभीत हैं?तो लीजिये संभालिये अपने प्राणों को।कहते हुए राजकुमार ने वह फ़ल राक्षस की ओर उछाल दिया।
   राक्षस आश्चर्य से बोला—“अरे तुम्हें अपने प्राणों का भय नहीं। अब अगर मैं तुम्हें मार कर खा जाऊं?”
“आप ऐसा कर ही नहीं सकते।मैं अब बाहर नहीं आपके हृदय में हूं तात।”
        अब राक्षस के चौंकने की बारी थी।आज तक किसी ने उसे इतना आदर नहीं दिया था।न ही राक्षस राज कह कर प्रणाम किया।न तात ही कहा।सब उससे डरते और नफ़रत करते थे।पर यह तो जैसे सचमुच मेरा बेटा बन गया।
    तभी राजकुमार बोले—“मेरे तात कहने का आप बुरा तो नहीं मान रहे हैं?”
“बिल्कुल नहीं बेटे।”दानव के मुख से अचानक निकल पड़ा। उसके भीतर पता नहीं कहां की ममता उमड़ आई।
“तात,मैं चाहता हूं कि आपका यह जादुई महल पहले से भी शानदार हो जाए।”
“वह कैसे?अब तो सब नष्ट हो चुका है।”
“मेरे ऊपर विश्वास कीजिये।”
“ऐसा है तो मेरी भी एक इच्छा पूरी कर दो।कहते हैं कन्यादान से सारे पाप धुल जाते हैं।मैं कन्यादान करना चाहता हूं।”
राजकुमार और राजकुमारी प्रसन्न हो उठे।वो दानव का मतलब समझ गये।”
“राजकुमार मैं जन्म से राक्षस नहीं हूं।मेरा नाम नीलमणि है।मेरे नीच कार्यों ने मुझे दानव बना दिया।”राजकुमार ने सब समाचार पिता जी को भेज दिया।शुभ घड़ी में वल्लभगढ़ से बारात आई।नीलमणि ने धूम धाम से कन्यादान किया।
   “तात,मैं भी दहेज में कुछ मांगना चाहता हूं।”
   “कहो राजकुमार,मैं तुम्हें दुनिया की हर चीज दूंगा।”
     “मुझे बस आपसे एक वादा चाहिये।इस जंगल में सैकड़ों मुसाफ़िर राह भटक कर भूख प्यास से मर जाते हैं।अब ऐसा नहीं होना चाहिये। आप यहां उनके खाने पीने और ठहरने का प्रबंध कर दें।इससे आपकी कीर्ति और बढ़ जाएगी।लोग दानव नहीं मानव नीलमणि को याद करेंगे।इससे आपका महल भी पहले की तरह जगमगाने लगेगा।”
नीलमणि के हामी भरते ही चमत्कार हो गया।पूरा महल फ़िर पहले की तरह चमकने लगा।
       नीलमणि की आंखों में प्रसन्नता के आंसू छलक आए।वह महाराज से बोला—“राजन,राजकुमार के कारण ही मैं आज फ़िर से मानव बन गया।वरना मैं पता नहीं कब तक दानवों के नीच कर्म करता रहता।”
       महाराज बोले—“नहीं नीलमणि,इसके पीछे राजकुमार का नहीं,उनकी वाणी और व्यवहार का हाथ है।इससे इंसान दुनिया में सब कुछ प्राप्त कर सकता है।”
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प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव
 11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।31जुलाई 2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन। शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम0ए0।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन मे संलग्न।देश की प्रमुख स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।
          नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित बाल उपन्यास "मौत के चंगुल में " के साथ ही बाल कहानियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।“वतन है हिन्दोस्तां हमारा”(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)“अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का तारा”आदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र 87 वर्ष की उम्र तक निर्बाध चला।बाल नाटकों का एक संग्रह नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशनाधीन।