रविवार, 21 सितंबर 2014

अखबार पढ़ा जब मुर्गे जी ने---।

मुर्गे जी को मिला कहीं से
अखबार पुराना एक
खबर सुनाकर सबको भैया
काम करूं मैं नेक।

खोज रहा खबरों में मुर्गा
जंगल पर्वत नदी की बातें
पर इनकी ना खबर थी कोई
ना ही फोटो छपी थी एक।



खबरें थीं बस लूट पाट की
चोरी झूठ फ़रेब की
दुनिया के हर कोने में बस
दुर्घाटनाएं हुयीं अनेक।

खबरें पढ़ गुस्साया मुर्गा
अखबार दिया फ़िर फ़ेंक
हवा में गर्दन ऊंची करके
बांग लगाई एक।
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डा0हेमन्त कुमार


रविवार, 14 सितंबर 2014

विज्ञान लेख--चींटियां सिखाती हैं सहयोग और काम के प्रति लगन---।

(चित्र-गूगल से साभार)
      अपने घरों की रसोई में छोटी छोटी लाल या काली चींटियों की लम्बी लम्बी कतारें तो आपने देखी  ही होंगी।कैसा एक दूसरे के पीछे एक लाइन बना कर चलती हैं।कभी ये अपने खाने की खोज में रहती हैं तो कभी नए घर की तलाश में।क्या आपने कभी इन नन्हीं चींटियों के जीवन के बारे में सोचा है।क्यों ये एक दूसरे के पीछे ही चलती हैं?कभी इनकी कतार को छेड़ दो तो ये सब एक ही दिशा में भागती हैं?क्योंकि इनके अंदर आपस में एक दूसरे का सहयोग करने के साथ ही अपने काम को पूरी जिम्मेदारी से पूरा करने की जबर्दस्त भावना होती है।आइये हम इन नन्हीं चींटियों के जीवन के बारे में विस्तार से जानते हैं।
(चित्र-गूगल से साभार)
0प्रजातियां : हमारी पूरी धरती पर चींटियों की लगभग 11,000प्रजातियां मिलती हैं।ये धरती के हर कोने में मौजूद हैं इनकी कुछ मुख्य प्रजातियों के नाम हैं-आर्मी ऐण्ट्स,ड्राइवर ऐण्ट्स ये दक्षिणी अमेरिका और अफ़्रीका में ज्यादा पाई जाती हैं।हार्वेस्टर चींटियां रेगिस्तानों में ज्यादा पाई जाती हैं।इनका मुख्य भोजन बीज है।एफ़िड टेण्डिंग चींटियां छोटे छोटे कीड़ों से एक रस निकाल कर खाती हैं।स्लेव मेकर चींटियां दूसरी जाति की चींटियों के बच्चों को उठा ले जाती हैं।इन बच्चों को पालकर इनसे वो अपने सारे काम करवाती हैं।चींटियों की एक और प्रजाति प्रसिद्ध है—“हनीपाट वर्कर।ये अपने शरीर में पौधों का मीठा रस इकट्ठा करके अपनी बस्ती की सारी चींटियों को खिलाती हैं।
0सबके काम अलग-अलग:जैसे तुम्हारे स्कूल में हर व्यक्ति का काम अलग अलग बंटा है उसी तरह चींटियों की बस्तियों में भी सभी के काम बंटे हुये होते हैं।इनकी हर बस्ती में तीन तरह की चींटियां रहती हैं।
0मजदूर चींटियां:मजदूर चींटियों के जिम्मे थोड़ा ज्यादा काम रहते हैं।ये बिल बनाने,छोटे बच्चों को पालने,खाना इकट्ठा करने और बिल को साफ़ सुथरा रखने का काम करती हैं।
0रानी चींटियां:इनका काम सिर्फ़ अंडे देना और बच्चे पैदा करना रहता है।ये और कोई दूसरा काम नहीं करती हैं।
0पुरुष चींटियां:ये रानी चींटियों को गर्भवती बनाते हैं और कुछ समय बाद मर जाते हैं।
     
(चित्र-गूगल से साभार)
0तरह तरह के घर:इन चींटियों की बस्ती में ज्यादातर काम बिल के अंदर ही होते हैं।इनमें भी हर प्रजाति के बिल बनाने के तरीके अलग होते हैं।कुछ जमीन के नीचे मिट्टी में बिल बनाती हैं।कुछ जमीन की सतह के ऊपर मिट्टी के ढूहों पर बांबी बना कर उसमें रहती हैं।कुछ अपना बिल पेड़ों के कोटरों में तो कुछ चट्टानों के बीच अपना बिल बनाती हैं।दुनिया में ऐसी भी चींटियां हैं जिनका अपना कोई घर नहीं होता।
0 चींटियों का शरीर:इतनी नन्हीं चींटियों के शरीर की बनावट तो सामान्य आंख से नहीं दिखाई देगी।किसी माइक्रोस्कोप से देखकर ही उसके शरीर की बनावट को समझ जा सकता है।
 
(चित्र-गूगल से साभार)
इनके छः तो नन्हें नन्हें पैर होते हैं।तुम्हें जान कर आश्चर्य होगा दुनिया की सबसे छोटी चींटी की लम्बाई कुल 0.7होती है।जबकि सबसे बड़ी की लंबाई 1इंच तक होती है।इनके शरीर के बीच एक बहुत पतली कमर होती है।जमीन के नीचे बिलों में जाते समय चींटियां अपने शरीर को इसी पतली कमर से मोड़ लेती हैं।पुरुष और रानी चींटियों के पंख भी होते हैं।कुछ जातियों की मजदूर चींटियों के शरीर पर नुकीले रोएं होते हैं।इनसे वो दुश्मनों से लड़ती भी हैं।
           इनके मुंह के भीतर तीन हिस्से होते हैं।इनका जबड़ा सबसे काम का होता है।इसे ये हर तरफ़ घुमा लेती हैं।ये अपने जबड़ों का इस्तेमाल खोदने,खाना इकट्ठा करने,बिल बनाने,दुश्मनों से लड़ने और काटने में कर सकती हैं।ये अपने छोटे जबड़े से चबाती हैं।और नन्हीं सी जीभ से तरल पदार्थ पीती हैं।कुछ चींटियों की दो और कुछ की एक आंख होती है।कुछ अंधी भी होती हैं।इनके कान तो नहीं होते पर वो अपने आस पास होने वाले कंपनों से आवाज का पता लगा लेती हैं।शायद आपको जान कर आश्चर्य होगा कि हमारी तरह ये आपस में बातें भी करती हैं।चींटियों की सबसे खास बात ये है कि वो बोल तो नहीं सकतीं पर एक दूसरे को छू कर,शरीर से गंध छोड़ कर,जमीन में कंपन पैदा करके भी एक दूसरे तक अपनी बातें पहुंचाती हैं।
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डा0हेमन्त कुमार

सोमवार, 1 सितंबर 2014

घायल हुये शिकारी


जंगल  में जैसे ही पहुंचे,
मोटे कई शिकारी,
सभी जानवर भागे फ़ौरन
आया संकट भारी।

कोई भागा गुफ़ा में अपनी
कोई नदी में कूदा
पर भालू सियार ने मिलकर
तरकीब निकाली न्यारी।

दोनों ने पत्थर फ़ेंके फ़िर
मधु मक्खी के छ्त्तों में
भन भन करती टूट पड़ीं सब
जिधर  छुपे थे शिकारी।


कुछ के चेहरों पर था काटा
किसी के डंक चुभोया
चीख चीख कर वापस भागे
घायल सभी शिकारी।
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हेमन्त कुमार

रविवार, 17 अगस्त 2014

धूर्त भेडि़या

                     
आज से सैकड़ों साल पहले विन्ध्याचल की पहाडि़यों से घिरा हुआ एक अत्यन्त मनोरम जंगल था। उस जंगल में सभी पशु-पक्षी चैन से रहते थे। क्योंकि वहां का राजा सिंह और उसका मन्त्री बन्दर दोनों ही बहुत न्यायप्रिय और प्रजापालक थे। राजा सिंह सदैव प्रजा के कष्टों को दूर करने के लिए तत्पर रहता था। इसीलिए वहां की प्रजा को किसी प्रकार का दुःख नहीं था और सब सुख-चैन की वंशी बजाते थे।

      जंगल के एक छोर पर एक सुन्दर झरना था। उसका पानी बड़ा मीठा था। जंगल के सभी पशु-पक्षी वहीं पानी पीते थे। उसी झरने के पास एक धूर्त भेडि़या रहता था। वह जंगल में रहने वाले सभी पशु-पक्षियों को हमेशा परेशान किया करता था। जंगल में कोई उत्सव होता अथवा किसी भी प्रकार का अच्छा कार्य होता तो वह सदैव उसमें विघ्न उत्पन्न करता था। उससे सभी पशु-पक्षी परेशान थे। कई बार सिंहराज के दरबार में फरियाद भी की गई, परन्तु कोई असर नहीं हुआ। भेडि़या धूर्त होने के साथ ही बहुत चालाक भी था। वह अपराध करते हुए कभी भी रंगे हाथ नहीं पकड़ा गया। तब सिंहराज ने सभी पशु-पक्षियों को सान्त्वना दी कि समय आने पर इसे उचित दण्ड दिया जाएगा।
          कुछ दिनों बाद ही पूरे जंगल भर में सूखा पड़ गया। एक ओर गर्मी का महीना, ऊपर से वह सूखा। अब झरने का पानी भी धीरे-धीरे सूखने लगा था। कुछ दिनों बाद झरने का पानी एकदम सूख गया। जंगल के पशु-पक्षी प्यासे मरने लगे। पूरे जंगल में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई थी। जंगल में सभी परेशान हो उठे थे।अन्त में सिंहराज ने एक दिन जंगलवासियों की एक सभा बुलाई। जंगल में डुग्गी पीट दी गई कि इस सभा में सभी का आना आवश्यक है।
          दूसरे दिन पूरा दरबार खचाखच भरा हुआ था, कहीं भी तिल रखने की जगह नहीं थी। सिंहराज के लिए एक ऊंचा सिंहासन बना था। उसके नीचे प्रधान मन्त्री बन्दर का स्थान था। उसके बाद अन्य मन्त्रियों तथा सभी प्रजाजनों का। सभी जानवर आ चुके थे और बड़ी उत्सुकता से सिंहराज तथा मन्त्री बन्दर के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। थोड़ी ही देर में सभाभवन के द्वार पर खड़े द्वारपाल कुत्ता प्रसाद ने ऐलान किया--‘‘महाराजधिराज ‘‘ सिंहराज पधार रहे हैं ..सभी लोग सावधानी से बैठ गये।
          जैसे ही सिंहराज पधारे सभी पशु-पक्षी उनके सम्मान में खड़े हो गये। सिंहराज बैठ गये तथा उन्होंने सभी को बैठने का संकेत किया। सिंहराज के चेहरे पर छायी हुई चिन्ता की रेखाएं साफ झलक रही थीं। बैठने के बाद सिंहराज ने एक बार उत्पन्न गम्भीर दृष्टि से पूरे दरबार में नजर दौड़ाई। इसके बाद सिंहराज ने एक गम्भीर गर्जना की जिससे सारा जंगल कांप उठा।
          सिंहराज ने कहना आरम्भ किया--‘‘इस जंगल के सभी प्रजागण तथा मन्त्रीगण ! आप जैसा देख रहे हैं कि इस समय चारों ओर अकाल का भीषण प्रकोप है तथा सारे जंगल के पशु-पक्षी उससे परेशान हैं। मुझे यह भी पता लगा है कि जिस झरने से हमस ब जल लेते थे वह भी सूख गया है। अब आप लोग भी अत्यन्त परेशान हैं। मैंने यह समस्या इस जंगल के प्रसिद्ध इंजीनियर नन्हें चीता के सामने रखी थी जो कि अभी पिछले दिनों ही अफ्रीका के जंगलों से इंजीनियरिंग का विशेष अध्ययन करके लौटे हैं। काफी सोच-विचार के बाद वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यदि जंगल के सभी लोग मिलकर सभा भवन के द्वार पर एक कुआं खोद लें तो उससे अच्छी जल की व्यवस्था और कोई नहीं होगी। क्योंकि सभा भवन जंगल के बीचों-बीच स्थित है। यहां से जल ले जाने में सभी को सुविधा रहेगी। यही बात कहने के लिए मैंने आज की यह सभा बुलाई है। मैं यह जानना चाहूंगा कि क्या आप लोग नन्हें चीता की इस योजना से सहमत हैं ? क्या आप लोग उन्हें इस कार्य में सहयोग देंगे ?”
          महाराज सिंह के चुप होते ही सारे जानवर बोल पड़े --‘‘हां, हम लोग इस योजना से सहमत हैं और हम लोग उन्हें पूरी-पूरी सहायता देंगे। सिंहराज ने यह सुनकर कहा, --‘‘आप लोग इस कार्य में सहयोग देंगे, यह जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। मेरा विचार है कि इस शुभ कार्य में देर नहीं करनी चाहिए। कल से ही यह कार्य आरम्भ कर दिया जाय। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आज की यह सभा समाप्त करता हूं।यह कहकर सिंहराज सभा भवन से निकलकर मन्त्रियों के साथ चले गये। उनके जाने के बाद के बाद सभी पशु-पक्षी भी अपने-अपने घर चले गये।
          दूसरे दिन से इंजीनियर नन्हें चीता की देख-रेख में कुए की खुदाई शुरू हो गई। थोड़ी-थोड़ी देर पर खोदने वाले बदल दिए जाते थे। शाम तक सभी लोगों ने मिलकर करीब दस फुट गहरा गड्ढा खोद लिया। इसके बाद दूसरे दिन आने का निश्चय करके सब अपने-अपने निवास में चले गये।
          अगले दिन जब सब लोग वहां पहुंचे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, क्योंकि उन लोगों ने जितना गड्ढा खोदा था वह किसी ने पाट दिया था। किसी की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि यह काम किसने किया। खैर, उस दिन फिर मेहनत करके उन लोगों ने गड्ढा खोदा। परन्तु जब वे तीसरे दिन वहां आए तो फिर उस गड्ढे में मिट्टी भरी हुई थी। इसी तरह प्रतिदिन होने लगा।
          परेशान होकर सभी पशु-पक्षियों ने एक सभा की और उसमें निश्चय किया कि दो लोग मिलकर रात में गड्ढे के पास पहरा देंगें। सबसे पहले दिन खरगोश और हिरन को पहरा देना था। दोनों शाम होते ही अपने-अपने घरों से खाना खाकर सभा-भवन के पास पहुंच गये। दोनों वहीं टहलते हुए आपस में बात करने लगे। बात करते-करते जब काफी रात हो गयी तो दोनों वहीं सभा-भवन के द्वार पर बैठ गये। उनको बैठे हुए अभी थोड़ी ही देर हुई होगी कि उन्हें तरह-तरह की भयानक आवाजें सुनाई पड़ने लगीं। दोनों ने ही इधर-उधर देखा कहीं कुछ नहीं था।
          थोड़ी देर बाद फिर उसी तरह की आवाजें आने लगीं। इस बार जब दोनों ने सामने देखा तो चीख पड़े। उन्हें उस गड्ढे के पास एक सफेद काली छाया हिलती हुई दिखलाई पड़ी जो उन्हीं की तरफ बढ़ रही थी। दोनों भूत-भूत चिल्लाते हुए भाग निकले।

          दूसरे दिन सुबह जब सभी पशु-पक्षी गड्ढे के पास पहुंचे तो गड्ढा फिर पटा हुआ था। खरगोश और हिरन से पूछा गया तो रात की पूरी घटना उन्होंने बता दी। उस घटना को सुनकर किसी भी जानवर को उस पर विश्वास नहीं हो रहा था। तभी भेडि़या बोला, ‘‘अरे मैंने तो पहले ही मना किया था कि वहां पर कुआं मत खोदो। वहां पर तो भूतों का राजा रहता है। भेडि़ये की यह बात सुनकर सभी जानवर डर गये । तब गधे ने कहा, ‘‘अच्छा आज हम और घोड़ा भाई पहरा देंगे। देखते हैं कौन आता है। उस दिन घोड़ा तथा गधा पहरा देने गये। रात में इन लोगों के साथ भी वही घटना घटी। भूत को देखते ही दोनों डर का भाग गये।
          अगले दिन जंगल के सभी जानवर भयभीत होकर सिंहराज के पास पहुंचे और उन्होंने अपनी समस्या उनको बतायी। सिंहराज ने काफी सोच-विचार के यह मामला जंगल के गुप्तचर विभाग की चीफ चुलबुल लोमड़ी को सौंपा। चुलबुल लोमड़ी रात को अकेले ही कुएं के पास गई। रात में जब भूत निकला तो पहले वह डर गयी। फिर ध्यान से देखने पर उसने पहचान लिया। यह तो झरने के पास वाला धूर्त भेडि़या था। वह उस समय चुपचाप उठकर चली गयी।
          दूसरे दिन रात में वह जंगल के पुलिस कप्तान शेरू कुत्ते तथा पुलिस के चार जवानों को लेकर वहां पहुंची। रात में जैसे ही भूत के वेश में भेडि़या निकला चुलबुल लोमड़ी ने तुरन्त पुलिस कप्तान शेरू कुत्ते तथा उसके पुलिस के जवानों को इशारा किया। उन लोगों ने दौड़कर भेडि़ये को दबोच लिया और जंजीरों से बांध दिया।    
          रात किसी तरह व्यतीत हुई। सुबह चुलबुल लोमड़ी तथा पुलिस कप्तान शेरू उस भेडि़ए को लेकर सिंहराज के दरबार में पहुंचे और सिंहराज को बताया कि यी प्रतिदिन भूत बनकर लोगों को डराता था और यही गड्ढे में मिट्टी भर देता था। अब इसे जो चाहें सजा दें।
         सिंहराज ने उस भेडि़ए  की नाक-कान कटवाकर और उसके मुंह में कालिख लगवा कर पूरे जंगल में घुमाया और उसको सभी जानवरों ने मिलकर जंगल से बाहर खदेड़ दिया। इसके बाद सभा-भवन के द्वार पर एक बहुत ही सुन्दर कुआं बना और जंगल के सभी पशु-पक्षी सुख-पूर्वक रहने लगे।
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डा0हेमन्त कुमार

शनिवार, 12 जुलाई 2014

यज्ञ की रक्षा(राम चरित मानस पर आधारित एकांकी नाटक)

मेरे पिता जी श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव के 1974 में प्रकाशित राम चरित मानस पर आधारित चार एकांकी नाटकों के संकलन “मानस के चार फ़ूल” का पहला एकांकी नाटक।
                                                                   

यज्ञ की रक्षा
पात्र
विश्वामित्र - एक मुनि
शंखधर - एक दूसरा मुनि
दशरथ  - अयोध्या के राजा
राम      - दशरथ के पुत्र
लक्ष्मण  - दशरथ के पुत्र
मारीच   - राक्षस
सुबाहु   -  राक्षस
ताड़का  - एक राक्षसी
अन्य    - एक सेवक
          राक्षसों द्वारा वनवासी मुनियों के सताये जाने पर मुनि विश्वामित्र अयोध्या के राजा दशरथ के दरबार में पहुचे। उन्होंने राक्षसों का संहार करने के लिए दशरथ से उनके पुत्र राम और लक्ष्मण को मांगा। दशरथ पुत्रमोह के कारण पहले तो हिचके किन्तु बाद में विश्वामित्र द्वारा समझाये जाने पर स्वीकृति दे दी। राम और लक्ष्मण उस समय छोटी अवस्था के थे फिर भी गुरूजनों की रक्षा के लिए उनमें अपार बल आ गया। उन्होंने महाबली राक्षसों को मार कर आश्रमवासी गुरूजनों और मुनियों की रक्षा की।
                               पहला दृश्य
           (स्थान- मुनि विश्वामित्र का आश्रम। फूलों की उजड़ी हुई लताएं दिखायी पड़ती हैं। कुटी का फ़ूस भी जगह-जगह से नोचा हुआ है। मिट्टी के एक लिपे-पुते ऊॅंचे आसन पर विश्वामित्र आखें बन्द किये पूजा कर रहे हैं।अचानक मारो,पकड़ो,काटो-काटो का भयानक शोर सुनाई पड़ता है। भय से थर-थर कांपते हुए शंखधर का प्रवेश।)
शंखधर-गुरूदेव .... गुरूदेव.... जल्दी उठिये गुरूदेव! राक्षसों का दल इधर ही आ रहा है।
विश्वामित्र- (आंखें खोल कर आकाश की ओर देखते हुए) हे ईश्वर, क्या अब हम शान्ति के साथ एक घड़ी बैठ कर तुम्हारा नाम भी नहीं ले सकते ?(खड़े होकर आसन से नीचे उतर आते हैं। मुख पर गहरी चिन्ता दिखायी पड़ती है।) कुछ समझ में नहीं आता कि क्या किया जाय!
शंखधर- वन में जैसे ही कोई मुनि यज्ञ करने बैठता है ये राक्षस उसमें बाधा डालने के लिए दौड़ पड़ते हैं।
विश्वामित्र-लगता है, हमें अपने आश्रम खाली करने पड़ेंगे। देखो, उन दुष्टों ने ये लताएं किस तरह नोच  डाली हैं।        कुटी को कैसा उजाड़ दिया है।
शंखधर-लेकिन गुरूदेव आश्रम छोड़कर हम जायेंगे कहां?क्या कोलाहल भरे नगरों में चल कर यज्ञ और तपस्या करेंगे ?
विश्वामित्र- तुम ठीक कहते हो! हम आश्रम छोड़कर कहीं जा भी तो नहीं सकते।
शंखधर-इन राक्षसों के सरदार मारीच और सुबाहु ने तो बहुत ही उत्पात मचा रक्खा है। कल दो मुनियों को उठा ले गये और उन्हें मार कर खा गये।
विश्वामित्र-क्या ताड़का कम भयानक है। वह कल यहां आयी और आश्रम के एक बालक को मार कर खा गई।
शंखधर- हां देखिये, यहां धरती पर उसका खून फैला हुआ है।
विश्वामित्र-(आखों में आसू भर कर) यह बालक मुझे बड़ा प्यारा था। यह बहुत छोटा था तभी से इस आश्रम में रहने लगा था।
शंखधर- क्या इन राक्षसों के वध का कोई उपाय नहीं है ?
विश्वामित्र- क्यों नहीं है !
शंखधर- किसके हाथ से इनका वध हो सकता है गुरूदेव ?
विश्वामित्र- अयोध्या नरेश दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण के हाथ से इनका वध हो सकता है। ये दोनों भाई बड़े वीर और साहसी हैं।
शंखधर- लेकिन वो बहुत छोटे हैं।क्या इतने छोटे बालक ऐसे भयानक और बलवान राक्षसों को हरा सकते हैं ?
विश्वामित्र- अवश्य हरा सकते हैं। लेकिन ......(अचानक विश्वामित्र के मुख पर चिन्ता छा जाती है।)
शंखधर-आप चुप क्यों हो गये गुरूदेव ?
विश्वामित्र- राजा दशरथ अपने पुत्रों को बहुत प्यार करते हैं। बुढ़ापे में उनके चार पुत्र हुये हैं। पता नहीं इस काम के लिए वे राम लक्ष्मण को देंगे या नहीं।
शंखधर-देगे क्यों नहीं। जब आप इतने अच्दे काम के लिए कहेंगे तो वे कभी इन्कार नहीं करेंगे।
विश्वामित्र- आशा तो मुझे भी यही है।
शंखधर- तब आप अवश्य जाइये गुरूदेव नहीं तो राक्षस हम सब को मार कर खा जायेंगे।
(अचानक बहुत निकट राक्षसों का भयानक कोलाहल सुनाई पड़ता है।मारो काटो की आवाजें आती हैं।मारीच और सुबाहु का प्रवेश)
मारीच- कहां है विश्वामित्र ! आज हम उसे कच्चा चबा जायेंगे।
                           (शंखधर भय से थर-थर कांपता है।)
विश्वामित्र- क्यों मारीच, तुम्हें हम लोंगों के यज्ञ में बाधा डालने से क्या सुख मिलता है ? तुम बेचारे निर्दोष मुनियों की हत्या क्यों करते हो ? बोलो सुबाहु !
सुबाहु- हाः हाः हाः हाः ! हमें आदमियों का खून मीठा लगता है विश्वामित्र !तुम लोग जंगल के मीठे फल खाते हो इसलिये तुम लोगों का खून तो और भी मीठा होता है। हाः हाः हाः ....।
विश्वामित्र- सावधान सुबाहु, तुम्हारा यह अत्याचार अधिक समय तक नहीं चल पायेगा। तुमने हम लोगों को सताना बन्द नहीं किया तो तुम्हें इसका फल भुगतना पड़ेगा।
सुबाहु- हाः हाः हाः हाः ! सुनते हो मारीच, यह विश्वामित्र का बच्चा क्या बकता है। अरे ओ मुनि, कान खोल कर सुन ले, दुनिया में ऐसा कौन पैदा हुआ है जो हमारा बाल भी बांका कर सके।
मारीच- हम लोगों पर लंका नरेश महाबली रावण की कृपा है जिससे देवताओं के राजा इन्द्र तक कांपते हैं।रावण ने काल तक को अपने वश में कर लिया है। हाः हाः हाः ................।
विश्वामित्र- लेकिन भगवान उस रावण से भी अधिक बलवान हैं। दुष्टों तुम लोगों का संहार करने के लिए उनका जन्म हो चुका है।
मारीच- तुम्हारा भगवान जन्म लेता रहे, हमें उसकी परवाह नहीं है। इस समय तो हम भूखे हैं। हमें तुम्हारा खून चाहिये।
सुबाहु- अरे मारीच, इसका खून हम लोग कल पीयेंगे,चलो आज दूसरे मुनि को ही पकड़ कर ले चलें।
          (शंखधर भय से थर-थर कांपता है।)
विश्वामित्र-(शंखधर को पीछे करके) नहीं, मेरे रहते तुम इस पर हाथ नहीं उठा सकते।
         (अचानक पीछे से गरजती हुई भयानक वेश में राक्षसी ताड़का का प्रवेश।)
ताड़का- अरे, इस मुनि को तो मैं ले जाती हूं। चलो, हम तीनों इसे बांट कर खायेंगे।(ताड़का झपट कर शंखधर को विश्वामित्र के हाथ से छुड़ा लेती है और जिधर से आई थी उधर ही उसे खींचती हुई लेकर भाग जाती है। विश्वामित्र लाचार से खड़े देखते रहते हैं।)
विश्वामित्र- (दुःखी स्वर में) नहीं, अब मुझे कुछ करना ही चाहिये। मैं आज ही राजा दशरथ के पास चलता हूं                   (प्रस्थान। परदा गिरता है।)
              दूसरा दृश्य
       (स्थान-राजा दशरथ का महल। एक सजे हुए कमरे में राजा दशरथ बैठे हुए हैं। सेवक का प्रवेश। सेवक दशरथ को सिर झुका कर प्रणाम करता है।)
सेवक- महाराज की जय हो। महामुनि विश्वामित्र भोजन कर चुके।
दशरथ- अच्छा! उन्हें विश्राम के लिए ले जाओ। महल के सभी सेवकों को मेरा आदेश सुना दो कि वे सब तरह से महामुनि के आराम का ध्यान रखें।
सेवक-  लेकिन महराज जल्दी ही आश्रम लौट जाना चाहते हैं। इसलिए वे आपसे बिदा मांगने आये हुये हैं।
दशरथ- अच्छी बात है,उन्हें आदर के साथ ले आओ।
          (सेवक का प्रस्थान। थोड़ी देर बाद सेवक विश्वामित्र को लेकर वापस आता है। राजा दशरथ विश्वामित्र के सम्मान में खड़े हो जाते हैं और उनके चरणों में सिर झुका कर प्रणाम करते हैं। विश्वामित्र राजा दशरथ को आशीर्वाद देकर पास के दूसरे आसन पर बैठ जाते हैं।)
दशरथ- मुनिवर, मेरा अहोभाग्य है कि आज आपने इस कुटिया में प्रसाद ग्रहण किया।
विश्वामित्र-राजन तुम धन्य हो कि तुम्हारे यहां स्वयं भगवान के पुत्र के रूप में अवतार लिया है।
दशरथ- (दोनों हाथ जोड़कर) सब आप गुरूजनों की कृपा है। मैं तो निराश हो चला था कि अब मुझे इस जन्म में सन्तान का मुंह देखने को नहीं मिलेगा।
विश्वामित्र-जिस पर भगवान की कृपा होती है उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है। इस पृथ्वी पर पाप बढ़ गया है।तुम्हारे पुत्र पापियों का विनाश करेंगे।
दशरथ- मेरे पुत्र दीन-दुखियों के काम आ सके तो अपना जीवन सफल समझूंगा। मुनिवर, अब आप अपने आगमन का कारण बतायें। मैं आपकी इच्छा जल्दी से जल्दी पूरी करना चाहता हूं
विश्वामित्र- राजन् आजकल राक्षस आश्रमवासी मुनियों को बहुत कष्ट दे रहे हैं। उनके कारण हम लोगों का जीवन हमेशा संकट में रहता है। वे रोज मुनियों का वध करते हैं और यज्ञ में बाधा पहुंचाते हैं।
दशरथ- मैं अभी सेना सजा कर चलता हूं मुनिवर! राक्षसों के समूह को मेरी सेना चुटकी बजाते समाप्त कर देगी।
विश्वामित्र- नहीं राजन्, उन राक्षसों को वर मिला हुआ है। वे केवल आपके पुत्र राम के हाथ से ही मारे जा सकते हैं। इसलिए मैं छोटे भाई लक्ष्मण सहित रघुनाथ जी को मांगने आया हूं।
दशरथ- (चिन्ता में भर कर) आप राम और लक्ष्मण को मांगने आये हैं ?
विश्वामित्र- (हॅस कर) राजन, तुम मोह में पड़ गये ? राम और लक्ष्मण को मेरे साथ भेज कर तुम इस संसार में धर्म और यश पाओगे।
दशरथ- (कष्ट से) मुनिवर, इस बुढ़ापे में आकर मुझे चार पुत्र हुये हैं। पुत्रों का एक पल का भी वियोग मुझे सहन नहीं होता। आप मुझसे मेरा सारा खजाना ले लीजिए, यहां तक कि मैं प्राण तक दे सकता हूं। लेकिन मुनिवर,आप इन पुत्रों को मत मांगिये।
विश्वामित्र- राजन्, मैं खजाना या आपके प्राण लेकर क्या करूंगा। उन राक्षसों से हमारी रक्षा तो केवल राम और लक्ष्मण ही कर सकते हैं।
दशरथ- मुनिवर, मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि इतने कोमल शरीर वाले छोटे-छोटे बालक उतने बलवान राक्षसों को कैसे मार सकेंगे।
विश्वामित्र- राजन्, मैं आपसे पहले ही कह चुका हूं कि राम लक्ष्मण साधारण बालक नहीं है। वे साक्षात भगवान के अवतार हैं। उनके भीतर अपार शक्ति है।
दशरथ- (हिचक के साथ) लेकिन मुनिवर ....................!
विश्वामित्र-मैं आपको विश्वास दिलाता हूं राजन्, आपके पुत्रों का बाल बांका नहीं होगा। वे गुरूजनों की रक्षा के लिए चल रहे हैं इसलिए संसार में उनका नाम अमर हो जायगा।
दशरथ- (सेवक से) जाओ, राम और लक्ष्मण को ले आओ।
                              (सेवक का प्रस्थान)
 विश्वामित्र- (प्रसन्न होकर) राजन् तुम्हारा यश बढ़े।
दशरथ- आप गुरूजनों की आज्ञा मैं कैसे टाल सकता हूं
  (सेवक के साथ धनुष-बाण लिए राम और लक्ष्मण का प्रवेश। वे पहले विश्वामित्र के, फिर पिता के चरण छूते हैं। दोनों उन्हें आशीर्वाद देते हैं।
दशरथ-बेटा राम और लक्ष्मण,मुनिवर के आश्रम में राक्षसों ने बहुत उपद्रव मचा रखा है।जाओ,आश्रमवासियों की रक्षा करो।
        (राम और लक्ष्मण के हाथ अचानक अपने धनुष-बाण पर चले जाते हैं। फिर वे प्रसन्न मुख
         से एक दूसरे को देखते हैं।)
राम- (सिर झुका कर ) आपकी आज्ञा पूरी होगी पिता जी।
विश्वामित्र- अच्छा राजन्, मैं चलता हूं। शीघ्र ही दोनों भाई सकुशल लौट कर आयेंगे।         
          (दशरथ विश्वामित्र का चरण स्पर्श करते हैं। विश्वामित्र उन्हें आशीर्वाद देकर द्वार की ओर बढ़ते हैं। उनके पीछे-पीछे राम और लक्ष्मण का प्रस्थान। परदा गिरता है।)
                                           तीसरा दृश्य
(स्थान- विश्वामित्र का आश्रम। राम और लक्ष्मण धनुष-बाण लिए आश्रम की रक्षा करते दिखायी पड़ते हैं। विश्वामित्र तथा दूसरे मुनिगण यज्ञ करने में लगे हुए हैं।)
लक्ष्मण- भैया, पता नहीं क्यों यहां आकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। ऐसा आनन्द तो मुझे कभी अपने अयोध्या के राजमहलों में भी नहीं मिला।
राम-लक्ष्मण, गुरूजनों की सेवा में ऐसा ही आनन्द मिलता है। फिर मुनिवर ने हमें ऐसी विद्या भी तो दी है जिससे भूख प्यास नहीं सताती और शरीर का बल भी कई गुना बढ़ जाता है।
लक्ष्मण- (हॅसकर) भैया, जब भी हम लोग गुरूजनों की सेवा में लगे है हमें लाभ ही लाभ हुआ है।
राम-कल आते समय रास्ते में राक्षसी ताड़का को मारकर हमें कितना सुख मिला।
लक्ष्मण- हां, भैया ! सुनते हैं कि ताड़का ने यहां बड़ा उत्पात मचा रखा था।उसने आश्रम के सारे पशुओं को मार डाला। वह बेचारे मुनियों को पकड़ कर ले जाती थी और उनका खून पी जाती थी।
राम- अभी दो बड़े राक्षस मारीच और सुबाहु बचे हुए हैं। जब तक उनका वध नहीं हो जाता राक्षस यहां सबको कष्ट देते रहेंगें
लक्ष्मण- मेरी तो इच्छा हो रही है कि कब वे दिखाई पड़ें और मैं उन्हें अपने वाणों से छलनी कर दूं
(अचानक बाहर मारो काटो चिल्लाते राक्षसों का शोर सुनायी पड़ता है। दोनों भाई सावधान होकर धनुष पर बाण चढ़ा लेते हैं।)
राम- मुनिवर,आप निश्चिन्त होकर अपना यज्ञ करें।हम दोनों भाई एक भी राक्षस को आपके निकट नहीं हुंचने देंगे।
                                   (गरजते हुए मारीच का प्रवेश)
विश्वामित्र-देखो राम, यही मारीच है।
मारीच- (दांत किटकिटा कर) हां मैं ही मारीच हूं। ओह लगता है विश्वामित्र ने आज हम लोगों के लिए बड़ा बढि़या कलेवा मॅगा रखा है।
विश्वामित्र- मारीच, ये दोनों भाई तुम्हारा कलेवा नहीं काल हैं।
राम- (रोष से) सावधान, एक पग भी आगे बढ़ाया तो मेरा बाण तुम्हारा अन्त कर देगा।
मारीच- (जोर से हॅस कर) क्या कहने, छोटे मुंह बड़ी बात। अरे बच्चों अभी तो तुम्हारे दूध के दांत भी नहीं टूटे। जाओ अभी गुल्ली डंडा खेलो, बड़े होकर आना तब हमसे लड़ना।
लक्ष्मण- भैया, अब मुझसे नहीं रहा जाता। आज्ञा दीजिए,मैं इस दुष्ट का पल भर में अंत कर दूं
राम- नहीं लक्ष्मण, इससे मुझे निपटने दो। सावधान मारीच, तुम्हारा काल तुम्हारे सिर पर आ पहुंचा है।
मारीच- (अट्टहास करके) ओह, तो मुझे पहले तुम्हारा ही मजेदार खून चखना पड़ेगा। (गरजता हुआ आगे बढ़ता है। राम बाण मारते हैं। मारीच बाण की चोट खाये स्थान को दोनों हाथों से दबाकर पीड़ा से चीखता हुआ बाहर भागता है।)
राम- मुनिवर, आपकी कृपा से इस अत्याचारी राक्षस का आतंक भी समाप्त हुआ।
विश्वामित्र-अभी इसका साथी सुबाहु बचा हुआ है राम। वह भी आता ही होगा (अचानक भयानक रूप से गरजते हुए सुबाहु का प्रवेश।)
सुबाहु-(क्रोध से) कहां है मारीच को बाण मारने वाले बालक ? ओह, तुम लोग हो ? आज मैं अपना आहार तुम्हीं लोगों को बनाऊॅगा।
राम-(हॅस कर) लेकिन सुबाहु, मैंने उससे भी पहले तुम्हें काल के आहार के लिए चुन लिया है।
सुबाहु- काल ! हाः हाः हाः ! काल तो मेरी मुट्ठी में है लड़कों। मैं तुम दोनों को एक साथ चबाता हूं। हाः हाः हाः।   (जैसे ही वह आगे बढ़ता है राम उसे बाण मारते हैं। बाण लगते ही वह चिल्लाता हुआ बाहर की ओर भागता है। कुछ देर से उसकी भयानक पीड़ा भरी चीख सुनाई पड़ती है।)
राम- लीजिए मुनिवर, इस दुष्ट का भी अन्त हो गया।
विश्वामित्र-(प्रसन्नता से) राम, आज तुम दोनों भाइयों ने आश्रम वासी मुनियों का कष्ट दूर किया है। संसार में तुम्हारा यश फूल की तरह फैलेगा।
राम-गुरूजनों की सेवा तो हम बालकों का कर्तव्य ही है। मुनिवर आप लोगों की रक्षा करके हम दोनों भाइयों का जन्म सफल हुआ।
विश्वामित्र-मैं आशीर्वाद देता हूं राम, तुम दोनों भाइयों की यह गुरू भक्ति सदा इस संसार में दूसरे बालकों को प्रेरणा देती रहे। तुम्हारे चरणचिन्हों पर चलने वालों को तुम्हारा बल और बुद्धि मिले। तुम्हारी तरह उनका नाम भी अमर हो।
राम- (विश्वामित्र के चरण छूकर) आपके आशीर्वाद से हमारा जीवन धन्य हुआ मुनिवर।
विश्वामित्र- अब मैं चाहता हूं कि तुम लोग कुछ दिन इस आश्रम में रह कर घूमो फिरो। जब मन में आये अयोध्या वापस चले चलना।
लक्ष्मण- हम लोगों का सौभाग्य है मुनिवर जो आपने यहां रहकर हमें कुछ सीखने का अवसर दिया। भैया, हम लोग अपनी कुटिया में चलें।
          (दोनों भाइयों का प्रस्थान। विश्वामित्र उन्हें मुग्ध दृष्टि से देखते रहते हैं। परदा गिरता है। )
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प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव