मंगलवार, 14 अगस्त 2012

मुंडभर की महाबीरी



(हमारे देश को आजाद कराने में बहुत सारे वीर पुरुषों और महिलाओं ने अपनी शहादत दी। हम उनमें से कुछ को जानते हैं,उन्हें याद करते हैं। पर कुछ आज भी गुमनामी के अंधेरों में खोये हुये हैं।ऐसी ही एक वीरांगना थीं मुजफ़्फ़र नगर की कैराना तहसील के मुंडभर माजू गांव की महाबीरी देवी।)
                              
              मुंडभर की महाबीरी

           महाबीरी की आज फ़िर बापू से बहस हो गई।बात बस इतनी कि बापू उससे ठाकुर साहब के घर सूप पहुंचाने को कह रहे थे।महाबीरी ने मना कर दिया आखिर क्यों जाए वह उनके घर सूप या पंखा पहुंचाने?ठाकुर साहब के घर इतने नौकर चाकर हैं।वह किसी को भेज कर मंगा नहीं सकते? बस इतनी सी बात कहते ही बापू उससे नाराज हो गये और बिना दाना पानी किए खुद चले गए चिलचिलाती धूप में परेशान होने के लिये।
    बापू के जाने के बाद महाबीरी बैठ कर पंखे बनाने के लिए बांस छीलने लगी।पर आज उसका मन बांस छीलने में नहीं लग रहा था।उसके हाथ में हंसिया थी पर उसका दिमाग कहीं और उलझा था।वह सोच रही थी कि आखिर हम लोग इन बड़ी जाति वालों से दब कर क्यों रहें।क्या सिर्फ़ इसलिए कि हम लोग नीची जाति के हैं? क्या हमारी समाज में कोई इज्जत नहीं?क्या हम केवल बड़ों की चाकरी करने के लिये पैदा हुए हैं?उसका दिमाग अक्सर इन्हीं सवालों में उलझ जाता था।लेकिन वह अपने बापू को कैसे समझाए?
       महाबीरी जब भी बापू को समझाने की कोशिश करती उनका एक ही जवाब होता,बिटिया, हम  लोग गरीब हैं। हमारा जनम ही बड़े लोगों की गुलामी करने के लिये हुआ है।लेकिन किशोरी महाबीरी को बापू की यह बात हजम नहीं होती।वह हमेशा सोचती कि कैसे इन बड़े लोगों का विरोध करे।
     एक दिन महाबीरी पंखे बनाने के लिये बांस काटने जा रही थी।रास्ते में उसने गांव के पांडे के लड़के को हरिया की लड़की से छेड़खानी करते देख लिया।बस महाबीरी का तो खून खौल उठा। उसने पांड़े के लड़के को चार पांच झापड़ मार दिया।पांड़े का लड़का उसे देख लेने की धमकी देकर भाग गया।
हरिया की लड़की उसके गले लग कर रोने लगी।महाबीरी ने उसे समझाया, अरे रोती काहे है पगली।रोने से काम नहीं चलेगा हिम्मत दिखा और इन बड़े आदमियों का विरोध कर नहीं तो ये हमें जिन्दगी भर दबा कर रखेंगे।
     इस घटना के बाद से गांव भर में महाबीरी की चर्चा होने लगी। पुरुषों में भी,महिलाओं में भी।किसी के ऊपर कोई मुसीबत आती तो महाबीरी के पास पहुंच जाता। कभी किसी गरीब को कोई सताता तो महाबीरी उसका जीना हराम कर देती। ऊंची जाति वाले भी महाबीरी से डरने लगे थे। हां,बापू जरूर उसे बीच बीच में डांट देते थे।पर मन में वो भी उसके कामों की तारीफ़ करते थे।
     धीरे-धीरे महाबीरी ने अपने जैसी बहादुर युवतियों को इकट्ठा कर एक समूह बना लिया। इस समूह का काम ही था गरीबों और असहायों की रक्षा और अमीरों के अत्याचारों से उन्हें बचाना। महाबीरी ने एक दिन अपने समूह की सभी युवतियों की एक सभा बुलाई। इस बैठक में उन्होंने अपनी सभी सहेलियों से कहा कि,सखियों,हम सभी मिलकर आज शपथ लेते हैं कि हम जीवन भर अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहेंगे। गरीबों और सहायों की रक्षा करेंगे। भले ही इसके लिये हमें जान क्यों न गंवानी पड़े। उनकी सभी सखियों ने उनका साथ देने का वचन दिया।
      कुछ ही समय में महाबीरी के समूह की चर्चा आस पास के गांवों में भी फ़ैल गयी। अपने समाज से तो महाबीरी की लड़ाई चल ही रही थी। लेकिन इधर अंग्रेजों के साथ हो रही लड़ाइयों से भी वह चिन्तित रहती थीं। पढ़ी लिखी न होने के बावजूद महाबीरी के अंदर देश,समाज और आम जन के बारे में सोचने समझने की अद्भुत क्षमता थी। वह अक्सर अपनी सहेलियों से कहती भी कि कभी मौका लगा तो हम लोग मिलकर इन गोरों के छक्के छुड़ाएंगे।
       एक दिन महाबीरी देवी गांव के बाहर अपने समूह के साथ कोई बैठक कर रही थीं। अचानक गांव की ओर से बुधुआ दौड़ता हुआ वहां आ गया। दूर से दौड़ कर आने के कारण वह हांफ़ भी रहा था।
   क्या हुआ बुधुआ?तू इतना घबराया क्यों है?हमारी बस्ती में तो सब ठीक है? महाबीरी ने पूछा।
महाबीरी दीदी,बहुत बुरी खबर है। अंग्रेजों की सेना की एक टुकड़ी बाज़ार में मार काट करती हुयी हमारे गांव कि ओर बढ़ रही है। लग रहा है अब हमारे गांव में कोई जिन्दा नहीं बचेगा। बुधुआ हांफ़ता हुआ बोला।
     डरो मत। जाकर गांव वालों से कह दो सब सुरक्षित जगहों पर पहुंच जाएं। हम आभी वहां पहुंच रहे हैं। महाबीरी ने बुधुआ को समझाया।
    इसके बाद तो महाबीरी के शरीर में बिजली भर गई। वह तुरंत खड़ी हो गयीं। उन्होंने अपने समूह की सभी महिलाओं को गिना। कुल 22 महिलाएं थीं। महाबीरी ने तुरंत फ़ैसला कर लिया। युद्ध करना ही एक उपाय है।
     सहेलियों,अब समय आ गया है अपनी बहादुरी दिखाने का। हमारी संख्या केवल बाईस है। पर अंग्रेजों के दांत खट्टे करने के लिये हम काफ़ी हैं। चलिये गांव से गंड़ासे,फ़रसे,भाले,हंसिया जो भी मिले लेकर हमें गांव के बाहर पहुंच जाना है। गोरों को वहीं रोकना होगा।महाबीरी देवी जोश से बोलीं। हमें किसी भी कीमत पर इन गोरों को गांव में घुसने नहीं देना है।
         दस मिनट के भीतर ही महाबीरी देवी गांव की 22 युवतियों की फ़ौज लेकर गांव के दूसरी ओर पहुंच गयीं। उनके हाथों में गंड़ासे,फ़रसे,कुदाल,हंसिया जैसे हथियार थे। अंग्रेज इन मुट्ठी भर औरतों को देख कर हंस पड़े। उन्हें लगा कि गांव की ये भोली औरतें भला क्या करेंगी? लेकिन इससे पहले कि गोरे कुछ समझते महाबीरी देवी ने जै भारत माता का नारा लगाया और सभी टूट पड़ीं अंग्रेजों पर। अंग्रेज हतप्रभ रह गये। महाबीरी देवी के शरीर में तो मानो बिजली भर गयी थी। वह दौड़-दौड़ कर अंग्रेजों पर वार कर रही थीं। लेकिन 22 महिलाएं अंग्रेजों की फ़ौज को भला कब तक रोक पातीं। एक-एक कर सब शहीद होती गयीं। अन्त में महाबीरी देवी भी मारी गयीं। अंग्रेज गांव में घुस गये लेकिन भारी नुक्सान उठाने के बाद। महाबीरी और उनकी सहेलियों ने उनकी हालत पस्त कर दी थी।
      बहादुर तेजस्विनी महाबीरी देवी इतिहास बन गयीं।लेकिन वो अपने पीछे वीरता और बहादुरी की एक अद्भुत मिसाल छोड़ गयीं। मुजफ़्फ़र नगर में कैराना तहसील के मुंडभर माजू गांव के लोग आज भी उनकी बहादुरी और वीरता के किस्से अपने बच्चों को सुनाते हैं।
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डा0हेमन्त कुमार

रविवार, 5 अगस्त 2012

क्या होता है बादल फटना


      रिमझिम बारिश में भीगना और बारिश के पानी में कागज की नावें चलाना सभी को अच्छा लगता है। ये बारिश हमारी पृथ्वी के लिए, मानव जीवन के लिए बहुत जरूरी है और फायदे मंद भी। इससे हमारी फसलें, नदियों का जल स्तर मौसम सभी कुछ प्रभावित होता है। कभी ज्यादा बारिश हो गयी तो नुकसान भी होता है।
            आज ही आपने अखबारों में पढ़ा होगा कि अपने पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में बादल फ़टने से भारी तबाही हुयी है।बहुत सारे व्यक्तियों की जानें गयी हैं और बहुत से लोग लापता हैं।कई घर,होटल और दूकानें बाढ़ की तेज धार में बह गये हैं।
         आपने कभी सोचा है  कि ये बादल फटना क्या होता है? बादल फटना यूं समझ लीजिये कि किसी छोटी सी जगह पर आसमान से पूरी की पूरी एक नदी का पानी  एकदम से बह उलट तो इसी घटना को बादल फटना कहेंगे। बादल फटने की घटना के बारे में पूरी तरह जानने के लिए हमें ये जानना जरूरी है कि बादल कितनी तरह के होते हैं ?
            बादलों की आकृति, ऊंचाई के आधार पर इन्हें तीन मुख्य वर्गों में बांटा गया है। और इन वर्गो में कुल दस तरह के बादल होते हैं। पहले वर्ग में आते है निम्न मेघ या लो क्लाउड्स।इनकी ऊंचाई ढाई किलोमीटर तक होती है। इनमें एक जैसे दिखने वाले भूरे रंग के स्तरी या स्ट्रेटस बादल, कपास के ढेर जैसे कपासी या क्यूमलस, गरजने वाले काले रंग के कपासी-- वर्षी,(क्यूमलोनिंबस) भूरे काले वर्षा स्तरी  (निम्बोस्ट्रेटस) और भूरे सफेद रंग के स्तरी-कपासी (स्ट्रेटोक्यूमलस) बादल आते हैं। बादलों का दूसरा वर्ग है मध्य मेघ का। इनकी ऊंचाई ढ़ाई से साढे़ चार किलोमीटर तक होती है। इस वर्ग में दो तरह के बादल हैं अल्टोस्ट्रेटस और अल्टोक्यूमलस। तीसरा वर्ग है उच्च मेघों का। इनकी ऊंचाई साढ़े चार किलोमीटर से ज्यादा रहती है। इस वर्ग में सफेद रंग के छोटे-छोटे साइरस बादल, लहरदार साइरोक्यूमलस और पारदर्शक रेशेयुक्त साइरोस्ट्रेटस बादल आते हैं।
बादलों के प्रकार
क्यूमोलोनिंबस बादल 
                            इन बादलों में से कुछ हमारे लिए फायदेमंद बारिश लाते हैं तो कुछ प्राकृतिक विनाश। बादल फटने की घटना के लिए क्यूमोलोनिंबस बादल जिम्मेदार हैं।ये बादल देखने में गोभी की शक्ल  के लगते हैं। ऐसा लगाता है आकाश में कोई बहुत बड़ा गोभी का फूल तैर रहा हो। इनकी लंम्बाई 14 किलोमीटर तक होती है।
            अब आप सोचेंगे कि देखने में इतने सुन्दर बादल कैसे इतनी बारिश एक साथ कर देते हैं। दरअसल जब क्यूमोलोनिंबस बादलों में एकाएक नमी पहुंचनी बन्द हो जाती है या कोई बहुत ठंडी  हवा का झोंका उनमें प्रवेश कर जाता है, तो ये सफेद बादल गहरे काले रंग में बदल जाते हैं। और तेज गरज के साथ उसी जगह के ऊपर अचानक बरस पड़ते हैं। ऐसी बारिश ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में ही होती है।क्यूमोलोनिंबस बादलों के बरसने की रफ्तार इतनी तेज होती है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। यूं समझ लें कि कुछ ही देर में आसमान से एक पूरी की पूरी नदी जमीन पर  उतर आती है। जरा सोचिये कितनी खतरनाक होती है ये बारिश। हमारे पड़ोसी राज्य उत्तराखण्ड के नैनीताल शहर में बादल फटने से अभी तक की आधिकतम बारिश होने का रिकार्ड  24 घण्टों में 509.3 मिलीमीटर का दर्ज है।

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डा0हेमन्त कुमार

सोमवार, 25 जून 2012

सरकस


हंगामा मच गया गांव में,
जब आया एक सरकस,
मुन्नी गुड्डू मां से बोले,
हमें दिखाओ सरकस।

बैठ के इक्के पर सब पहुंचे,
जहां लगा था सरकस,
लिया टिकट और लगे देखने,
सब बच्चे फ़िर सरकस।

भीड़ देख कर शेर दहाड़ा,
नहीं दिखाना सरकस,
शेर के पीछे सभी जानवर,
छोड़ चले फ़िर सरकस।
 हंगामा मच गया गांव में,
जब आया एक सरकस।
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हेमन्त कुमार

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

पुस्तक लगते हैं सब फूल

मेरे इन  नन्हें  पौधों  पर
कितने  सारे  आए  फूल
रोज सींचती थी मां भी तो
कह कह कर आएंगे  फूल।


हरे हरे पत्तों  के  अन्दर
छिप छिप झांके प्यारे फूल
लगता है जैसे पौधों  की
हंसी  बने  हैं सारे  फूल।


मुझको तो तारों जैसे  ही
सुंदर लगते हैं सब  फूल
कविता और कहानी की सी
पुस्तक लगते हैं  सब फूल।
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कवि :दिविक रमेश
श्री दिविक रमेश हिन्दी साहित्य  के प्रतिष्ठित कथाकार,कवि, एवम बाल साहित्यकार हैं।आपकी अब तक आलोचनात्मक निबन्धों, कविता,बाल कहानियों,बालगीतों की 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।तथा आप कई राष्ट्रीय एवम अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किये जा चुके हैं।वर्तमान समय में आप दिल्ली युनिवर्सिटी से सम्बद्ध मोती लाल नेहरू कालेज में प्राचार्य पद पर कार्यरत हैं।
मोबाइल न0--09910177099
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित।

बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

चिडियों का अनशन

कोयल ने इक दिन जल्दी से
सब चिड़ियों को पास बुलाया
कटते जाते पेड़ सभी अब
उसने सबको ये बतलाया।

कहां रहेंगे हम सब बहना
कहां बनेगा नीड़ हमारा
कैसे समझाएं मानव को
सबने मिलके बुद्धि दौड़ाया।

नन्हीं सोन चिरैया चहकी
बोली कू कू कर के
बाबा गांधी ने अनशन से
गोरों को था दूर भगाया।

क्यों ना हम भी ऐसा ही कुछ
नया अनोखा मार्ग बनाएं
पेड़ों का कटना भी रोकें
अपने घर जंगल को बचाएं।

खुश हो गई फ़िर चिड़िया सारी
सोन चिरैया की बातों से
मौन का व्रत रख करके हम भी
छेड़ेंगे अब जंग इक न्यारी।
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शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

मौत के चंगुल में(भाग-3)


वाटसन का परिवार

                            अपाहिज बच्चे एटलस जहाज पर दुनिया की सैर के लिए कैसे निकले,एटलस,तूफान में कैसे फंस गया, कैसा होता है समुद्री तूफान?क्या वे बच्चे हमेशा के लिए समुद्र के थपेड़ों में समा गए? लेकिन मेरे दोस्तों,थोड़ा धैर्य रखो तो तुम्हें इस कहानी में बहुत आनंद मिलेगा।पहले हम वाटसन के परिवार से परिचित हो लें।उसके परिवार की जाने बिना यह कहानी अधूरी लगेगी।
        यह है ग्यारह साल का नन्हां किटी।उसकी आंखें झील की तरह नीले रंग की थीं। वे हमेशा चमकती रहती थीं।उसके पतले गुलाबी होठ अक्सर किसी मीठे गीत के बोल गुनगुनाते रहते। उसके सुनहरे बाल रेशम की तरह मुलायम और खूबसूरत थे।जब वह केवल तीन साल का ही था,आग में गिर जाने से उसका दाहिना पैर बिल्कुल जल गया था। उसकी जान बचाने के लिए डाक्टरों ने घुटने के नीचे उसकी एक टांग काट दी थी।अब वह दो छोटी बैसाखियों के सहारे चलता था।
        किटी स्कूल का मानीटर था।वह स्कूल में तो हर बच्चे पर ध्यान रखता ही था।हास्टल में भी उनके खाने पीने का पूरा ख्याल रखता।उसके रहते किसी बच्चे को तकलीफ नहीं हो पाती थी। अगर बच्चों में झगड़ा होने लगता तो वह बड़ी जल्दी उसे सुलझा देता।जहां उसके होठों पर एक हल्की मुस्कान आई और उसने अपना हाथ हिला कर रुकने का संकेत किया।लड़ते बच्चों पर जैसे जादू हो जाता ! वे फौरन भीगी बिल्ली बन जाते और फिर आपस में खेलने लगते।
               किटी को कभी किसी ने उसकी प्यारी बिल्ली जेनी से अलग नहीं देखा।बगुले के पंख जैसे सफेद और मुलायम घने बालों वाली जेनी किटी के कंधे पर दुबकी बैठी रहती।रात जब वह बैसाखी को ठक ठक करता हुआ सब के सोने की व्यवस्था देखता फिरता,जेनी उसके पांवों से सटी सटी चलती।किटी के नजदीक रहकर मासूम जेनी दुनिया के सारे डर भूल जाती। किटी और जेनी की यह जोड़ी मशहूर थी।
            पीटर उमर में किटी से कुछ बड़ा था मगर दुबला पतला और देखने में बेजान सा लगता।वह या तो जल्दी किसी काम को करता न था और अगर करने लगता तो खाना पीना भूलकर उसे ही करता जाता।चूंकि जन्म से ही उसके दोनों हाथ गायब थे इस लिए उसे पैरों से किया जाने वाला काम सौंपा जाता। वह पैरों से मसल मसल कर क्यारियों की मिट्टी भुरभुरी किया करता था।एक क्यारी से दूसरी क्यारी में पानी लगा देना भी उसके लिए बड़ा आसान था।पढ़ने में भी उसका यही हाल था।अक्सर गिनती की भूलों पर झिड़कियां खा जाता।
       जिस दिन ऐसा होता पह सारे दिन पेड़ की आड़ में खड़ा होकर पहाड़े रटता रह जाता।बड़ी मुश्किल से उसे खाने पर आने के लिए राजी किया जाता।किटी उसे अपने हाथ से भोजन कराता था।
             रोजी का चेहरा गुलाब की तरह लाल था।मगर वह खुद गुलाब को देखकर उसका रंग नहीं बता सकती थी।वह दोनों आंखों से अंधी थी।उसका गला कोयल की तरह मीठा था।उसे छोटे छोटे बहुत से भजन याद थे।जिस समय वह मीठे स्वर में गुनगुनाने लगती सारे बच्चे मुग्ध हो उठते।वाटसन अक्सर इस लड़की को देख कर ईश्वर के बारे में सोचने लगता। रोजी को एक फूल की तरह खूबसूरत बनाने के बाद ईश्वर ने इसे आंखों में रोशनी क्यों नहीं दी?बगीचे में एक से एक खूबसूरत फूल खिलते पर रोजी केवल उनकी महक अनुभव करती।इस महक का उसे ऐसा अंदाज मिल गया था कि वह बता सकती थी कि आज बगीचे में कौन कौन से फूल खिले हैं।इसी तरह चिड़ियों की बोली सुनकर वह उनके नाम बता सकती थी।
         रोजी का दिल बझ़ा कोमल था।किसी को दुखी देख पाना उसके लिए संभव नहीं था। फिर भी उसे पता नहीं कैसे दूसरों के दिल की तकलीफ मालूम हो जाती थी।वह बड़े प्यार से बच्चों की तकलीफों के बारे में पूछती। गीतों से उनका जी बहलाने की कोशिश करती। किसी न किसी बच्चे को आए दिन चोट चपेट लगती ही रहती थी।रोजी वाटसन से दवा की शीशी लेकर स्वयं चोट पर उसे लगाने पहुंच जाती।बच्चे उसकी कोमल उंगलियों का स्पर्श पाकर अपना दुख भूल जाते।वे अपनी प्रार्थन में ईश्वर से रोजी को सुखी रखने के लिए भी कहते।
          
         जहां ऐसे प्यारे बच्चे थे वहीं जेम्स बड़े जिद्दी और झगड़ालू स्वभाव का था।उसके मन की बात न होती तो वह बड़ी जल्दी तुनुक जाता।वाटसन ने उसे कई बार समझाया कि अपने साथियों के साथ प्यार का व्यवहार करना चाहिए।पर उसने इस पर कभी ध्यान नहीं दिया।नतीजा यह हुआ कि ज्यादातर बच्चे उससे नफरत करने लगे।उसे कभी अपनी ओर आता भी देखते तो दूसरी ओर मुंह कर लेते।मगर रोजी के मन में ऐसी बात न थी।वह जेम्स से नफरत नहीं करती थी,बल्कि मौका पाने पर अक्सर उसे अच्छा बनने के लिए समझाया करती।जेम्स इतने बच्चों में किसी की थोड़ी बहुत सुनता भी था तो केवल रोजी की।पीटर की तरह उसके दोनों हाथ गायब तो न थे,पर वे बचपन की एक बीमारी से कमजोर होकर कंधे से झूलते रहते थे।उन्हें वह उठा तक नहीं पाता था।खुद अपना भोजन तक करना उसके लिए मुश्किल काम था।हां,उसकी दोनों टांगें गधे की तरह मजबूत थीं।
      उनके शिक्षकों में पियरे सबसे ज्यादा उमर का था।वह धार्मिक विचारों का  आदमी था।वह इन बच्चों को ईश्वर की संतान मान कर बड़ा प्या करता था।किसी दिन भूल से भी किसी को डांट देता तो सारे दिन उसके लिए पछताता।
        पियरे ने दुनिया के सभी बड़े बड़े देशों की यात्रा की थी।उसे बड़ी लालसा थी कि ये अपाहिज बच्चे भी दुनिया घूम पाते और तब देखते कि ईश्वर ने इस धरती को कितना खूबसूरत बनाया है।लेकिन वह जानता था कि उसकी यह इच्छा नहीं पूरी हो सकती।इसके लिए अपार धन की जरुरत थी। यहां स्कूल को चलाना ही मुश्किल रहता था।उन बच्चों में तो अधिकांश के मां बाप थे ही नहीं,और जिनके थे भी वे बहुत गरीब थे।
      वाटसन को सहायता के लिए हमेशा धार्मिक विचारों के और उदार हृदय के धनियों के पास दौड़ना पड़ता था।
          पियरे की तरह ही तीन अध्यापक और थे।वे भी पियरे की तरह ही बच्चों को बहुत प्यार करते थे।वाटसन ने हजारों लोगों में से ऐसे अध्यापकों को चुना था,जो इन बच्चों को माता पिता का प्यार दे सकें।अध्यापक और बच्चे आपस में ऐसे हिलमिल गए थे कि सब अपने को एक परिवार मानने लगे थे। (क्रमशः)
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 ( इस बाल उपन्यास के लेखक मेरे पिता जी श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव जी हिन्दी साहित्य के लिये नये नहीं हैं।आप पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन में संलग्न हैं।                        आपने कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य की रचना की है।आपकी कहनियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ वृत्त चित्रों का लेखन कार्य भी किया है।1950 के आस पास शुरू हुआ आपका लेखन एवम सृजन का यह सफ़र आज 82 वर्ष की उम्र में भी जारी है।)
  हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित।      
                       

रविवार, 21 अगस्त 2011

मौत के चंगुल में(भाग-2)


किन्हीं कारणों से मैं बाल उपन्यास मौत के चंगुल मेंका अगला भाग नहीं प्रकाशित कर सका था।लेकिन अब मैं नियमित रूप से इसे सप्ताह में एक बार प्रकाशित करूंगा। प्रस्तुत है इस उपन्यास का  आगे का कथानक।                      

मौत के चंगुल में--(भाग-2)                                                                               (बाल उपन्यास)                                                                                                 लेखक-प्रेम स्वरुप श्रीवास्तव                                                                स्कूल का सारा सामान बच्चों की सुविधा को ध्यान में रखकर जुटाया गया था।पहिएदार कुर्सियां थीं।बिना पैर के बच्चे उन्हें अपने हाथों से ही चलाकर,अपने रहने के कमरे या फूलों से भरे बगीचों में पहुंच जाते थे।चलते फिरते तखत थे जिन पर बहुत छोटे बच्चों को बैठाकर आस पास की सैर कराई जाती।अंधे बच्चों को सुन्दर गाने सुनाए जाते।आंख वालों को बढ़िया तस्वीरें दिखाई जातीं।ये बच्चे खुद भी अच्छा गाते थे और तस्वीरें बनाते थे।                                                                      
स्कूल के छोटे से खूबसूरत बगीचे में हिरन,खरगोश,कुत्ते,बिल्ली और रंगीन परों वाली बतखें तथा मुर्गियां पली हुई थीं।इनसे बच्चों की अच्छी दोस्ती थी।वे बिना किसी हिचक के बच्चों के कमरों में घूम आते।कभी कभी तो भोजन के वक्त उनकी थालियों पर भी आ जुटते।
                     वाटसन एक खूबसूरत नौजवान था।अभी उसकी शादी नहीं हुई थी।कितने ही लोग उसके पास शादी के संदेश लेकर आए। पर वह सबको यही जवाब देता--मैं शादी कर लूंगा,तो अपने इन बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाऊंगा।
          लोग उसे समझाते---भले आदमी,क्या जिंदगी भर ब्याह नहीं करोगे?जो लोग शादी नहीं करते उन्हें बहुत तकलीफें उठानी पड़ती हैं।
     यह सुनकर वाटसन हंस पड़ता और कहताइन बच्चों के रहते मुझे किसी तरह की तकलीफ हो,मैं ऐसा कभी सोचता भी नहीं।यह सच है कि ईश्वर ने इन बच्चों के साथ अन्याय किया है।पर यह भी सच है कि अपनी इस भूल को सुधारने के लिए उसने मुझे इनके बीच भेजा है।मैं शादी करके उस दयालु ईश्वर को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता।
      कभी कभी लोग उससे यह भी पूछते--इन अपाहिज बच्चों के लिए तुम दुनिया भर की आफत झेलते हो मगर तुम्हें क्या मिलेगा?ये हाथ पैर वाले बच्चे रहे होते तो बड़े होने पर तुम्हारे उपकार का बदला भी चुकाते।
      वाटसन उनकी इस नासमझी पर हंस देता और उन्हें समझाता--देखो भाई,हर काम बदले की भावना से ही नहीं किया जाता।दूसरे बच्चे तो बड़े होने पर मेरा उपकार चुकाते, मगर ये बच्चे तो अभी से मेरे मन को सुख पहुंचाने लगे हैं।इनके लिए कुछ भी करते हुए मुझे इतना आनंद मिलता है कि मैं उसका वर्णन नहीं कर सकता।
          वाटसन की इस सनक ने उसे अपने देश से बाहर भी मशहूर कर दिया था।अक्सर विदेशी यात्री उसके अद्भुत स्कूल को देखने पहुंच जाते।वे उसके कामों से बहुत खुश होते और उसकी तारीफ करते हुए लौटते।इन बच्चों के लिए बहुत से उपहार उसे विदेशों से मिले थे।लोगों का कहना था कि  इस तरह के स्कूल हो सकता है दुनियां में और भी हों,लेकिन वाटसन जैसे सनकी  धुन के पक्के और साहसी लोग कम मिलेंगे।लोगों का ऐसा सोचना सही था।क्योंकि इस सनक ने ही उसे और उसके बच्चों को मौत के चंगुल में पहुंचा दिया था!किन्तु ................!(क्रमशः)
 ( इस बाल उपन्यास के लेखक मेरे पिता जी श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव जी हिन्दी साहित्य के लिये नये नहीं हैं।आप पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन में संलग्न हैं। आपने कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य की रचना की है। आपकी कहनियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ वृत्त चित्रों का लेखन कार्य भी किया है।1950 के आस पास शुरू हुआ आपका लेखन एवम सृजन का यह सफ़र आज 82 वर्ष की उम्र में भी जारी है।)
  हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित।