रविवार, 22 मार्च 2015

चिड़ियों का अनशन (बाल नाटक)

मुख्य पात्र :नट
         नटी
         कोयल
         सोन चिरैया
         जंगल का ठेकेदार
         शांति(ठेकेदार की बेटी)
         तोता,गौरैय्या,बुलबुल,कौवा,बाज,नीलकंठ और कुछ अन्य पक्षी।
                               दृश्य-1
(नक्कारे की आवाज के साथ ही खाली मंच पर एक तरफ़ से नट और दूसरी ओर से नटी नाचते हुए आते हैं।दोनों बीच में रुक कर इधर उधर देखते हैं।नट पीछे दीवाल की ओर मुंह करके खड़ा होता है। नटी दर्शकों की ओर।)
नट-अरे आज कोई हमारी कहानी सुनने नहीं आयेगा?
(नटी अपने माथे पर दो तीन बार हाथ मारती है फ़िर बीच में बैठ जाती है)
नटी- ओफ़्फ़ोह मै तो इस सूरदास से परेशान हो गयी हूं।
नट-क्या हुआ?क्यों चिल्ला रही हो ?
नटी-(गुस्से में) तुम्हें सामने बैठे लोग नहीं दिख रहे?
           (नट उछल कर दर्शकों की तरफ़ मुंह करता है)
नट-अरेअरे---।
नटी-क्या अरे-अरे कर रहे हो?
नट-ओफ़्फ़ोहमेरा भी दिमाग पता नहीं कहां घूम गया है।(दर्शकों से)श्रीमान जी आप लोग यहां बैठे हैं और मैंने देखा ही नहीं।माफ़ी चाहता हूं।(नटी का हाथ पकड़ कर)अच्छा अब बहुत देर हो चुकी है चलो नाटक शुरू करते हैं।
         (संगीत शुरू होते हैइ दोनों मंच पर थिरकते हैं)
नट-(गाता है)
            एक घना जंगल था बच्चो
            रहती जहां थी ढेरों चिड़ियां
            चीं-चीं चूं-चूं से ही उनकी
            फ़ैली वहां थी ढेरों खुशियां।
 नटी-(गाती है)       
            पर एक जालिम व्यापारी को
            भाई नहीं थी उनकी खुशियां
            काट-काट सुंदर पेड़ों को
            छीन रहा था उनकी खुशियां।
(मंच के एक सिरे पर नट-नटी गाते रहते हैं।दूसरे सिरे पर जंगल का सेट।दो-तीन मजदूर पेड़ काटते दिखाई पड़ते हैं।पक्षी बने कुछ बच्चे मंच पर इधर-उधर भागते दिखायी देते हैं।)
नट-        
           उन सारी चिड़ियों में बच्चों
           कोयल बुद्धिमान थी सबसे।
नटी-
           बड़े बड़े प्रश्नों को भी वो
           हल करती चुटकी में झट से।
नट-
           कोयल ने इक दिन जल्दी से
           सब चिड़ियों को पास बुलाया।
           कटते जाते पेड़ सभी अब
           उसने सबको समझाया।
          (नट नटी नाचते हुये मंच पर से जाते हैं।दृश्य फ़ेड आउट होता है)
                               दृश्य-2
(जंगल का दृश्य। चिड़ियों की सभा।कोयल एक पेड़ के ऊंचे ठूंठ पर बैठी दिखाई दे रही। उसके एक बगल में गौरैय्या दूसरी ओर नीलकंठ बैठे हैं।बुलबुल,तोता,मैना,बाज,कौवा,सोन चिरैया और कुछ पक्षी सामने बैठे हैं।)
कोयल-(कुहू कुहू करके मीठे स्वरों में)मेरी सभी प्यारी सहेलियों और दोस्तों,मैंने आप सब को आज यहां क्यों बुलाया है ये तो आपको पता ही होगा।ये जालिम व्यापारी लकड़ियां बेच कर पैसे कमाने के लिये इस जंगल के सारे पेड़ों को एक-एक कर काटता जा रहा।
मैना-हां बहना,इस तरह तो वो जंगल के सारे पेड़ काट देगा।
तोता-फ़िर हम लोगों को खाने के लिये फ़ल कहां से मिलेंगे?
कौवा-(कांव कांव करके) लो भाई सुन लो इनकी बात। अरे पहले रहने की जगह बचा लो फ़िर फ़लों के बारे में सोचना।
नीलकंठ- हां अगर सारे पेड़ कट गये तो हम सब रहेंगे कहां?
कबूतर- हमारे नन्हें-नन्हें बच्चे कहां फ़ुदकेंगे?
पेंडुकी- और तो और हम अपने अंडे कहां देंगे?
गौरैय्या- कोयल बहना,बात सिर्फ़ जंगल की नहीं है। आज आदमी तो अपने गांवों,शहरों के भी पेड़ काटता जा रहा। इसी तरह पेड़ कटते रहे तो एक दिन ऐसा भी आएगा कि हमें घोसला बनाने की भी जगह नहीं मिलेगी।
कोयल- आप सब ठीक कह रहे हैं। हमें जंगल के ठेकेदार और उसके आदमियों को पेड़ काटने से रोकना होगा।
मैना-(चिंतित स्वरों में) पर यह काम होगा कैसे?
कोयल-हां मैना बहन,यही जानने के लिये ही तो मैंने आप सभी को आज यहां बुलाया है। कि किस तरीके से हम उन्हें रोकें?
              (कुछ पल के लिये शान्ति)
कौवा-(गुस्से में) मैं उन सभी के ऊपर अपने पंजों से हमला कर दूंगा।
कठफ़ोड़वा- मैं अपनी नुकीली चोंच से मार मार कर उन्हें घायल कर दूंगा।
बाज-(घमण्ड भरे स्वरों में) अरे दोस्तों तुम सब को ये करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।मैं उनके लिये अकेला काफ़ी हूं।मैं पेड़ काटने वालों की आंखें नोच कर उन्हें अंधा कर दूंगा।
(कोयल,मैना,तोता एवं अन्य पक्षी उनकी बात सुनते हैं।कोयल कुछ देर सोचती है)
कोयल-शान्त भाइयों शान्तइस तरह क्रोधित होने से काम नहीं चलेगा।ये मत भूलो कि मनुष्य हमसे ज्यादा चालाक और ताकतवर है। हम उसे लड़ कर नहीं हरा सकते।
बाज-तो क्या हम हाथ पर हाथ रखे बैठे रहें?और अपना विनाश देखते रहें?
कोयल-नहीं मैं यह नहीं कह रही। हमें कोई दूसरा रास्ता ढूंढ़ना होगा।
कौवा-(व्यंग्य से)-तो फ़िर तुम्हीं बताओ कोयल रानी।
(कोयल सोचने की मुद्रा में अपने पंजों से सर खुजलाती है फ़िर अपने पंख फ़ड़फ़ड़ाती है।)
सोन चिरैया-(संकोच से) मैं कुछ कहूं कोयल बहना?
कोयल-हां हांबताओ बताओतुम हो तो नन्हीं सी पर तुम्हारा दिमाग सबसे तेज है।
सोन चिरैया-(गाती है)-  चीं चीं चीं चीं
                    चीं चीं चीं चीं
                    याद करें इतिहास जरा हम
                    याद करें बापू की माया
                    गांधी बाबा ने अनशन से
                    गोरों को था दूर भगाया।
                    क्यों ना हम भी मिल कर कोई
                    नई अनोखी राह बनाएं
                    पेड़ों का कटना भी रोकें
                    अपने घर जंगल को बचाएं।
कोयल-(सोचते हुए) बात तो तुम्हारी ठीक है सोन चिरैया।पर हम कौन सा ऐसा रास्ता बनाएं?जिससे व्यापारी की समझ में हम चिड़ियों के दुख और मुसीबतें आ सकें?
सोन चिरैया-(सोचते हुये)बहनामैंने तरीका सोच लिया है।
कौवा-तो जल्दी बताओ सोन चिरैया---।
सोन चिरैया-सुनो साथियों इन मनुष्यों को हमारी बोलीमधुर स्वर बहुत अच्छी लगती है।अगर हम कुछ समय के लिये चहकना छोड़ कर मौन का व्रत कर लें तो?
कौवातोफ़िर इससे क्या होगा?
कोयल-(खुश होकर)बात तो तुम्हारी ठीक है।पर इससे मनुष्य पेड़ काटना बंद कर देगा?
तोता-पेड़ काटना बंद तो नहीं करेगाहां वो ये सोचेगा जरूर कि अचानक इन चिड़ियों ने गाना क्यों बंद कर दिया?
कौवा-हो सकता है उसके मन में हमारी तकलीफ़ों की बात भी आ जाय।
नीलकंठमैं भी सोन चिरैया की बातों से सहमत हूं।
कोयल-तो दोस्तों आप सभी कल से मौन का व्रत रखने को तैयार हैं?
सारे पक्षी-(समवेत स्वरों में) हां हम सभी तैयार हैं।कल से ही हमारा चहकना बंद।
           (सारे पक्षी अपने घोसलों की ओर जाते हैं।
                           दृश्य-3
(ठेकेदार के घर का बगीचा।कई चिड़िया पेड़ों पर बैठी हैं पर चुप हैं।कोई चहक नहीं रही।शांति हाथ में चावल का कटोरा लेकर आती है।पेड़ के नीचे बिखेरती है।पर कोई चिड़िया चावल चुगने नहीं आती हैं।न ही चहकती है।)
शांति-(अपने आप से बोलती है)-अरे आज इन चिड़ियों को क्या हो गया?कोई पास नहीं आ रही।कल तक तो चिल्ला चिल्ला कर टूट पड़ती थीं चावल के दानों पर।कहीं बीमार तो नहीं?
(ठेकेदार का प्रवेश)
ठेकेदार-अरे शांति तू किससे बातें कर रही?
शांति-(चिंतित स्वरों में)देखिये न बापूकोई चिड़िया दाना नहीं खा रहीन ही चहक रही।
ठेकेदार-अरे तुझे खिलाना नहीं आता।ये देख अभी सब खायेंगी भी और चहकेंगी भी।
(ठेकेदार एक मुट्ठी में चावल लेकर चिड़ियों की तरफ़ उछालता है।पर कोई चिड़िया पेड़ से नहीं उतरती।ठेकेदार उनकी तरफ़ आश्चर्य से देखता है।)
ठेकेदार-अरे क्या हो गया इन सभी को अचानक?कोई आवाज भी नहीं कर रहीं।कहीं बीमार तो नहीं हो गयीं?
(अचानक ठेकेदार के सामने पहले एक गौरैया फ़िर दूसरी कैइ चिड़िया आकर बैठ जाती हैं।ठेकेदार जमीन पर बैठ कर उनकी तरफ़ ध्यान से देखता है।सबकी आंखों में आंसू।सब सर नीचा किये हैं।शान्ति भी बैठ जाती है।)
शांति-(दुख भरे स्वरों में) अरे बापू ये तो रो रही हैं।---सब की सब---।
ठेकेदार-(परेशान स्वर में) पर इन्हें हुआ क्या है?
 (गौरैया और दूसरी चिड़िया सर उठाती हैं।सब सामने एक कटे हुये पेड़ के ठूंठ की तरफ़ दुखी हो कर देखती हैं।ठेकेदार और शांति भी उधर ही देखते हैं।)
शांतिकहीं इस काटे गये पेड़ पर ही इनका घोसला तो नहीं था?
ठेकेदार(चिन्तित मुद्रा में) ओह अब समझा---क्यों गुस्सा हैं ये चिड़िया लोग?शांति बिटिया अनजाने में मुझसे बहुत बड़ी भूल हो रही थी।
शांति-(आश्चर्य से) कैसी भूल बापू?
ठेकेदार(दुखी मन से)बिटिया इसमें गलती इनकी नहीं।मेरी गलती है।मैं ही पैसों के लालच में पेड़ों को कटवा कर इनके घर उजाड़ रहा था।मैं पैसों के पीछे पागल हो गया था।---ओहये क्या पाप कर रहा था मैं।इतने पक्षियों के घर छीन रहा था?
  (ठेकेदार खड़ा हो जाता है,उसी के साथ शांति भी। चिड़िया उसी तरह दुखी बैठी हैं)
ठेकेदार-(पश्चाताप से)हे ईश्वर मुझे माफ़ कर दोअब और नहीं---आज के बाद से मैं किसी चिड़िया का नीड़ नहीं उजाड़ूंगा।कोई पेड़ नहीं काटूंगा---कोई नहीं।(गौरैया को सहला कर) जाओ गौरैया---जाओ चिड़ियासारे पक्षियों से कह दो अब आज के बाद से कोई पेड़ नहीं कटेगा।
     (शांति आश्चर्य से ठेकेदार को देखती है।कई चिड़िया और गौरैया आकर चीं चीं
     करती हुयी चावल खाने लगती हैं।कुछ उड़ कर जंगल की ओर जाती हैं।)
दृश्य-4
 (जंगल का दृश्य।मधुर संगीत।हरे भरे पेड़ों के बीच ठेकेदार और उसकी बेटी शांति नाचते दिखायी दे रहे।उनके चारों ओर पक्षी बने बच्चे उड़ने का अभिनय कर रहे।)
शांति(गाती है)
               देखो बापू सुन लो बापू
               बात को पूरी समझ लो बापू।
               जिन पेड़ों को काट रहे थे
               वहीं बसी थीं चिड़ियां सारी
               पर अब उनको मिला अभय जो
               चहक रही फ़िर चिड़िया सारी।
ठेकेदार--        बेटी मैं था गलत राह पर
               सबने सच्ची राह दिखाया
               मुझसे पाप बड़ा था होता
               पर चिड़ियों ने मुझे बचाया।
              (शांति,ठेकेदार गोल घेरे में घूमते हैं।उनके चारों ओर कुछ चिड़िया भी फ़ुदकती घूम रहीं।मंच के एक तरफ़ से नट और दूसरी तरफ़ से नटी भी नाचते हुयी आती हैं और उन्हीं के साथ नाचते हैं।)
नट(गाता है)        
             मौन रखा सारी चिड़ियों ने
             उसका मीठा फ़ल भी पाया।
नटी(गाती है)
             खुशहाल किया जंगल को फ़िर से
             मानव को भी मार्ग दिखाया।
              (सभी साथ में गाते हैं)
ठेकेदार--      मौन रखा सारी चिड़ियों ने
             उसका मीठा फ़ल भी पाया।
शांति--        खुशहाल किया जंगल को फ़िर से
             मानव को भी राह दिखाया।
कोरस--      खुशहाल किया जंगल को फ़िर से
            मानव को भी राह दिखाया।
(सब गोल घेरे में घूमते हुये गाते रहते हैं।धीरे धीरे उनका स्वर धीमा होता जाता है। और संगीत के साथ ही प्रकश कम होता जाता है।दृश्य फ़ेड आउट होता है।)
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लेखक--डा0हेमन्त कुमार

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

सुनहले मोर( बाल कहानी)

दूर तक फ़ैला हुआ एक घना जंगल था।बहुत पहले भी ऐसा ही हरा भरा था।आज भी है।मगर पहले वहां पशु पक्षियों का शोर गूंजता रहता था।पक्षियों में सबसे ज्यादा मोर रहते थे।इन मोरों के कारण उसे मोर वन भी कहा जाता था।वहां पर तरह तरह के फ़ूल खिले रहते थे।पेड़ों पर फ़ल ही फ़ल दिखाई पड़ते थे।
       जंगल के बीच में एक बड़ी झील थी।उसमें कमल खिले रहते थे।बत्तखें तैरती रहती थीं।कमलों पर भौंरे अपना संगीत सुनाते रहते थे।पर आज जो जंगल हैउसमें यह सब कुछ नहीं हैं। न पक्षी,न पशु।सब जंगल छोड़ चुके हैं।किसी भी पेड़ पर न तो फ़ूल न फ़ल।मोर तो एक भी नहीं रहे।झील सूख गई।फ़िर कमल और बत्तखें कहां दिखाई पड़तीं।जंगल में एक सन्नाटा छाया रहता है।लोग उधर जाते हुये भी डरते हैं।
        आठ दस साल पहले उस जंगल में सुनहले पंखों वाले मोरों का एक जोड़ा आया था।वे मोर लोक के राजा रानी थे।इस वन की प्रशंसा सुन कर इसे देखने आए थे।
    गांव के एक आदमी ने इन मोरों को देखा तो उसके मन में लालच समा गयी।अगर मैं नर मोर के पंखों को राजा को भेंट कर दूं तो वे प्रसन्न हो जाएंगे।मुझे ढेरों इनाम मिलेगा।इसी लालच में उसने एक इतने सुन्दर मोर को मार डाला।
    मगर हुआ उलटा।राजा गुस्से से चीख कर बोले—“अरे दुष्ट तूने यह क्या किया?मोर तो हमारे देश का राष्ट्रीय पक्षी है।इसे मारना अपराध है।थोड़े इनाम के लालच में तूने इतने सुन्दर पक्षी को मार डाला।कहकर उन्होंने उसे कारागार में डाल दिया।
        उसके बाद रानी मोरनी अपने मोर लोक को लौट गई।फ़िर उसके पीछे सारे मोर भी निकल गये।इसी तरह एक एक कर सारे पशु पक्षी जंगल से भागने लगे।फ़ूल खिलने बंद हो गये।झील सूख गयी।यहां तक कि पत्तियों ने हवा चलने पर सरसराहट करना बंद कर दिया।एकदम सन्नाटा छा गया।
   एक दिन बड़ा अचंभा हुआ।लोगों को अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। सुनहले पंखों वाला एक मोर पूरे गांव की छतों पर इधर उधर फ़ुदक रहा था।जो भी देखता हैरान रह जाता।पूरे जंगल में एक भी प।क्षी पशु नहीं बचा था।फ़िर यह अकेला मोर कहां से आया?
       सब से बढ़ कर आश्चर्य तो तब हुआ जब वह मनुष्यों की बोली में बोला—“गांव वालों,याद करो कुछ साल पहले तुम लोगों ने मोरों के राजा को मारने का अपराध किया था।तब से यह जंगल तबाह हो गया।अभी जो पेड़ हरे भरे हैं वे भी कुछ दिनों में सूख जाएंगे।गांव के लोग अकाल से मरने लगेंगे।
     डर कर एक ग्रामीण ने पूछा—“तुम कौन हो भाई?
   मैं मोर लोक से आया हूं।मुझे रानी ने भेजा है।रानी अब बूढ़ी हो चली हैं।उन्हें किसी की सहायता चाहिये।अगर तुम लोगों में से कोई अपना एक बच्चा दे दे तो अच्छा होगा।सब पहले जैसा ठीक हो जाएगा।
    सुनते ही सब लोग सन्न रह गये।भला मोर लोक भेजने को कौन अपना बच्चा देना चाहेगा।
   मोर फ़िर बोला—“तुम लोगों के पास सोचने के लिये दो दिन का समय है।वरना परसों से ही बरबादी शुरु हो जाएगी।यह रानी का श्राप समझो।इससे तुम्हें भगवान भी नहीं बचा सकता।
    लोग और भी डर गये।मगर इतना बड़ा त्याग करने का साहस किसी में नहीं था।
  
उसी गांव में आनन्दी नाम की एक औरत रहती थी।उसके पांच छः साल का एक छोटा अकेला लड़का था जयदेव।जयदेव के बिना वह एक मिनट नहीं रह सकती थी।मगर पूरे गांव में ऐसी दयालु औरत और कोई नहीं थी।उसने सोचा—अगर मैं जयदेव को दे दूं तो पूरा गांव बच जाएगा।जंगल पहले की तरह हो जाएगा।कुछ सोच कर उसने जयदेव से इसके बारे में पूछा।
        मातृ भक्त जयदेव बोला—“मां,तुम जो चाहती हो वह मुझे सहर्ष स्वीकार है।मेरे चले जाने से इतने लोगों का भला होगा।इससे अच्छा और क्या हो सकता है।
   आनन्दी ने मोर से कहा---मेरा जयदेव जायेगा। मगर मुझे करना क्या होगा?
   मोर प्रसन्न होकर बोला—“तुम आज रात को अपने बेटे को  जंगल के वट वृक्ष के नीचे छोड़ आना।इसे रानी तक पहुंचाना मेरा काम है।
     आनन्दी ने वैसा ही किया।आनन्दी को बेटे से बिछुड़ने का बड़ा दुख हुआ।लेकिन पूरे गांव और जंगल के कल्याण के लिये उसने इससे संतोष कर लिया।
   अगले दो दिन में ही सचमुच जंगल की पहले वाली शोभा लौट आई।लोगों की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा।यह सब मां बेटे के त्याग का फ़ल था।दिन बीतते देर नहीं लगी।पन्द्रह बीस साल गुज़र गये।आनन्दी अब बूढ़ी हो चली थी।
      अचानक एक दिन फ़ूलों से सजी एक सुन्दर पालकी गांव में पहुंची।वह सीधे आनन्दी के घर पर पहुंच कर रुकी।देखने वालों की भीड़ लग गई।आनन्दी भी लाठी लेकर घर से बाहर निकली।
    पालकी में से एक सुन्दर युवक और युवती नीचे उतरे।सब आश्चर्य में थे---आखिर ये हैं कौन?और यहां क्यों आए हैं?
     तभी युवक और युवती ने झुक कर आनन्दी के पांव छुए।फ़िर युवक बोला—“मां मैं तुम्हारा बेटा जयदेव हूं।यह तुम्हारी बहू है।मोर लोक की रानी अब नहीं रहीं।मगर जाने से पहले उसने वहां की राजकुमारी से मेरा विवाह कर दिया। फ़िर अपार धन के साथ मुझे और राजकुमारी को आपके पास भेजा है।
         पूरा गांव धन्य धन्य कहने लगा।आनन्दी और जयदेव के त्याग से ही आज पूरा गांव और जंगल प्रसन्नता में डूब गये।हर कोई उनकी प्रशंसा कर रहा था।रानी ने एक विशेष सौगात के रूप में अपने दरबार का एक सबसे सुंदर मोरों का जोड़ा भेजा था।ये मोर भी सुनहले थे।लोगों ने कहा—“ये मोर हमारे जंगल के राजा रानी होंगे।लोगों को एक और चेतावनी दी गई।अब किसी ने जंगल के किसी प्राणी को हानि पहुंचाई तो उसे कठोर दण्ड दिया जाएगा।
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प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव 
 11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम0ए0।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन मे संलग्न।देश की प्रमुख स्थापित पत्र पत्रिकाओं सरस्वती,कल्पना,प्रसाद,ज्ञानोदय,साप्ताहिक हिन्दुस्तान,धर्मयुग,कहानी,नई कहानी,विशाल भारत, आदि  में कहानियों,नाटकों,लेखों,तथा रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।बाल कहानियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र आज 86 वर्ष की उम्र में भी जारी है। अभी हाल में ही नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया से बाल उपन्यास मौत के चंगुल में प्रकाशित।

गुरुवार, 5 मार्च 2015

होली आई

(फ़ोटो-गूगल से साभार)
रंग बिरंगी होली आई,
गुझिया और कचौड़ी लाई।
घर-घर होती तैयारी,
हंसी ठिठोली करती आई।

(फ़ोटो-गूगल से साभार)
सारे बच्चे खुशी मनाते,
धमा चौकड़ी खुब मचाते।
पिचकारी में रंग  भरे हैं
बब्लू मुन्नी खूब चलाते।


होली सबको है समझाती,
जाति धर्म का भेद मिटाती।
मिल जुल कर तुम रहना सीखो,
मानवता का पाठ पढाती।
(फ़ोटो-गूगल से साभार)
 रंगों की बस एक भाषा,
प्यार-मोहब्बत जीवन-आशा।
सबको प्रेम से गले लगाओ
अकबर,रामू प्यारे जानी।

रंग बिरंगी होली आई,
गुझिया और कचौड़ी लाई।
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कवि-अजय कुमार मिश्र "अजयश्री "
ग़ीत एवं नाट्य अधिकारी
राज्य सूचना शिक्षा एवं संचार ब्यूरो
परिवार कल्याण विभाग,उत्तर प्रदेश।
मोबाइल-09415017598 
ईमेल-ajayshree30@ymail.com

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

डरता चांद

आसमान पर ही रहता क्यों
नीचे नहीं उतरता चांद?
मां बतलाओ क्यों मुझसे
हर रात ठिठोली करता चांद?

दूर-दूर ही चमका करते
ये झिल-मिल झिल-मिल तारे।
पास बुलाऊं तो शरमा जाते हैं
सारे के सारे तारे।
इनसे भी बादल में छुपकर
आंख-मिचौली करता चांद।

मैंने कहा,एक दिन मेरे
आंगन में भी आ जाओ।
दूध-भात की खीर बनी है
मीठी-नीठी खा जाओ।
पर लगता है मेरे जैसे
छुटकू से भी डरता चांद।


आसमान पर ही रहता क्यों
नीचे नहीं उतरता चांद?
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रचनाकार-रमेश तैलंग  
बाल साहित्य के क्षेत्र में श्री रमेश तैलंग से हर पाठक परिचित है। 1965 से शुरू हुयी आपकी बाल साहित्य की यात्रा आज भी जारी।बाल साहित्य की कई पुस्तकें प्रकाशित। लम्बे समय तक हिन्दुस्तान टाइम्स समूह के साथ कर्य करने के उपरान्त अब स्वतन्त्र लेखन। फ़ेसबुक पर “World of Children’s Literature” समूह की स्थापना करके पूरे देश के बाल साहित्यकारों को एक साथ इकट्ठा करने का प्रयास।  सम्पर्क--09211688748


गुरुवार, 22 जनवरी 2015

आलस्य का फल

           
(चित्र-श्री राजीव मिश्र)
बहुत दिनों पहले की बात है जौनपुर जिले के पास एक छोटा सा गांव था परसरामपुर। इस गांव की आबादी बहुत कम थी। कुल आठ-दस परिवार पूरे गांव में रहे होंगे। इस गांव की मिट्टी उपजाऊ नहीं थी।इसीलिए गांव के लोग मजदूरी
, लुहारी, बढ़ईगीरी आदि अलग-अलग तरह के काम करके अपनी जीविका चलाते थे।
            इसी गांव में रघुनाथ नाम का एक बढ़ई रहता था। रघुनाथ का परिवार बहुत छोटा था। उसके परिवार में केवल उसकी पत्नी और उसका लड़का गोविन्द था।गोविन्द बहुत आलसी स्वभाव का था।वह दिन भर घर में बैठा रहता था कभी कोई काम नहीं करता था।इसी से रघुनाथ और उसकी पत्नी दोनों ही गोविन्द से नाराज रहते थे।रघुनाथ जंगल से लकड़ियां ले आता और उनसे छोटे-छोटे खिलौने बना कर बाजार में बेचने ले जाता।
                        एक दिन रघुनाथ की तबियत कुछ खराब थी। उसकी बाजार जाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी।इसलिए उसने गोविन्द को अपने पास बुलाया और उससे कहा,‘‘अरे गोविन्द! आज मेरी तबियत कुछ खराब है।मैं बाजार नहीं जा पाऊंगा। ऐसा कर कि तू ही बाजार चला जा और ये खिलौने बेचकर चला आ।रघुनाथ की बात सुनकर पहले तो गोविन्द बहुत आनाकानी करता रहा फिर जब रघुनाथ और उसकी पत्नी दोनों ने उसे डांटा तो वह किसी तरह बाजार जाने को तैयार हो गया।
                        गोविन्द जब लकड़ी के सारे खिलौने लेकर बाजार जाने लगा तो रघुनाथ ने उसे पास बुलाकर कहा,‘‘देखो बेटा गोविन्द अब तुम काफी बड़े और समझदार हो गये हो। आज मेरी तबियत खराब है इसलिए मैं तुम्हें बाजार भेज रहा हूं।तुम मेरी दो बातों का ध्यान रखना। पहली बात तो यह कि रास्ते में कहीं पर सोना मत।दूसरी बात यह कि तुम बाजार में किसी अनजान आदमी पर विश्वास करके उसका साथ मत करना।मेरी इन दो बातों का ध्यान रखोगे तो तुम अपने काम में जरूर सफल होगे।
                        गोविन्द ने उस समय तो रघुनाथ की दोनों बातों को बड़े ध्यान से सुन लिया लेकिन घर से निकलते ही वह उन बातों को भूल गया और बहुत आराम से धीरे-धीरे बाजार की तरफ बढ़ने लगा।
                        बाजार परसरामपुर गांव से करीब चार मील दूर था।रास्ते में एक बहुत घना आम का बगीचा भी पड़ता था।परसरामपुर से बाजार जाने वाले लोग बाजार जाते तथा लौटते समय उसी बगीचे में कुछ देर आराम करके तब आगे जाते थे।इसलिए हमेशा वहां पर दस बीस आदमी जरूर ठहरे रहते थे।
                        लेकिन उस बगीचे में ठहरने वालों को एक परेशानी होती थी।उस आम के बगीचे में बन्दर बहुत रहते थे जो जहां पर ठहरने वाले यात्रियों को काफी परेशान करते थे। बन्दर कभी किसी आदमी का खाना उठाकर भाग जाते, कभी किसी आदमी का कपड़ा या और दूसरा सामान लेकर भाग जाते।इसलिए उस बगीचे में ठहरने वाले लोग बड़े सावधान होकर आराम करते थे और प्रायः सोते नहीं थे।बस वहां कुछ देर आराम करके आगे बढ़ जाते थे।
                        गोविन्द भी पैदल चलते-चलते करीब एक घण्टे बाद उसी बगीचे में पहुंचा। बगीचे में पहुंचकर पहले उसने कुएं से पानी लेकर हाथ मुंह धोया फिर घर से लाया हुआ खाना वगैरह खाकर आराम से लेट गया।लेटते ही गोविन्द को नींद आने लगी।उसने सोचा कि क्यों न थोड़ी देर सो लिया जाय ? उसके बाद उठकर थोड़ा तेज चलकर मैं बाजार पहुंच जाऊंगा।बन्दरों से बचने के लिए उसने खिलौने की पोटली अपने सिरहाने रख लिया।गोविन्द तो आलसी था ही।थोड़ी ही देर में वह खर्राटे भरकर सोने लगा।
                        जब गोविन्द खाना खा रहा था उसी समय से आम के पेड़ पर बैठा मोटा बन्दर बड़े ध्यान से उसकी खिलौने की पोटली देख रहा था।उसने सोचा कि जरूर इस पोटली में भी कुछ खाने की चीज होगी।जब गोविन्द सो गया तो वह मोटा बन्दर धीरे से नीचे उतरा और गोविन्द के सिर के नीचे से खिलौने की पोटली लेकर बड़ी तेजी से भागा।मगर गोविन्द तो ठहरा आलसी उसकी नींद सिर के नीचे से पोटली निकल जाने पर भी नहीं खुली।परन्तु वहीं पर आराम कर रहे दूसरे कुछ लोगों ने बन्दर को पोटली ले जाते देख लिया।उन्होंने जल्दी से गोविन्द को हिला कर जगाया और उसे बताया कि उसकी पोटली बन्दर लेकर भागा जा रहा है।अब गोविन्द को होश आया।वह जल्दी से दूसरे लोगों के साथ बन्दर के पीछे लाठी लेकर दौड़ा।लेकिन बन्दर जल्दी से उछल कर पेड़ पर चढ़ गया और आराम से एक डाल पर बैठ गया।गोविन्द खड़ा देखता रहा।
           
(चित्र-राजीव मिश्र)
पेड़ पर बैठे बन्दर को जब पोटली खोलने पर उसमें खाने की कोई चीज नहीं मिली तो वह पोटली के सारे खिलौने उठा-उठा कर फेंकने लगा।कुछ खिलौने जमीन पर गिर कर टूट गये कुछ साबित बच गये।गोविन्द पेड़ के नीचे खड़ा रो रहा था।उसने जब बन्दर को खिलौने फेंकते देखा तो उसे थोड़ा सन्तोष हुआ कि चलो जो साबित खिलौने बचे हैं उन्हें ही बेचकर कुछ पैसा मिल जाएगा।बगीचे में ठहरे आदमियों की सहायता से उसने अपने टूटे तथा साबित दोनों तरह के खिलौनों को इकठ्ठा किया और बेचने के लिए बाजार चला गया।
                        गोविन्द जब खिलौने लेकर बाजार पहुंचा तो उसे काफी देर हो चुकी थी। बाजार में सभी दुकानदारों के सामान बिक चुके थे तथा वे सभी वापस जाने की तैयारी कर रहे थे।गांव से जो लोग सामान खरीदने आए थे वे भी अब वापस जाने की तैयारी कर रहे थे। गोविन्द अपने खिलौने सड़क पर सजाकर करीब एक घन्टे तक बैठा रहा परन्तु उसका कोई भी खिलौना नहीं बिका।गोविन्द को बहुत पछतावा हो रहा था कि बेकार ही बगीचे में सो गया था।अगर वह बगीचे में न सोया होता तो शायद उसका इतना नुकसान भी न होता और उसके सारे खिलौने भी बिक जाते।
                        अभी गोविन्द बैठा यह सोच ही रहा था कि घर चलकर वह अपने पिता को क्या जवाब देगा कि अचानक उसने एक मोटे आदमी को अपनी तरफ आते देखा।मोटा आदमी एक लुंगी और कुर्ता पहने हुए था।उसकी बड़ी-बड़ी मूंछें थीं और देखने में वह कोई बदमाश किस्म का आदमी लगता था।गोविन्द ने उसे अपनी तरफ आते देखा तो डर गया उसने सोचा कहीं ऐसा न हो कि यह आदमी मेरे खिलौने छीन ले।गोविन्द के पास आकर उस आदमी ने बहुत प्यार भरी आवाज में उसे पूछा,‘‘ क्यों बेटा।तुम्हारा अभी एक भी खिलौना नहीं बिक पाया ?
                        उसको इस तरह प्यार से बोलते देखकर गोविन्द को बड़ा आश्चर्य हुआ।उसने तो समझा था कि यह आदमी बड़ा बदमाश होगा।परन्तु यह तो बहुत सीधा आदमी लगता है। गोविन्द ने कहा, ‘‘नहीं बाबू जी।अभी तक मेरा कोई खिलौना नहीं बिका।
                        ‘‘इस पर वह आदमी बोला,ओहो..... बेटा! तब तुम्हें बड़ा दुःख होगा।तुम इतनी मेहनत से बनाकर खिलौने लाए पर अभी तक तुम्हारा एक भी खिलौना नहीं बिक सका। उस आदमी की बात सुनकर गोविन्द की आंखों में आंसू भर आए।वह धीरे-धीरे रोने लगा और मोटे आदमी से उसने जब तक घटी सभी घटनाएं बता दीं।
                        गोविन्द की बात सुनकर मोटे आदमी ने कहा,‘‘ऐसा करो बेटा!तुम ये सारे खिलौने मेरे हाथ बेच दो।मैं तुम्हें इन सारे खिलौनों के बदले में एक हजार रूपये दूंगा।                 एक हजार रूपये------ सुनकर गोविन्द की आंखें आश्चर्य से खुली रह गयीं।उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह आदमी इतने थोड़े से खिलौनों के लिए एक हजार रूपये दे सकता है।गोविन्द ने मोटे आदमी से पूछा, ‘‘आप सचमुच एक हजार रूपये देने की बात कर रहे हैं या मजाक कर रहे हैं ?
                        ‘‘भला मैं क्यों मजाक करूंगा ? अरे तुम्हें खिलौना बेचना है तो मुझे अभी दे दो और तुम यहीं बैठो।पास में ही मेरा घर है वहां जाकर मैं अभी एक हजार रूपये लेकर आता हूं। मोटे आदमी ने गोविन्द से कहा।
                        गोविन्द मोटे आदमी के बहकावे में आ गया। उसकी आंखों के सामने एक हजार रूपये के नोट नाच उठे।उसने सोचा चलो ठीक है मैं यहीं थोड़ी देर इसका इन्तजार करता हू।यह आदमी अभी घर से एक हजार रूपये लेकर आ जाएगा।मेरे पिता जी जब एक हजार रूपये देखेंगे तो वे कितने प्रसन्न होंगे।यह सोचकर गोविन्द ने अपने सारे खिलौने उस आदमी को दे दिए और उससे बोला, ‘‘बाबू जी! आप रूपये लेकर जरा जल्दी आइएगा।क्योंकि मुझे अभी बहुत दूर वापस जाना है।
                        मोटे आदमी ने हॅसते हुए कहा, ‘‘हां! हां! बेटा!मैं बस पन्द्रह मिनट में वापस आ जाऊंगा।लेकिन जब तक मैं वापस न आऊं तुम यहीं बैठे रहना और एक हजार रूपये वाली बात किसी से कहना मत।
                        इतना कहकर मोटा आदमी गोविन्द के सारे खिलौने लेकर वहां से चला गया। इसके बाद गोविन्द वहां बैठकर मोटे आदमी के वापस आने का इन्तजार करने लगा।गोविन्द को वहां बैठे-बैठे करीब बीस मिनट बीत गये और वह आदमी अभी तक वापस नहीं आया। गोविन्द को थोड़ी चिन्ता होने लगी।उसने सोचा कहीं ऐसा तो नहीं कि वह आदमी मुझे धोखा देकर चला गया। फिर उसने सोचा थोड़ी देर और देख लूं तब किसी से उसके बारे में पूछूं। इसके बाद गोविन्द करीब एक घन्टे तक वहां बैठा रहा पर मोटे आदमी को न वापस आना था न वह वापस आया।गोविन्द वहीं बैठकर रोने लगा।जब बाजार के दूसरे दूकानदारों ने उसके रोने का कारण पूछा तो गोविन्द ने रोते-रोते अपने साथ अब तक घटी घटनाएं उन्हें बता दी। उसकी बात सुनकर एक बूढ़े दूकानदार ने गोविन्द को डाटते हुए कहा, ‘‘अरे बेटा! पहली गलती तो तूने यह की, कि रास्ते में आलस्य करके सो गया और तेरे सारे खिलौने बन्दर ने तोड़ दिए।उसके बाद भी तेरी अक्ल ठीक नहीं हुई और तूने यहां आकर एक अन्जान आदमी पर विश्वास कर लिया।और एक हजार रूपये के लालच में अपने सारे खिलौने उसे दे दिए।  बेटा वह आदमी तो बहुत बड़ा ठग है।इस बाजार में बहुत से दूकानदारों को वह अब तक धोखा दे चुका है।
                        बूढ़े आदमी की बात सुनकर गोविन्द जोर-जोर से रोने लगा।उसे अपने पिता जी की बतायी बातें याद आने लगीं।उसे दुःख हो रहा था कि अगर उसने अपने पिता जी की बातें मान ली होती तो इतना नुकसान न होता।गोविन्द को रोते देखकर उस बूढ़े आदमी को दया आ गई।उसने अपने पास से कुछ रूपये निकालकर गोविन्द को दे दिए और उससे बोला, ‘‘बेटा! अब यहां खड़े होकर रोने से कोई फायदा नहीं होगा।तुम ये रूपये लेकर अपने घर वापस चले जाओ।लेकिन आगे से ध्यान रखना कि कभी किसी काम में आलस्य मत करना और अपने माता-पिता की बतायी बातों को हमेशा ध्यान में रखना।
                        गोविन्द को बड़ा पश्चाताप हो रहा था।वह बूढ़े आदमी से रूपये लेकर अपने गांव की तरफ वापस चल पड़ा और उसने निश्चय किया कि अब वह हमेशा अपने माता-पिता की सलाह मानेगा और किसी काम में आलस्य नहीं करेगा।
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डा0हेमन्त कुमार

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

चंदा मामा

चंदा  मामा चंदा  मामा
तुम जल्दी से आ जाना
कु  प्यारे प्यारे से सपने
मेरी इन आँखों में लाना।
चंदा मामा
तुम जल्दी से आ जाना।

मामा  तुम जब आते हो
मन को  बहुत लुभाते हो
सभी मुझे  यह कहते है
कितना हमें सताते हो।
 चंदा मामा
तुम जल्दी से आ जाना।

मामा जब तुम आते हो
तो अम्मा भी आ जाती है
प्यारी प्यारी नई  कथाएं
हमको रोज सुनाती  है।
 चंदा मामा
तुम जल्दी से आ जाना।

मामा जब तुम आते हो
अम्मा लोरी गाती  है
हाथो से थपकी दे देकर
मीठी नींद सुलाती है 
 चंदा मामा
तुम जल्दी से आ जाना।
000

कवियत्री-



बुधवार, 17 दिसंबर 2014

बड़ी बहादुर चींटी

                   
    जंगल के सारे जानवर सन्न रह गये।जैसे ही उन्हें पता चला कि चीं चीं चींटी ने रामू हाथी को कुश्ती के लिये ललकारा है,सब के सब भौचक।हर जानवर यही सोच रहा था कि चीं चीं चींटी का दिमाग खराब हो गया है।कहां इतना बड़ा रामू हाथी और कहां चीं चीं चींटी।कोई मेल ही नहीं दोनों का।जंगल के हर कोने में यही चर्चा चल रही थी।
     कई जानवर सच्चाई पता करने रामू हाथी के घर की ओर दौड़े।कुछ ने सोचा चलो चीं चीं चींटी से पता कर लें।बात सही भी है या नहीं।
        खबर उड़ते उड़ते जंगल के राजा गबरू शेर तक भी पहुंच गयी।सुनते ही माथे पर बल पड़ गये।उसने फ़ौरन खबर लाने वाले शेरू कुत्ते से पूछा,क्या जो बात तू कह रहा है वो सच है?
             “हां महाराज,बिल्कुल सही खबर दी है मैंने आपको।शेरू अपनी झबरी पूंछ हिलाता हुआ बोला।
                          गर्र----।गबरू की दहाड़ ने पूरे जंगल को हिला दिया।उसकी दहाड़ सुनकर शेरू कुत्ता भी कांप उठा।चीं चीं चींटी तो गई काम से।अब उसे गबरू शेर के गुस्से से कोई नहीं बचा सकता।शेरू ने कांपते हुए सोचा।अभी गबरू शेर उससे कुछ कहता कि सामने से रामू हाथी अपनी लंबी सूंड़ हिलाता हुआ कई दोस्तों के साथ हाजिर हो गया।वह बहुत गुस्से में दिख रहा था।
           “महाराज---की जय हो। रामू हाथी ने सूंड़ उठा कर गबरू को अभिवादन किया।
    “आओ----आओरामू बैठो।गबरू दहाड़ते हुये भी मुस्करा पड़ा।वह समझ गया कि रामू क्यों इतने गुस्से में है।
                  “क्या बैठूं महाराज---अब तो जंगल में रहना भी दूभर हो गया है।रामू फ़िर चिग्घाड़ा।अब देखिये उस---चीं चीं चींटी को---उसने मुझे कुश्ती लड़ने को ललकारा है।
       “अरे तो इसमें परेशानी की क्या बात?लड़ लो उससे कुश्ती।गबरू मुस्करा कर बोला।
   महाराज अब आप भी ऐसी बात कहेंगे।रामू हाथी दयनीय सूरत बना कर बोला।
       आप खुद ही सोचिये महाराज----अगर छोटे छोटे कीड़े मकोड़े हमें ऐसे ही ललकारते रहेंगे तो हमारा भय ही खतम हो जाएगा जंगल में।भला कौन हम बड़े जानवरों की इज्जत करेगा?भालू अपनी घुरघुराती आवाज में बोला।
    हां बात तो तुम लोगों की सही है।पर इसका उपाय क्या किया जाय?गबरू शेर कुछ सोचता हुआ बोला।
       इसका उपाय यही है महाराज कि मैं जा कर चीं चीं चींटी की पूरी बिल को तोड़ दूं।न रहे बांस न बजे बांसुरी।रामू हाथी गुस्से में पैर पटकता हुआ बोला।
        ना ना ---ऐसी गलती मत करो।सब तुम्हें ही कहेंगे कि चुपके से जाकर चींटी के घर में उसे मार दिया।गबरू शेर ने उसे समझाने की कोशिश की।
   तो क्या करूं?उसको यूं ही जंगल में सबसे कहने दूं कि वो मुझसे कुश्ती लड़ने वाली है।रामू हाथी खिसिया कर बोला।
      नहीं मेरी मानो तो तुम उसका चैलेंज स्वीकार कर लो।और खुले मैदान में उसे सबके सामने हराओ।ताकि दूसरे जानवरों और कीड़े मकोड़ों को भी सबक मिल सके।गबरू दहाड़ कर बोला।
     हां रामू दादा---महाराज ठीक कह रहे हैं।भालू अपने नथुने खुजला कर बोला।
         “ठीक है महाराज----फ़िर मैं कब लड़ूं उससे कुश्ती?रामू ने पूछा।
       “शुभ काम में देर किस बात की।कल ही रख लो।गबरू ने जवाब दिया।
            “और हां,शेरू तुम जाकर चींटी को बता दो कि रामू हाथी उससे लड़ने को तैयार है।और बंदर से कहकर पूरे जंगल में इस बात की डुगडुगी पिटवा दो कि मेरी गुफ़ा के सामने कल दोनों की कुश्ती होगी।फ़िर रामू हाथी,भालू और शेरू वहां से चले गये और गबरू भी आराम करने लगा।
      अगले दिन सबेरे ही जंगल के सारे जानवर,पक्षी,कीड़े मकोड़े गबरू शेर की गुफ़ा के सामने इकट्ठे हो गये।आखिर इतनी मजेदार कुश्ती जो होनी थी वहां।ज्यादातर जानवर जमीन पर और पक्षी पेड़ों पर बैठे थे।गबरू अपनी गुफ़ा के चबूतरे पर बैठा था।रामू हाथी भी आ चुका था।सबको इन्तजार था तो बस चीं चीं चींटी का।सब आपस में बात कर ही रहे थे तभी चीं चीं चींटी भी आ गयी।गबरू शेर ने दहाड़ कर सबको खामोश कराया।
  अब आप लोग शान्त हो जाइये।रामू और चींटी दोनों आ चुके हैं।गबरू के कहते ही सब खामोश हो गये।
     गबरू ने रामू हाथी और चीं चीं चींटी को सामने आने का इशारा किया।दोनों बीच की खाली जगह पर आ गये।भालू हाथ में सीटी लेकर रेफ़री बन कर खड़ा हो गया।रामू हाथी बहुत ही गुस्से में चीं चीं चींटी को घूर रहा था।
   सुनो रामू हाथी और चीं चीं चींटी---तुम लोग मेरे पंजे का इशारा होते ही कुश्ती शुरू कर दोगे।कोई एक दूसरे को जान से मारने की कोशिश नहीं करेगा। गबरू शेर दहाड़ा।
       ठीक है महाराज---।रामू भी चिग्घाड़ पड़ा।साथ ही चींटी भी अपनी महीन आवाज में कुछ बोली पर उसकी आवाज रामू की चिग्घाड़ में दब गई।
    जैसे ही गबरू ने पंजे का इशारा किया रामू ने अपना अगला पैर उठा कर चीं चीं चींटी के ऊपर रखना चाहा।सबकी सांसें रुक गयीं।लगता है नन्हीं चींटी गयी—”पेड़ पर बैठा तोता चीखा।पर हाथी का पैर पड़ने से पहले ही चींटी अपनी जगह छोड़ कर उसके पीछे वाले पैर की तरफ़ भागी।रामू  हाथी फ़ुर्ती से फ़िर घूमा।इस बार हाथी ने दूसरा पैर उठाया तब तक चीं चीं करती हुयी चींटी उसके एक पैर पर चढ़ चुकी थी।रामू हाथी पैर पटकता हुआ जमीन पर चींटी को ढूंढ़ रहा था और चीं चीं चींटी तेजी के साथ भागती हुयी उसकी सूंड़ में घुस गयी।रामू अभी भी उसे जमीन पर ही खोज रहा था।भालू कभी रामू के आगे कभी पीछे जा रहा था कि शायद कहीं चीं चीं चींटी दिख जाय।
           ठीक उसी समय चींटी ने रामू की सूंड़ में काटना शुरू कर दिया।रामू हाथी अपनी सूंड़ ऊपर उठा कर बड़ी जोर से चिग्घाड़ा।चींटी ने उसे फ़िर काटा।रामू फ़िर चिग्घाड़ा।और फ़िर तो चींटी रामू की सूंड़ में काटती रही और रामू पैर पटक पटक कर चिग्घाड़ता रहा।अंत में रामू हाथी बेदम होकर जमीन पर बैठ गया।वह बहुत ही दयनीय आवाज में बोला,,अरे चीं चीं चींटी अब मत काटो मुझे---तुम जीत गयी मैं हार गया।अब छोड़ दो मुझे---।
             रामू की हालत देखकर सारे जानवर हंसने लगे।गबरू भी हंस पड़ा।उसने भी चींटी को समझाया—“अब इसे छोड़ भी दो नन्हीं चींटी---बेचारा हार तो गया है।अंत में चीं चीं चींटी फ़ौरन चीं चीं करती हुयी रामू की सूंड़ से बाहर आ गयी।और रामू हाथी तेजी के साथ घने जंगल की ओर भागता चला गया।
                   000

डा0हेमन्त कुमार