शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

राखी का दिन----।

राखी का दिन जब आयेगा
बहुत सबेरे उठ जाऊंगी
छोटे भैया को भी जगा के
अपने संग मैं नहलाऊंगी।
राखी का दिन-----------।

सुन्दर कपड़े पहना करके
मैं भैया को सजाऊंगी
प्यारे सुन्दर फ़ूलों से फ़िर
राखी एक बनाऊंगी।

राखी का दिन-----------।
(चित्र गूगल से साभार)

भैया को फ़िर पास बिठाकर
प्यार से राखी बांधूंगी
अगर मिठाई नहीं मिली तो
गुड़ और दही खिलाऊंगी।
राखी का दिन-----------।
0000

डा0हेमन्त कुमार

बुधवार, 19 अगस्त 2015

पिंकू बैठा रेल में

एक गांव के किनारे खेते में ढेर सारे चूहे रहते थे।उनका सरदार था टिंकू।टिंकू उन चूहों में सबसे समझदार और बूढ़ा था।इसीलिये सारे चूहे उसकी बात मानते थे।किसी को कहीं भी जाना होता तो सबसे पहले वह टिंकू से पूछ लेता तभी जाता था।उसी खेत में एक छोटा चूहा पिंकू भी रहता था।
      पिंकू छोटा था पर था बहुत नटखट।वो बहुत घुमक्कड़ भी था।जब सारे चूहे खाना खा कर आराम करते तो पिंकू खेत से थोड़ी दूर बनी रेलवे लाइन के पास चला जाता और वहां बैठ कर आती जाती रेलगाड़ियों को देखता रहता।रेल गाड़ियों को देखकर पिंकू सोचता कि कितना अच्छा होता अगर वह भी कभी इन रेलगाड़ियों पर घूम पाता।ये सोच कर वह खुश होता कि रेलगाड़ी पर कभी वह बैठेगा तो कितना मजा आयेगा।
एक दिन टिंकू कुछ बूढ़े चूहों के साथ बैठा बातें कर रहा था।उसी समय पिंकू वहां पहुंचा।पिंकू को देखकर टिंकू ने पूछा,
बोलो पिंकू बेटा
कहां की है तैयारी
सज धज कर क्यों निकले
जाती कहां सवारी?
टिंकू की बात सुनकर पिंकू शर्मा गया।वह शर्माता हुआ बोला,
टिंकू दादा टिंकू दादा

ना मैं सज धज के निकला
ना ही कहीं की है तैयारी,
मैं तो आया पास तुम्हारे
सुनने को बस बातें न्यारी।
पर एक बात आई है मेरे
कहें तो पूछूं आपसे?

पिंकू की बात सुनकर सभी बूढ़े चूहे हंस पड़े।इससे पिंकू और शर्मा गया।फ़िर टिंकू ने उससे कहा,
पूछो बेटा पिंकू पूछो
एक नहीं दस बातें पूछो
इस छोटी सी बात से बेटा
तुम हो क्यों शर्माते?
       टिंकू की बात सुनकर पिंकू के अंदर थोड़ी हिम्मत आयी।फ़िर भी उसने डरते डरते ही पूछा,“टिंकू दादा—ये खेत के किनारे पटरी पर रेलगाड़ी दौड़ती है।क्या हम लोग भी उस पर कभी नहीं बैठ सकते?”
                 पिंकू की बात सुन कर टिंकू कुछ देर तो चुप रहा फ़िर उसने पिंकू को समझाया,“देखो पिंकू बेटा,रेलगाड़ी आदमियों के बैठने की सवारी है।वह बहुत तेज चलती है।अगर हम चूहे उस पर बैठेंगे तो गिर पड़ेंगे।इसी लिये बेटा तुम रेलगाड़ी पर बैठना तो दूर उसके नजदीक भी कभी मत जाना।नहीं तो भारी मुसीबत में पड़ जाओगे।”
  लेकिन पिंकू भला कहां बात मानने वाला था टिंकू की।उसे करनी तो अपने मन की थी।वह एक दिन चुपके से चल पड़ा रेलगाड़ी मैं बैठने के लिये।पिंकू रेल लाइन के एकदम किनारे दुबक कर बैठ गया।उसने सोचा कि कोई रेलगाड़ी आएगी तो वह भी झण्डी की तरह अपनी पूंछ हिलाकर उसे रोक देगा।
        उसे वहां बैठे बहुत देर हो गयी।काफ़ी देर बाद उसे एक रेलगाड़ी आती दिखाई पड़ी।पिंकू ने रेलगाड़ी देखते ही अपनी पूंछ को जोर जोर से हिलाना शुरू कर दिया।पर गाड़ी रुकनी तो दूर धीमी भी नहीं हुयी।जब गाड़ी काफ़ी नजदीक आ गयी तो पिंकू डरा कि रेलगाड़ी कहीं उसके ऊपर ही न चढ़ जाए।वह तुरन्त ही कूदकर रेलवे लाईन के किनारे ही एक कोने में दुबक गया।गाड़ी धड़-धड़ धड़-धड़ करती खूब शोर मचाती हुयी लाइन पर से चली गयी।

“   बाप रे—जब बाहर से रेलगाड़ी की इतनी तेज आवाज सुनायी दे रही है तो भीतर तो पता नहीं क्या हाल होगा?मैं तो नहीं बैठूंगा इस भूत जैसी गाड़ी पर।” पिंकू ने मन ही मन सोचा।बस पिंकू तेजी के साथ उछलता कूदता गिरता पड़ता हुआ खेतों की तरफ़ भाग निकला।और अपने दूसरे नन्हें चूहे दोस्तों के पास पहुंच कर खेलने लगा।
        0000

डा0हेमन्त कुमार

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

देश बचाना है हमको---।

पढ़ लिख के मूंछों की रौनक
नहीं बढ़ाना है मुझको
खादी के कपड़ों पे धब्बे
नहीं लगाना है मुझको
पढ़ लिख के मूंछों की रौनक
नहीं बढ़ाना है मुझको।

आतंकी हमलों पर तो अब
रोक लगाना है मुझको
देश को देखें तिरछी नजरें
सबक सिखाना है उनको
पढ़ लिख के मूंछों की रौनक
नहीं बढ़ाना है मुझको।

कलम किताबों संग हाथो में
बन्दूक उठाना है हमको
देश को भीतर बाहर से
मजबूत बनाना है हमको।
पढ़ लिख के मूंछों की रौनक
नहीं बढ़ाना है मुझको।
000
डा0हेमन्त कुमार




सोमवार, 10 अगस्त 2015

पहले चिट्ठी आती थी

पहले चिट्ठी आती थी
खबरें ढेरों लाती थी
बाबा दादी,नाना नानी
सबके हाल सुनाती थी।
पहले चिट्ठी------------।
बतियाती पापा से पहले
मां को कभी रुलाती थी
गांव की सोंधी मिट्टी के संग
थोड़ा सा गुड़ लाती थी।
पहले चिट्ठी------------।
गांव के मेले गुब्बारे संग
ढेरों कम्पट लाती थी
बाग बगीचों की हरियाली
चिट्ठी में दिख जाती थी।
पहले चिट्ठी आती थी
खबरें ढेरों लाती थी।
000

डा0हेमन्त कुमार

सोमवार, 27 जुलाई 2015

मोती का इंटरव्यू

जब नौकरी की तलाश में,
मोती    कुत्ता   आया।
घंटी बजा, बुलाकर उसको,
भालू    ने   समझाया।

उसे  नौकरी  दूंगा जो कि,
बोल   सके  दो  भाषा।
सुनकर भी मोती कुत्ते को,
हुई  न  तनिक निराशा।

बोला  आती  भाषाएं दो,
लो  मैं   तुम्हें  सुनाऊं।
पहले   तेज-तेज  गुर्राया,
और  फिर  बोला म्याऊं।
000


डा0अरविन्द दुबे
पेशे से चिकित्सक एवम शिशु रोग विशेषज्ञ डा0 अरविन्द दुबे बाल एवम विज्ञान साहित्य लेखन के क्षेत्र में एक चर्चित एवम प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं।देश की प्रतिष्ठित पत्र,पत्रिकाओं में लेखन के साथ ही रेडियो,टेलीविजन एवम शैक्षिक दूरदर्शन के कर्यक्रमों हेतु सैकड़ों आलेख लिखने के साथ ही कार्यक्रम प्रजेण्टर के रूप में भी कार्य।आपकी अभी तक प्रकाशीत महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं--जानें अपने जिगर को,खुद पहचानें रोग,रेडियेशन ऐन इनविजिबिल रे आफ़ लाइफ़-एक्स रे,न्युक्लियर पावर मिथ्स ऐण्ड रेडियेशन्स, न्युक्लियर रेडिएशन इन मेडिसिन।वर्तमान में भी आप अपने चिकित्सीय कार्य के साथ लेखन में लगातर सक्रिय हैं।



बुधवार, 22 जुलाई 2015

नन्हां पौधा

पहले था इक नहां पौधा
अब मैं हूं एक बड़ा सा पेड़
हरे भरे जंगल में भैया
मुझसे भी कुछ बड़े हैं पेड़
बड़े पेड़ कुछ मोटे पेड़।

जमीन के अंदर है मेरी जड़
उसके ऊपर तना बना है
तने से निकली शाखाएं हैं
शाखाओं में लगी पत्तियां
लगी पत्तियां हरी पत्तियां।

पानी खाद मुझे जो दोगे
रहूंगा हरदम हरा भरा
पर काटोगे मुझको भैया
होगा जग का नुकसान बड़ा
नुकसान बड़ा तूफ़ान बड़ा।
पहले था इक नन्हां पौधा
अब मैं हूं इक बड़ा सा पेड़।
000

डा0हेमन्त कुमार

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

जंगल का दोस्त

एक छोटी सी बच्ची थी छोटू प्यारी सी गोलमटोल,मगर अव्वल दर्जे की शरारती।उसके पिता वन अधिकारी थे झारंखड के एक छोटे शहर में रहती थी वो पढ़ाई की बात आते ही बुखार लग जाता उसे।तीसरे कक्षा की छात्र छोटू कई मामले में समझदारी खू दिखाती। पापा की लाड़ली थी।एक दिन उसके पिता ने घर आते ही कहा,नीरा आज हम जंगल जायेंगे।छोटू बहुत ही ख़ुश हो गयी,एक तो जंगल में मंगल दूसरे उसकी पढाई से छुट्टी ..... दीदी खिलौने ले लेना मेरी,ख़ुशी से वो लगभग चीख़ रही थी माँ टोनी को(छोटा कुत्ता ) ले लेना।नियत समय पर जीप गई,चारो भाई बहन,माँ पिताजी ,चपरासी धन्नु जल्दी चलो पापा की हड़बड़ी आज अच्छी लग रही थी छोटू को पहाड़ी सड़कें कहीं ऊपर कहीं नीचे जैसे ही सड़क टूटी होती जीप उछल जाती सबके सब हँस पड़ते चा-चा....चीं चीं काँव- काँव ड्राईवर कुजूर ने तुरन्त भाँप लिया सर जानवर है शायद बाघ छोटा नागपुर में जानवर अधिक है और वन अधिकारी तो वैसे भी वहीं जायेंगे जहाँ पेड़ हों,जानवर हों अचानक ज़ोर से जीप रूकी सभी सहम से गए एक विशालकाय हाथी सड़क पर कराह रहा ' गाड़ी रोको' पापा ने कह सर जंगली हाथी ख़तरनाक होते हैं आस-पास और भी हाथी होगे गाड़ी रूक गई सारे बच्चे दुबक शाही जी गाड़ी से उतर ए। हाथी तड़प रहा थाउसके पैर में बड़ा काँटा चुभा था पैर पटक रहा था वो धीरे-धीरे सारे लोग गाड़ी से उतर आये शाही जी ने फ़र्स्ट एड बाक्स निकलवाया और लग गए काँटा निकालने 'आह ' निकल गया सभी खुशी से झूम उठे हाथी की आँखों से अविरल आँसू बह रहे सबने हाथी को प्यार किया और आगे बढ़ चले "सुहाना सफ़र और ये मौसम हँसी " सामने' मारोमार' का गेस्ट हाउस था सभी थके माँदे,मगर छोटू के मन में वही हाथी की बात थी कहाँ होगा,कैसे काँटे लगे,कब वो नींद की गोद में चली गई सुबह कोलाहल से आँखें खुली आँखे मलते बाहर गई बहुत भीड़ थी समझ से बाहर लगी बात नज़रें उठाई,पूरा गेस्ट हाउस फूलों से सज़ा था ।किसने किया?कौन था ?तभी सबकी निगाह कीचड़ पर हाथी के निशानों ( पैर ) पर पड़रात में हाथी सज़ा गया थाशायद वो प्यार के बदले प्यार देना जानता था
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लेखिका-निवेदिता मिश्रा झा
सम्प्रति दिल्ली में निवास।पत्रकार व काउन्सलर।तीन पुस्तक प्रकाशित,चार साझा संग्रह।नीरा मेरी माँ है ,मैं नदी हूँ, देवदार के आँसू निवेदिता जी की यह पहली बाल कहानी है।
मोबाइल--9811783898