शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

ये दिन




काले काले बादल आये
सूरज के शरमाने के दिन
गर्मी टाटा करके बोली
मेरे हैं अब जाने के दिन।

मोर नाच कर कहता सबसे
आये खुशी मनाने के दिन
बंधन कोई बांध न पाये
नदिया के इठलाने के दिन।

पलक झपकते छुट्टी बीती
नई क्लास में जाने के दिन
होमवर्क फ़िर गले पड़ गया
पढ़ने में जुट जाने के दिन।
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गीतकार:कौशल पाण्डेय
हिन्दी अधिकारी
आकाशवाणी ,पुणे ।
मोबाइल न0-:09823198116
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित

बुधवार, 1 जुलाई 2009

गबरू शेर ने खाया केला

गबरू शेर अब बहुत बूढ़ा हो गया था ।उसके सारे दांत टूट गये थे ।वह अब बहुत दुखी रहता था ।सोचता अब मैं क्या खाऊंगा ?कैसे जिन्दा रहूंगा ?एक दिन उसने जंगल के सारे जानवरों की सभा बुलाई ।सबको अपना पोपला मुंह दिखाया और बोला----‘मुझे खाने की कोई ऐसी चीज लाकर दो जिसे बिना दांतों के मैं खा सकूं ।’
सबने कहा महाराज हम जल्द ही ऐसी चीज लायेंगे ।फ़िर सब वापस लौट गये ।जंगल के सारे जानवर लगे सोचने शेर को क्या खिलाया जाय ?उसे क्या लाकर दिया जाय ?
अगले दिन कुत्ता शेर के लिये रोटियां लाया ।शेर रोटियां देख कर बहुत खुश हुआ ।
पर रोटियां मुंह में डालते ही उसने मुंह बिचकाया ।रोटियां बहुत कड़ी थीं । शेर उन्हें चबा नहीं पाया
।दोपहर में घोड़ा कहीं से मुलायम घास लाया ।शेर ने उसे भी सूंघा और मुंह बिचकाकर बोला---‘अब क्या मुझे घास खाकर रहना पड़ेगा ?भला इससे मेरा पेट भरेगा ?’
शाम को बिल्ली गबरू के लिये एक कटोरे में दूध लाई ।शेर ने दूध भी चखा ,पर वह भी गबरू को अच्छा नहीं लगा ।धीरे धीरे दो दिन बीत गये ।खाने की कोई चीज गबरू को अच्छी नहीं लग रही थी । आखिर उसकी मांस खाने की आदत जो थी ।एक छोटी गिलहरी ढेर सारे बादाम शेर के लिये लाई । शेर खुश तो हुआ पर---वह बादाम भी नहीं खा सका ।
गुस्सा होकर गबरू शेर जोर से दहाड़ा ।सारे जानवर वहां इकट्ठे हो गये ।गबरू ने उन्हें जोर से डांटा----“मूर्खों तुम्हें अपने राजा का जरा भी खयाल नहीं है ?क्या मैं भूखा मर जाऊं ?”
महाराज हम जल्द ही कोई उपाय करते हैं ।सभी जानवरों ने गबरू को समझाने की कोशिश की ।

“बंदर तू तो आदमियों की बस्ती में जाता है ।वहीं से कुछ ढूंढ़ कर ले आ ।”गबरू ने बंदर को डांटा ।
“महाराज मैं आज आज शाम तक जरूर कुछ लाऊंगा ।”कहकर बंदर डालियों पर लटकता हुआ चला गया ।सारे जानवर सोचने लगे---देखो बंदर गबरू को क्या खिलायेगा ?
शाम को शेर गुफ़ा के सामने बैठा था ।भूख के मारे उसका बुरा हाल था अचानक बंदर पेड़ की डाली से कूदा । उसके हाथों में केले का गुच्छा था । केलों की खुशबू से शेर की भूख और बढ़ गयी ।बंदर ने एक केला छीला ।उसे गबरू के पोपले मुंह में डाल दिया ।
“वाह कितना मीठा है ---------और मुलायम भी ।” गबरू खुश होकर बोला ।
बंदर एक एक केला छील कर कर गबरू को खिलाता गया ।गबरू का पेट भर गया ।वह खुशी में जोर से दहाड़ा । सारे जानवर वहां फ़िर आ गये । बंदर शेर को केले खिला रहा था ।सब आश्चर्य से दोनों को देख रहे थे।
“ दोस्त तुम मुझे रोज यही फ़ल लाकर खिलाया करो ।”गबरू बोला अब बंदर रोज उसे केले खिलाता है ।गबरू शेर भी काफ़ी खुश रहता है ।
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हेमन्त कुमार

रविवार, 28 जून 2009

बालगीत-- बरखा रानी



झम झम झम झम बरसा पानी
आई प्यारी बरखा रानी
दुखी हुई अब धूप सुहानी
जब से आई बरखा रानी ।

झूम झूम कर नाच रहे हैं
सभी वृक्ष जंगल में
धन्यवाद दे्ते बादल को
मोर पपीहे नाच नाच के ।

खेलो कूदो मौज करो तुम
आज के इस मौसम में
नाव बना लो इक कागज की
तैरा दो उसको पानी में ।

लेकिन कर लो थोड़ी पढ़ाई
नहीं पड़ोगे तुम चिन्ता में
स्कूल खुलेगा अब जल्दी ही
वहां भी खेलोगे पानी में ।
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नित्या शेफाली का बालगीत
हेमंत कुमार द्वारा प्रकाशित



















शुक्रवार, 19 जून 2009

बालगीत--नन्हीं चुहिया


नन्हीं चुहिया चली अकड़कर,
दाना दांत दबाए,
है कोई क्या ऐसा,
जो मुझसे रेस लगाये।

सुनकर चुहिया की बानी,
बोली बिल्ली खिसियानी,
इक दिन लाऊंगी रस्ते पर,
याद आएगी तुझको नानी।

बिल्ली बैठी रस्ते पर,
इक दिन घात लगाए,
दिख जाए जो चुहिया,
उसको धर लूं पांव दबाय।

घूम घाम कर चुहिया पहुंची,
खाने बाग के आम,
मार झपट्टा मौसी ने,
किया उसका काम तमाम।
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कवियत्री :पूनम का बालगीत
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित



मंगलवार, 16 जून 2009

बालगीत -भालू की साइकिल


भालू लेकर आया साइकिल कितनी प्यारी कितनी सुन्दर,
कितनी प्यारी कितनी सुन्दर दौड़े देखो कैसी सर सर।

भालू उछल सीट पर बैठा और लोमड़ी पीछे,
फ़िर पैडल पर जोर लगाकर भालू साइकिल खींचे,
पीछे भागे मोती कुत्ता साथ में रामू बंदर,
भालू लेकर आया साइकिल कितनी प्यारी कितनी सुन्दर।

हाथी दादा बोले हम भी बैठेंगे साइकिल पर,
चढ़े सीट पर जैसे ही वे साइकिल बोली चर चर,
भालू रोया अपनी टूटी फ़ूटी साइकिल देखकर,
भालू लेकर आया साइकिल कितनी प्यारी कितनी सुन्दर।

भालू लेकर आया साइकिल कितनी प्यारी कितनी सुन्दर,
कितनी प्यारी कितनी सुन्दर दौड़े देखो कैसी सर सर।
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गीतकार-डा0 अरविन्द दुबे
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित
*पेशे से चिकित्सक एवम शिशु रोग विशेषज्ञ डा0 अरविन्द दुबे
बाल एवम विज्ञान साहित्य लेखन के क्षेत्र में एक चर्चित एवम प्रतिष्ठित
हस्ताक्षर हैं।




शुक्रवार, 12 जून 2009

सूरज


रोज सबेरे आता सूरज,
हंसता और मुस्काता सूरज,
अंधियारे को दूर भगाकर,
उजियारे को लाता सूरज।
रोज सबेरे--------------।

कभी सुनहली कभी लाल और,
पीली गेंद बनाता सूरज,
रोज सबेरे पूरब में उग,
शाम को पश्चिम जाता सूरज।
रोज सबेरे------------------।

धूप रोशनी गर्मी देकर,
जाड़ा दूर भगाता सूरज,
सतरंगी किरणों से अपनी,
नई छटा बिखराता सूरज।
रोज सबेरे आता सूरज,
हंसता और मुस्काता सूरज।
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हेमन्त कुमार

मंगलवार, 19 मई 2009

जीवों की निराली दुनिया (भाग -२)

जिस तरह हम आदमियों का स्वभाव,आदतें व रहन सहन अलग-अलग होता है।
उसी तरह इस धरती पर रहने वाले विभिन्न प्रकार के जन्तुओं में भी बहुत सी
भिन्नतायें पाई जाती हैं।आज हम आपको ऐसे ही जन्तुओं में से दो की आदतों के
बारे में बता रहे हैं।
गिलहरी भागे दोनों ओर:
आपने अपने घरों के आस-पास,बगीचों में,पेड़ों की पतली-पतली
टहनियों पर उछलती-कूदती,उतरती-चढ़ती गिलहरियों को जरूर देखा होगा।लेकिन हम जिसके बारे में आपको बताने जा रहे हैं ,वो इन सब आम गिलहरियों से थोड़ा अलग हट
कर है। और इसकी सबसे खास बात तो यही है कि इसे आप अपनी जेब में भी रख सकते हैं।जी हां मैं जिसकी बात कर रहा हूं उसका नाम ही है जेबी गिलहरी।
इसकी दूसरी खासियत यह है कि यह जितनी तेजी के साथ आगे की ओर भागती है ,उतनी ही तेजी से बिना पीछे मुड़े वापिस भी लौट सकती है।

एकता की मिसाल जेलीफ़िश:
आपने अपने घरों में चीनी य गुड़ की तलाश में इधर उधर
भागती चींटियों की लंबी कतार तो जरूर देखी होगी।कितनी अच्छी लगती है ये कतार।
लेकिन यह विशेषता सिर्फ़ चींटियों में ही नहीं पाई जाती है।
समुद्री मछली जेली फ़िश भी इन्हीं चींटियों की ही तरह कतार बना कर चलती हैं।जेली फ़िश मुख्य रूप से अरब सागर में पाई जाती है। ये हजारों की संख्या में एक दूसरे के पीछे आपस में सटी हुई चलती हैं। ऐसा लगता है जैसे चमकती हुई एक लंबी सी जंजीर नीले पानी ले ऊपर तैर रही हो ।
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हेमन्त कुमार