रविवार, 11 मार्च 2018

महमूद बघर्रा


(हिन्दी के प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार हमारे पिताजी आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी का आज 89वां जन्म दिवस है।वो भौतिक रूप से हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं लेकिन उनकी रचनात्मकता तो हर समय हमारा मार्ग दर्शन करेगी .---ऐतिहासिक व्यक्तित्व महमूद बघर्रा के विषय में रोचक जानकारियां देने वाला यह लेख पिता जी ने देहावसान से एक दो माह पहले ही लिखा था। उनकी अभी तक अप्रकाशित इस रचना को आज मैं फुलबगिया पर प्रकाशित कर रहा हूँ।)    
                                 
                    महमूद बघर्रा
                         

प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
      दोस्तों पता नहीं तुमने कभी महमूद बघर्रा का नाम पढ़ा है या नहीं। अगर नहीं तो चलो आज पढ़ ही लेते हैं।मगर यह काल्पनिक नाम नहीं इतिहास का एक सच है।एक अद्भुत व्यक्तित्व।पढ़ोगे तो दांतों तले उंगली दबाए रह जाओगे।
    इतिहास में कहीं कहीं इनका नाम महमूद बघेला भी मिलता है।यह लोदी वंश से था और सन पन्द्रह सौ के आस पास गुजरात का सुल्तान था।पन्द्रह सौ ग्यारह म्में इसकी मृत्यु हुयी।
    इतिहास में कुछ सुल्तान क्रूरता के लिये,कुछ वीरता के लिये और कुछ दयालुता के लिये प्रसिद्ध हैं।मगर बघर्रा में ऐसा कुछ नहीं था।वह मशहूर है अपने भोजन के लिये।जैसे रावण का भाई कुम्भकर्ण सोने के लिये।गनीमत थी कि कुम्भकर्ण साल में छः महीने सोता था।मगर बघर्रा तो पूरे साल जागता था। चलो कुछ उसके भोजन के बारे में बताएं। अच्छा हुआ कि वह आज के जमाने में नहीं हुआ।वरना उसके कारण सौ डेढ़ सौ लोगों को रोज खाना ही नसीब न होता।
     आओ,उसके सुबह के नाश्ते से बात शुरू करते हैं।सुबह नाश्ते में वह डेढ़ से दो दर्जन तक मुर्गे खाता था।दो से लेकर चार दर्जन तक अंडे।यह कम से कम मात्रा बतायी गयी है इतिहास में।पता नहीं कितनी मटकी दूध,दही,मक्खन,मलाई। इसी तरह और बहुत कुछ।
    अब आओ उसके भोजन पर एक नजर डालते हैं।उसके लिये एक देग भर कर चावल पकता था।सोच लो कि एक देग में चार से लेकर पांच बाल्टी तक पानी आ सकता है।सोचो उस पूरे देग में कितना चावल पकता होगा।चावल के अलावा सौ से लेकर डेढ़ सौ तक रोटियां।साथ में कितने मांस मछली की जरूरत पड़ती होगी सोच लो।
    उसके पलंग के चारों ओर थालों और परातों में भोजन भरा रहता था।वह जिस थाल पर चाहता था हाथ मारता रहता था।मिनटों में थाल खाली हो जाता था।वह जब सोता था तो उसके खर्राटों की आवाज बड़ी भयानक होती थी।जैसे आस पास भेड़िए गुर्रा रहे हों।
    उसमें एक बात खास थी।वह बड़ी आसानी से अनुमान लगा लेता था कि उसके भोजन में कोई कटौती तो नहीं हुयी।उदाहरण के लिये तुमने पालतू हाथियों के बारे में सुना होगा।उसकी खुराक के रूप में गन्ना,पीपल य बरगद की टहनियां तो दी ही जाती हैं।मगर उसका मालिक उसकी रोटियों के लिये कुछ आटा भी बराबर देता है।पांच से लेकर दस किलो तक।ये रोटियां प्रायः महावत ही तैयार करता है।
   कभी कभी लालचवश महावत कुछ आटा निकाल भी लेता है।हाथी रोटियां देखते ही समझ जाता है कि आज कुछ गड़बड़ है।महावत उसकी सजा जानते हैं।इसलिये उस दिन तो हाथी से दूर रहने की कोशिश करते हैं।मगर नौसिखिया महावत फ़ंस जाते है।प्रायः ही हाथी महावत को सूंड़ से लपेटकर पटक पटक कर मार डालता है।या पैरों से कुचल डालता है।
   एक बार ऐसा ही महमूद बघर्रा के साथ भी हुआ।उसे अनुमान लग गया कि बावर्ची ने चावल में चोरी की है।बस उसने बावर्ची का हाथ पकड़ लिया।बावर्ची समझ गया कि उसकी मौत पक्की है।वह बघर्रा के पैरों पर माथा पटक पटक कर लगा रोने।अपनी गरीबी के दुखड़े रोये।
   महमूद बघर्रा ने तरस खाकर उसकी जान तो बख्श दी।मगर उसने बावर्ची के जिस हाथ को पकड़ा था उसकी हड्डियों का चूरा चूरा हो गया था।क्यों था न बघर्रा इतिहास का एक बेमिसाल व्यक्ति।
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लेखक

प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।
31जुलाई 2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन।
        शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम0ए0।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन मे संलग्न।देश की प्रमुख स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।
बाल कहानियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा”(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)“अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें। सन 2012 में नेशनल बुक ट्रस्ट,इण्डिया से प्रकाशित बाल उपन्यासमौत के चंगुल मेंकाफी चर्चित।नेशनल बुक ट्रस्ट,इण्डिया से प्रकाशनाधीन  बालनाटक संग्रहएक तमाशा ऐसा भी 
   इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र 87 वर्ष की उम्र तक निर्बाध चला। 

     







गुरुवार, 4 जनवरी 2018

जाड़ा

जाड़ा ताल ठोंक जब बोला,
सूरज का सिंहासन डोला,
कुहरे ने जब पांव पसारा,
रास्ता भूला चांद बिचारा।

छिपे सितारे ओढ़ रजाई,
आसमान नहिं दिखता भाई,
पेड़ और पौधे सिकुड़े सहमे,
झील में किसने बरफ़ जमाई।

पर्वत धरती सोये ऐसे,
किसी ने उनको भंग पिलाई,
सुबह हुयी सब जागें कैसे,
मुर्गे ने तब बांग लगाई।

जाड़ा ताल ठोंक जब बोला,
सूरज का सिंहासन डोल॥
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डा0हेमन्त कुमार

मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

दानव से मानव


दानव से मानव
                                                                                                 प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव

                       वल्लभगढ़ के राजकुमार अक्सर घने जंगल में निकल जाते।उन्हें शिकार का कोई शौक नहीं था।बस,मित्रों के साथ घुड़दौड़ नदियों में तैराकी देखते देखते ऊंचे पेड़ों की चोटियों तक पहुंच जाना।ये ही थे उनके शौक।कोई भयानक जानवर आक्रमण कर बैठता तो उससे भी पीछे न हटते।सबसे बढ़कर अपनी मधुर वाणी और सुन्दर व्यवहार के लिये वे पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे।
   उस जंगल में एक नरभक्षी राक्षस और उसका जादुई महल भी था।पिता ने उससे सावधान रहने के लिये बार बार कहा।पर राजकुमार हंस कर उत्तर देते, मैं उसे पा गया तो चुटकियों में मार गिराऊंगा।
                    एक दिन भालू जैसे एक जंगली जानवर ने अचानक उनके ऊपर हमला कर दिया।राजकुमार ने तुरन्त भाला निकाल लिया।भाला देखते ही वह जानवर भाग निकला।बेहद तेज गति से।राजकुमार उसे पकड़ नहीं पा रहे थे।वह घोड़े की गति से तेज भाग रहा था।एक एक कर सभी पीछे छूट गये।अंधेरा घिर आया। अचानक राजकुमार को उस अंधेरे में चमकता हुआ एक महल दिखाई पड़ा।दीवारों से लेकर कंगूरे तक एक दम जैसे बिजली में नहाया हुआ।उधर वह जानवर भी ना जाने कहां गायब हो गया।राजकुमार को लगा----शायद यही उस नरभक्षी राक्षस का जादुई महल हो।
   राजकुमार अब बुत थक गये थे।वे फ़ाटक के बाहर बने एक चबूतरे पर बैठ गये।सामने चबूतरे पर तीन टोकरियों में ताजे ताजे फ़ल रखे थे।भूख से बेहाल राजकुमार ने एक फ़ल उठा लिया।
    मगर तभी फ़ाटक के पीछे से एक मधुर स्वर सुनाई दिया—“सावधान राजकुमार,यह नरभक्षी राक्षस का महल है।ये जादुई फ़ल हैं।इन्हें खाते ही आप बेहोश हो जाएंगे।तब राक्षस आप को खा जाएगा।मैं दूसरे फ़ल लेकर आती हूं।
   इसी के साथ फ़ाटक का एक पल्ला खुला।एक सुन्दर लड़की थाली में ताजे फ़ल लेकर राजकुमार के पास आई।
    राजकुमार ने पूछा—“तुम कौन हो?
    मैं भी एक राजकुमारी हूं।आप की तरह मुझे भी फ़ंसा कर यहां लाया गया है।जल्दी से फ़ल खा लो।राक्षस के आने का समय हो रहा है।राजकुमारी बोली।
    मेरे बचने का क्या उपाय है?
    बताती हूं,पहले पेट में कुछ डाल लो।
        “तुम अभी तक कैसे बची हो?
वह मुझे अपना मन बहलाने के लिये रखे है।कभी गाने सुनता है कभी मेरा नृत्य देखता है।लेकिन मेरे शरीर को उसने कभी छुआ तक नहीं।महल के कैदखाने में सैकड़ों लोग बंद हैं।जिस दिन इसे बाहर शिकार नहीं मिलता इन्हीं में से किसी एक से अपनी भूख मिटाता है।
 अब तक राजकुमार फ़ल खा चुका था।
देखो आंगन में खड़ा यह ऊंचा पेड़ देखते हो?क्या तुम इस पर चढ़ सकते हो?
राजकुमार हंस कर बोला—“क्या तुम यह कहना चाहती हो कि मैं इस पेड़ पर चढ़ कर अपनी जान बचाऊं?राक्षस वहां नहीं पहुंच पाएगा?
नहीं नहीं---इस पेड़ की चोटी पर एक फ़ल लगा है।वह फ़ल तुम्हारे हाथ में आते ही राक्षस तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।तुम उस फ़ल के जितने टुकड़े करोगे राक्षस के भी उतने टुकड़े होते जाएंगे।
देखो ,कैसे चुटकियों में वो फ़ल तोड़ कर लाता हूं?
राजकुमारी ने टोका—“यह काम इतना आसान नहीं है।पेड़ की एक एक डाल तुम्हें ऊपर चढ़ने से रोकेगी।
तुम उसकी चिंता मत करो।यह कह कर राजकुमार जल्दी से अपने से लिपटती हर डाल को तोड़ता मरोड़ता ऊपर पहुंच गया।क्षण मात्र में उसने फ़ल को तोड़ लिता।
    मगर यह क्या?पेड़ से फ़ल के अलग होते ही पेड़ पर चमकती रोशनी बुझ गई।पूरे महल की चमक गायब हो गई।राजकुमार समझ गया कि पेड़ से अलग होते ही अब इसमें कोई जादुई शक्ति नहीं।अब यह एक साधारण फ़ल मात्र है।
             इसी समय दूर से राक्षस के दहाड़ने की आवाज सुनाई पड़ी।दहाड़ से पूरा जंगल कांप रहा था।वह पागल की तरह भागा चला आ रहा था।
राजकुमार तुम जल्दी से छिप कर अपने प्राण बचाओ।राजकुमारी डर से कांपती हुई बोली।
  राजकुमारी तुम फ़ाटक बंद कर के भीतर जाओ।मैं उसे बाहर देखता हूं ड़रो मत। वह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
      इधर राजकुमार को देखते ही राक्षस गरजा---कौन हो तुम?तुमने कैसे इस फ़ल को तोड़ने का साहस किया?चलो पहले तुम्हें ही अपना निवाला बनाता हूं।
    राक्षस राज,वल्लभगढ़ के राजकुमार का प्रणाम स्वीकार करें।मैं तो आपके पुत्र समान हूं।क्या अपने पुत्र को ही अपना ग्रास बनाएंगे?
    मुझे बातों से मत बहलाओ।यहां का सब कुछ तुमने नष्ट कर दिया।मेरे प्राण भी अब तुम्हारी मुट्ठी में हैं।राक्षस चिल्लाया।
     अच्छा,आप इसी बात से भयभीत हैं?तो लीजिये संभालिये अपने प्राणों को।कहते हुए राजकुमार ने वह फ़ल राक्षस की ओर उछाल दिया।
   राक्षस आश्चर्य से बोला—“अरे तुम्हें अपने प्राणों का भय नहीं। अब अगर मैं तुम्हें मार कर खा जाऊं?
आप ऐसा कर ही नहीं सकते।मैं अब बाहर नहीं आपके हृदय में हूं तात।
        अब राक्षस के चौंकने की बारी थी।आज तक किसी ने उसे इतना आदर नहीं दिया था।न ही राक्षस राज कह कर प्रणाम किया।न तात ही कहा।सब उससे डरते और नफ़रत करते थे।पर यह तो जैसे सचमुच मेरा बेटा बन गया।
    तभी राजकुमार बोले—“मेरे तात कहने का आप बुरा तो नहीं मान रहे हैं?
बिल्कुल नहीं बेटे।दानव के मुख से अचानक निकल पड़ा। उसके भीतर पता नहीं कहां की ममता उमड़ आई।
तात,मैं चाहता हूं कि आपका यह जादुई महल पहले से भी शानदार हो जाए।
वह कैसे?अब तो सब नष्ट हो चुका है।
मेरे ऊपर विश्वास कीजिये।
ऐसा है तो मेरी भी एक इच्छा पूरी कर दो।कहते हैं कन्यादान से सारे पाप धुल जाते हैं।मैं कन्यादान करना चाहता हूं।
राजकुमार और राजकुमारी प्रसन्न हो उठे।वो दानव का मतलब समझ गये।
राजकुमार मैं जन्म से राक्षस नहीं हूं।मेरा नाम नीलमणि है।मेरे नीच कार्यों ने मुझे दानव बना दिया।राजकुमार ने सब समाचार पिता जी को भेज दिया।शुभ घड़ी में वल्लभगढ़ से बारात आई।नीलमणि ने धूम धाम से कन्यादान किया।
   तात,मैं भी दहेज में कुछ मांगना चाहता हूं।
   कहो राजकुमार,मैं तुम्हें दुनिया की हर चीज दूंगा।
     मुझे बस आपसे एक वादा चाहिये।इस जंगल में सैकड़ों मुसाफ़िर राह भटक कर भूख प्यास से मर जाते हैं।अब ऐसा नहीं होना चाहिये। आप यहां उनके खाने पीने और ठहरने का प्रबंध कर दें।इससे आपकी कीर्ति और बढ़ जाएगी।लोग दानव नहीं मानव नीलमणि को याद करेंगे।इससे आपका महल भी पहले की तरह जगमगाने लगेगा।
नीलमणि के हामी भरते ही चमत्कार हो गया।पूरा महल फ़िर पहले की तरह चमकने लगा।
       नीलमणि की आंखों में प्रसन्नता के आंसू छलक आए।वह महाराज से बोला—“राजन,राजकुमार के कारण ही मैं आज फ़िर से मानव बन गया।वरना मैं पता नहीं कब तक दानवों के नीच कर्म करता रहता।
       महाराज बोले—“नहीं नीलमणि,इसके पीछे राजकुमार का नहीं,उनकी वाणी और व्यवहार का हाथ है।इससे इंसान दुनिया में सब कुछ प्राप्त कर सकता है।
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प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव
 11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।31जुलाई 2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन। शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम0ए0।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन मे संलग्न।देश की प्रमुख स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।
          नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित बाल उपन्यास "मौत के चंगुल में " के साथ ही बाल कहानियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र 87 वर्ष की उम्र तक निर्बाध चला।बाल नाटकों का एक संग्रह नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशनाधीन।


सोमवार, 11 सितंबर 2017

सर्कस से भागा जब भालू----।

सर्कस से भागा इक भालू
साथ में उसके बंदर कालू
भालू के था हाथ में सोटा
सीटी लिये था साथ में कालू।

चौराहे पर जाम दिखा तो
पहुंचे पुलिस बूथ पर दोनों
बंदर सीटी बजा रहा था
सोटा ले के जुट गया भालू।

सारे पुलिस बूथ से भागे
नया दरोगा सबसे आगे
बंदर भालू ने जल्दी से
जाम हटा के सड़क की चालू।
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डा0हेमन्त कुमार

सोमवार, 28 अगस्त 2017

मखमल जैसी वीर बहूटी----।

(जानकारी)             
                   मखमल जैसी वीर बहूटी
                                          

               बरसात के मौसम में अपने घरों के आस पास,किसी पार्क में हरी घास पर रेंगते सुर्ख लाल रंग के मखमली कीड़ों को तो आपने भी देखा होगा।इसका पूरा शरीर देखने में ऐसा लगता है लाल मखमल की बनी छोटी सी कोई गोली लुढ़क रही हो।पर यह एक बहुत खूबसूरत नन्हां सा कीड़ा है जिसके ऊपर की खोल को प्रकृति ने इतना खूबसूरत बनाया है।
   इस खूबसूरत कीड़े का नाम है वीर बहूटी।इसका बोटैनिकल नाम ट्राम्बिडाइडी है।यह भारत के उत्तरी हिस्से में बारिश के दिनों में बहुत ज्यादा दिखलाई पड़ता है।यह जहरीला कीड़ा नहीं होता।यहां तक कि आप इसे अपनी हथेली पर भी रख सकते हैं।गांवों में बच्चे तो अक्सर बारिश के दिनों में कई-कई वीर बहूटियों को इकट्ठा करके महुए के पत्ते की नाव में बिठा कर उन्हें पानी में तैरने के लिये छोड़ देते हैं।
    इस खूबसूरत कीड़े को भारत के अलग अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। आंध्र प्रदेश में इसे “बेलवेट बूचि” या “अरुद्र पुरुगु”,उड़ीसा में “सधबा बोहु”,गुजरात में “गोकल गाय” या “मामा नी गाय” नामों से पुकारते हैं। कहीं कहीं इसे “तीज” या”मादा मक्खी” तो कहीं “रानी कीड़ा” या लिल्ली घोड़ी नाम दिया गया है।
    वीर बहूटी का नाम तो वीर है पर यह बहुत डरपोक और शर्मीला भी होता है।इसे जैसे ही हम छूते हैं या हाथ पर उठाते हैं ये अपने छोटे छोटे पैरों को सिकोड़ कर एक मखमल की गोली जैसा हो जाता है।यह ऐसा खतरा समझ कर करता है। और फ़िर थोड़ी ही देर में जब इसे लगता है कि अब खतरा टल गया है तब अपने पैरों को खोल कर फ़िर रेंगने लगता है।
    
इस खूबसूरत कीड़े की सुन्दरता का वर्णन हिन्दी साहित्य के कवियों ने जगह जगह किया है।इतना खूबसूरत होने के बावजूद हम मनुष्यों ने अपने स्वार्थ के लिये इस  नन्हें जीव को भी नहीं छोड़ा और इसका उपयोग अपने फ़ायदे की दवाएं बनाने में करने लगे।वीर बहूटी का सबसे बड़ा इस्तेमाल पैरालिसिस या लकवे के इलाज में होता है।लकवे से प्रभावित शरीर के अंगों पर इससे बने तेल की मालिश से लकवे का असर काफ़ी कुछ खतम हो जाता है।इसके साथ ही इसका इस्तेमाल जोड़ों के दर्द के इलाज में भी होता है।
    लेकिन अफ़सोस की बात यह भी है कि खेतों में रासयनिक खादों के अधिक उपयोग के कारण अब यह खूबसूरत वीर बहूटी गांवों तक से  गायब होती जा रही।शहरों की तो बात ही अलग है। हमें अपनी प्रकृति के अनोखे वरदान इस नन्हें से जीव को भी बचाने की कोशिश करनी होगी।अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब धरती पर से गायब होते जा रहे जीवों की सूची में इस खूबसूरत नन्हें कीड़े “वीर बहूटी” का भी नाम जुड़ जायेगा।
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डा0हेमन्त कुमार

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

लालच की सजा

लालच की सजा
(दृश्य-5 एवं दृश्य-6)
 (दृश्य-5
(राजा का दरबार।बूढ़ा राजा सिंहासन पर बैठा है। चारों तरफ उसके मंत्री और दरबारी अपने स्थान पर बैठे हैं उसी समय मछुआरा मछलियां लेकर आता है।)
मछुआरा-- महाराज की जै हो।
राजा--    कहो युवक ,तुम्हे क्या कष्ट है?मेरे दरबार में किसकी  फरियाद लेकर आए हो ?
मछुआरा-- महाराज, मुझे कोई कष्ट है और ही मैं किसी की फरियाद ले कर आया हूं।
राजा-- (तेज स्वरों में गुस्से से) तो फिर तुम्हारी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई? क्या तुम जानते नहीं कि मेरा समय कितना कीमती है?
मछुआरा-- (कांपते हुए) हुजूर गुस्ताखी माफ हो! मैं आपके लिए मछलियां ले कर आया हूं।
(राजा अपनी जगह से उछलता है मछुआरे की तरफ बढ़ने की कोशिश करता है और उसी कोशिश में लड़खड़ा कर गिरने लगता है।मंत्री उसे सम्हालता है।)
मंत्री-- धीरज रखें महराज....धीरज रखें
राजा(बहुत निरीह स्वरों में) कैसे  रखूं धीरज मंत्री जी....(प्रसन्नता भरे स्वरों में) मछलियां.......अरे  वाह!(मंत्री से)अरे मंत्री जी, देखो यह वीर युवक मछलियां लेकर आया है।(युवक से) युवक, तुम कहां से मछलियां ले कर आए हो? लाओ जरा जल्दी लाओ ---अब मुझसे बिलकुल भी नहीं रहा जा रहा जरा मैं भी तो देखूं कौन सी मछलियाँ लाये हो तुम ?
मछुआरा-- (हाथ जोड़ कर) महाराज, मैं दूर गांव का रहने वाला एक गरीब मछुआरा हूं दूर देश की  प्यारी, ताजी मछली आपके लिए ही लाया हूं।
(मछुआरा मछलियां ले जाकर राजा को दिखलाता है।राजा उसे सूंघता है।)
राजा-- (मंत्री से) वाह,कितनी प्यारी खुशबू है ?(टोकरी मंत्री को पकड़ाकर) मंत्री जी इस वीर पुरूष को ढ़ेर सारा पुरस्कार दो।बोलो युवक, तुम्हें क्या  पुरस्कार दिया जाय ?हाथी,घोडे़,धन,जो भी चाहो मांग लो।मैं आज तुमसे बहुत खुश हूँ।
मछुआरा--  नहीं महाराज, मुझे पुरस्कार में धन नहीं चाहिए।
राजा-- (आश्चर्य से) बोलो-बोलो, फिर तुम्हें क्या दिया जाए?
मछुआरा(सोचते हुए) महाराज, मुझे पुरस्कार में एक हजार कोड़े मारने का आदेश दें।
(सभी मंत्री एवं दरबारी राजा के साथ हंसते हैं।)
मंत्री-- अरे भाई, यह तो सजा हुई। तुम यह सजा क्यों चाहते हो? कोई और पुरस्कार मांगो।महाराज तुम पर प्रसन्न हैं।
मछुआरा-- नहीं महाराज, मुझे यही पुरस्कार चाहिए।
राजा-- अच्छा ठीक है। यदि इसकी यही इच्छा है तो इसे यही पुरस्कार दिया जाय। इसे धीरे-धीरे एक हजार कोड़े मारे जायं।
(राजा की आज्ञा पाकर एक सिपाही मछुआरे को कोड़े मारना शुरु करता है।500 की गिनती पूरी होते ही मछुआरा  खड़ा हो जाता है।)
राजा(हंस कर) क्यों भाई, अभी तो तुम्हारे 500 कोड़े और बाकी हैं।
मछुआरा-- नहीं महाराज, मैं अपने हिस्से के कोड़े खा चुका।बाकी कोड़े दूसरे व्यक्ति को जिसे मैं कहूंगा उसे लगाए जाएं।
(राजा मंत्री दरबारी  सभी आश्चर्य से उसे देखते हैं)
राजा(उलझन भरे स्वर में)तुम्हारी बात कुछ समझ में नहीं रही है युवक। साफ-साफ कहो क्या चाहते हो?
मछुआरा-- महाराज, आपके महल के मुख्य द्वार पर नियुक्त पहरेदार ने मुझे मछली लेकर आपके पास इस शर्त पर आने दिया था कि पुरस्कार में प्राप्त धन में से आधा मैं उसे दे दूंगा।इसलिए पुरस्कार की  आधी राशि अर्थात् 500 कोड़े उस पहरेदार को लगाए जाएं।
राजा-- (क्रोध में) कौन है वह पहरेदार! उसका नाम बताओ?
मछुआरा-- महाराज, उसने अपना नाम ‘‘काना बैलबताया है।
राजा-- (मंत्री से) मंत्री जी, ‘‘काने बैल‘‘ को फौरन दरबार में हाजिर करवाकर आप उसे दो हजार कोड़े लगवाइए और उसे महल से धक्के देकर बाहर निकलवा दीजिए।ताकि भविष्य में फिर कभी वह रिश्वत लेने की हिम्मत करे।और हां इस वीर युवक को एक हजार सोने की मुहरें देकर इसे सम्मान सहित इसके घर पहुंचवा दीजिए।
 (मंत्री सिपाहियों को काने बैल को लाने की आज्ञा देकर मछुआरे को साथ लेकर खजाने की तरफ चले जाते हैं।)
                            (दृश्य-6
(प्रारम्भिक संगीत के साथ मंच पर एक तरफ से नट और दूसरी तरफ से नटी नाचते गाते हुए आते हैं।)
     नट(गाता है)     लालच कभी करना बच्चो
                         रिश्वत कभी किसी से लेना।
     नटी(गाती है)     वरना कभी बढ़ोगे आगे
                          जीवन भर पछताओगे.....
      नट नटी-(गाता है)- काने बैल ने जैसा खाया
                           तुम भी कोड़े पाओगे,
                           लालच कभी करना बच्चो,
                           रिश्वत कभी किसी से लेना।
       ( दोनों नाचते हुए मंच पर से जाते हैं।दृश्य यहीं फेड आउट होता है।)
००० 
डा०हेमन्त कुमार