गुरुवार, 30 जुलाई 2020

खण्डहर के शैतान

(आज 31 जुलाई को मेरे पिता जी प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार आदरणीय प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की पुण्य तिथि है।2016 की 31 जुलाई को ही 87 वर्ष की आयु में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था।इस बार कोरोना संकट को देखते हुए मैं उनकी स्मृति में कोई साहित्यिक आयोजन भी नहीं कर पा रहा।इसी लिए आज यहाँ मैं पिता जी की एक अप्रकाशित कहानी प्रकाशित कर रहा।उनकी रचनाओं को पाठकों तक पहुँचाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।–डा0 हेमन्त कुमार)    

                     (ग्रामीण परिवेश की बाल कहानी)

खण्डहर के शैतान----।

                  

                            गांव से बाहर एक बड़ा सा खंडहर था।खंडहर को देखने से लगता था कि कभी वहां बड़ा सा परिवार रहता होगा।मगर आज चरवाहे तक उसके पास जाने से डरते थे।दिन भर तो वहां सन्नाटा पसरा रहता था।मगर रात होते ही खंडहर में से तरह की आवाजें आने लगती थीं।कभी सीटी बजने की,कभी घंटियों की टिनटिन टुनटुन,कभी किटकिट कुटकुट जैसे दांतों से दांत रगड़े जा रहे हों।सुन कर ही गांव वाले सहम जाते।घर से बाहर निकलने तक का साहस न होता।

                    गांव के बड़े बूढ़े बताते हैं कि एक बार किसी बड़े मेले में पूरा परिवार गया हुआ था।अचानक वहां भगदड़ मच गई।हजारों लोग मारे गये।शायद वो लोग भी उस भगदड़ में कुचले गये।क्योंकि फ़िर कोई लौट कर नहीं आया।गांव के पुरनिया लोग बताते हैं कि इस तरह की अकाल मृत्यु में वे प्रेत या शैतान बन जाते हैं।वे ही लोग अब शैतान बन कर अब अपने इस खंडहर में रह रहे हैं।इस तरह की आवाजें निकाल कर वो लोगों को सावधान करते हैं---कोई उनकी शान्ति भंग करने के लिये खंडहर के निकट न आये।

          जब से ये शैतान उस खंडहर में आये गांव में एक अजीब बात  शुरू हो गयी।लोगों की रसोईं या कहीं और कुछ भी खाने का सामान रखा रहता वह रात में ही सफ़ाचट हो जाता।जबकि उनके घर में न ही कोई चूहा दिखता न ही बिल्ली।जब चूहे ही नहीं थे तो बिल्ली कहां से आती।लोग सोचते-क्या खण्डहर वाले शैतान ही आकर सब कुछ सफ़ाचट कर जाते हैं।कुछ लोग कहते—“भैया भूत,प्रेत या शैतानों को कहां भूख प्यास लगती है।”

       इधर लोग जितना ही परेशान थे उतना ही खण्डहर में रहने वाले मजे ले रहे थे।पूरे खण्डहर पर उनका साम्राज्य था।उनके राजा रानी थे,प्रजा थी,गुप्तचर थे,सेना के छापामार दस्ते थे।उनकी छापामार सेना रात होते ही भोजन की लूटपाट करने गांव में पहुंच जाती।खण्डहर से लेकर गांव तक में गुप्तचर फ़ैल जाते।कहीं कोई खतरा तो नहीं है।यहां खण्डहर में बचे लोग अपनी ड्यूटी में सक्रिय हो जाते। बाजार से चुरा कर लाई गई सीटियां और घण्टियां बजने लगतीं।

                      प्रशिक्षित लोग अपने दांतों से कुटकुट और किटकिट की ध्वनियां करने लगते।गांव वाले डर से सहम कर अपने घरों में दुबक जाते।इधर घरों में छापामार सैनिक पूरी ताकत से टूट पड़ते।देखते ही देखते जो भी मिला सफ़ाचट। लोग अपने बिस्तरों में ऐसे दुबके रहते कि किसी आहट पर भी बाहर निकल कर न देखते।स्वयं पेट भरने के बाद वे अपने साथियों के लिये भोजन पीठ पर भी लाद लेते। सबके खण्डहर में लौट आने के बाद सारी आवाजें भी बंद हो जातीं।

         अचानक एक दिन खण्डहर के पास से एक बारात गुजरी।शैतान मँडली छिप कर बाजे-गाजे और रोशनी का आनन्द उठाने लगी।एक शैतान कुछ ज्यादा ही फ़ितरती दिमाग का था।वह राजा से बोला—“राजा जी,तमाशा तो बड़ा अच्छा था।

      राजा सब जानता था।हंस कर बोला—“यह तमाशा नहीं,बारात थी।

      वह शैतान बोला—“क्यों न हम लोग भी एक दिन ऐसे ही बारात निकालें?

      अरे मूर्खों,अभी तक हम लोग दुनिया की नजर से यहां छिपे हुये हैं।हमने ऐसा किया तो दुनिया हमारे बारे में सब कुछ जान जायेगी।बाहर हमारे कम दुश्मन हैं?कुत्ते बिल्ली से लेकर इंसान तक हमारी जान के प्यासे रहते हैं।अपनी इस खण्डहर की दुनिया में चुपचाप पड़े रहो।खाओ,पिओ और मौज करो।राजा ने उन्हें समझाया।

        लेकिन कहा गया है कि विनाश काले विपरीत बुद्धि।कुछ शैतान अपनी सनक से बाज नहीं आए।बारात न सही,अपनी बस्ती को ही झंडी आदि से सजाया जा सकता है।उसके लिये जरूरत का सामान वे कुछ घरों में देख चुके थे।

         अगले दिन गांव के एक छात्र लाल चंद को स्कूल का अपना एक प्रोजेक्ट पूरा करने के लिये गोंद की जरूरत पड़ी।मगर पूरे घर में कहीं भी गोंद का पैकेट नहीं मिला।इसी तरह गोकुल की मेज पर से रंगीन कागजों की सारी सीट ही गायब थी। विशाल के पापा को सुतली की जरूरत पड़ी तो सुतली की पूरी लुंड़ी ही गायब थी। लाल चंद,गोकुल,विशाल अपने घरों के आसपास भी ढूंढ़ने लगे,अचानक उन्हें कुछ दूरी पर सुतली का कुछ हिस्सा दिखाई पड़ा।उसका एक सिरा खण्डहर की ओर गया हुआ था।वे लोग समझ नहीं पाए कि माजरा क्या है।

            दिन का वक्त होने से वे निडर होकर खण्डहर की ओर चल पड़े।यहां उन्होंने जो दृश्य देखा उसे देख वो दंग रह गये।सैकड़ों चूहे दौड़ दौड़ कर झंडी बनाने और टांगने में लगे हुये थे।तीनों ने फ़ौरन ही गांव वालों को ये खबर दी।गांव वालों ने भी आकर वह तमाशा देखा।वो समझ गये कि खण्डहर के शैतान और कोई नहीं ये चूहे ही थे।शैतानों की सारी पोल पट्टी खुल गई।

          देखते ही देखते लोग खण्डहर की सारी बिलों को खोदने लगे।उनमें उन्हें सीटियां और घंटियां भी मिल गयीं।चूहों की इस सूझ बूझ से सब चकित रह गये।

            कहते हैं कि अपना बसेरा छिन जाने पर तबसे चूहे इंसानों के घरों में ही रहने लगे। लेकिन अब वे खण्डहर के शैतानों से भी ज्यादा खुराफ़ाती हो गये थे। पहले वे केवल भोजन सामग्री से मतलब रखते थे,मगर अब तो वे घर की किताब कापियों से लेकर कपड़े लत्ते तक कुतरने लगे।लेकिन अब तो कुछ हो भी नहीं सकता था।उन्हें बेदखल करके खण्डहर को खेत बना दिया गया था।आखिर बेचारे जाते भी तो कहां।

    अब तो इंसानों के घरों में रहते हुये भी वे उनकी पकड़ से दूर उनके साथ आंख मिचौली खेलते हैं चूहेदानी को मुंह चिढ़ाते हैं।उन्हें मारने के लिये रखी गयी जहर की गोलियों से फ़ुटबाल खेलते हैं।उनकी तो हर तरफ़ से बल्ले बल्ले।

 राजा ने एक दिन उनसे मुस्कराकर पूछा,--- कहो भाइयों,कैसी कट रही है?

 पूरी दुनिया की शैतान मण्डली ने एक स्वर से चिल्ला कर कहा—“हिप हिप हुर्रे।

                                  000

 

लेखक-प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव

11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।31जुलाई2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन।शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम00।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।देश की प्रमुख स्थापित पत्र पत्रिकाओं सरस्वती,कल्पना, प्रसाद,ज्ञानोदय, साप्ताहिक हिन्दुस्तान,धर्मयुग,कहानी,नई कहानी, विशाल भारत,आदि में कहानियों,नाटकों,लेखों,तथा रेडियो नाटकों, रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।

     आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।बाल कहानियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र मृत्यु पर्यंत जारी रहा। 2012में नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया से बाल उपन्यासमौत के चंगुल में तथा 2018प्रकाशित।

 

 


शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

गांव की पुकार


गांव की पुकार

चल बापू
अब लौट चलें हम
फिर से अपने गांव।

बचपन की यदों की गठरी
खुलने को बेताब
सोंधी माटी दरवज्जे की
क्यूँ खोती अपनी ताब
महुआ टपक रहा सोने सा
पर खो गई उसकी आब।
चल बापू
अब लौट चलें हम
फिर से अपने गांव।


गिल्ली डंडा सीसो पाती
छुटपन के सब संगी साथी
बूढ़ी गैया व्याकुल नजरें
रास्ता रही निहार
खेतों में पसरा सन्नाटा
जैसे चढ़ा बुखार।
चल बापू
अब लौट चलें हम
फिर से अपने गांव।

नीम तले की चौरा माई
बरगद बाबा से अब तो बस
करती ये मनुहार
लौटा लो सारे बच्चों को
जो बसे समुंदर पार।
चल बापू
अब लौट चलें हम
फिर से अपने गांव।


गांव छोड़ते बखत तो तूने
आजी से बोला ही होगा
जल्दी ही आऊंगा वापस
पाती भी भेजा होगा
आजी की पथराई आंखें
तुझको रहीं पुकार
चल बापू
अब लौट चलें हम
फिर से अपने गांव।
00000
डॉ हेमन्त कुमार


शनिवार, 23 मई 2020

एक गिलहरी


एक गिलहरी
बड़े सबेरे मेरे आंगन
एक गिलहरी आती
किट किट कुट कुट
किट किट कुट कुट
अपने दांत बजाती।

उसी समय सारी गौरैया
चूं चूं करती आती
नहीं दिया क्यूं दाना पानी
फ़ुदक फ़ुदक सब गातीं।

झुंड कई चिड़ियों का भी
अपने संग वो लातीं
ढकले में पानी पड़ते ही
सब मिल खूब नहाती।

चावल के दाने मिलते ही
बड़े प्रेम से खातीं
शाम को फ़िर आयेंगे हम सब
कह कर के उड़ जातीं।
0000

डा0हेमन्त कुमार

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

गर्मी आई


(मेरा यह बालगीत अप्रैल 2004 में नेशनल बुक ट्रस्ट की पत्रिका "पाठक मंच बुलेटिन"में प्रकाशित हुआ था)
गर्मी आई


जाड़ा गया लो गर्मी आई,
बरफ मलाई संग ले आई।

दिन छोटे से बड़े हुए अब,
रातें  हो   गईं   छोटी,
बंदर जी ने सिल बट्टे पर,
ठंढाई      है    घोटी।

भालू  भी  क्यों  रहता पीछे,
उसने     ली     अंगड़ाई,
झट  से पहुंचा  नदी  किनारे,
डुबकी    एक      लगाई।

 घोड़े को जब कुछ ना सूझा
उसने  दौड़  लगाई
गधे ने अपने पैर पटक कर
ढेरों  धूल  उडाई।

 जाड़ा  गया  लो  गर्मी आई,
बरफ   मलाई  संग ले आई।
00000
डा0हेमन्त कुमार



मंगलवार, 10 मार्च 2020

बाल कहानी--गुड़िया का उपहार


आज प्रतिष्ठित कहानीकार,रेडियो नाट्य लेखक,बाल साहित्यकार, मेरे पिताजी आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी का 91वां जन्म दिवस है।उन्होंने प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य,रेडियो नाटकों के साथ ही साहित्य की मुख्यधारा में बड़ों के लिए भी 300 से ज्यादा कहानियां लिखी हैं जो अपने समय की प्रतिष्ठित पात्र-पत्रिकाओं—सरस्वती,कल्पना,ज्ञानोदय, कहानी,नई कहानी,प्रसाद आदि में प्रकाशित हुयी थीं।पिता जी को स्मरण करते हुए आज मैं यहाँ उनकी एक बाल कहानी “गुडिया का उपहार”कहानी बाल पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहा हूं।       


गुड़िया का उपहार
          प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव

          नाम तो था उसका गौरी।लेकिन मां पापा कभी कभी प्यार से उसे गुड़िया भी बुला बैठते।धीरे धीरे उसका यही नाम अधिक चलन में आ गया।
          गुड़िया हमेशा अपनी कक्षा में प्रथम आती।उसकी उम्र थी केवल दस बारह साल।मगर भगवान ने उसे बुद्धि के साथ गजब की सुन्दरता भी प्रदान की थी।उसकी इन बातों की चर्चा गांव के बाहर तक फ़ैल चुकी थी।मां पापा को भी गर्व थाभगवान चाहेगा तो गुड़िया की शादी किसी अच्छे घर में होगी।
       लेकिन गुड़िया को सपने में भी नहीं विश्वास था कि उसकी आगे पढ़ने की इच्छाएं बीच में ही उसका साथ छोड़ने लगेंगी।अपनी पढ़ाई के बल पर वह इंजीनियर, डाक्टर या कोई अफ़सर बनकर अपने मां पापा का नाम रोशन करेगी।ब्याह भी करेगी लेकिन उसका सही वक्त आने पर।एक दस बारह साल की लड़की इतना तो सोच ही सकती थी।
      उस दिन वह कुछ पूछने मां के पास जा रही थी।अचानक उसके कानों में अपनी मां और पापा के कुछ बातें करने की भनक पड़ी।बात ही कुछ ऐसी थी कि गुड़िया के पांव अपनी जगह ठिठक गये।
    मां पापा से कह रही थी—“पड़ोस के एक बड़े परिवार से गुड़िया के विवाह का प्रस्ताव आया है।वो पढ़ाई से ज्यादा उसकी सुन्दरता पर मुग्ध हैं।
    पर गौरी की मां,इतनी कच्ची उम्र में तुमने उसकी शादी की बात सोची भी कैसे?गुड़िया जैसी तेज लड़की की पढ़ाई का क्या होगा?उसके सामने एक सुन्दर भविष्य है।वह इसका विरोध भी तो कर सकती है।पापा बोले।
    देखो जी,लड़कियों की पढ़ाई से ज्यादा उसका रूप गुण होता है।हमारी सीधी सादी गुड़िया।उसमें विरोध करने का साहस क्या आएगा।सोच लो,फ़िर इतने बड़े परिवार से आगे रिश्ता मिले,ना मिले।मां बोली।
    यह सब ठीक है।पर तुम्हारी बात मेरे गले से नीचे नहीं उतर रही है।मुझे सोचने का मौका दो।मैं तो उसके एक खूब सुखद भविष्य का सपना लिये बैठा हूं।
    तुम्हारी तो यह पुरानी आदत है।हर अच्छी बात के लिये तुम्हें सोचने का मौका चाहिये।सोचते रहो।कह कर झल्लाते हुए मां उठ खड़ी हुई।गुड़िया भी जल्दी से दूसरी ओर खिसक गयी।
      गुड़िया के मन में उथल पुथल मच गई।अगर उसके पापा भी मां की बात मान गये तो क्या होगा उसके कल का।अन्त में उसके मन में एक विचार अया।
        वह सीधे मां के पास जाकर बोली-“मां,हर मां बाप अपने बच्चों के लिये अच्छा ही सोचते हैं।
          मां प्रसन्नता से बोली- तू सच कह रही है गुड़िया।मेरी बिटिया रानी कितना अच्छा सोचती है।
          तब मां तुम भी मेरी एक बात मान लो।दो साल बाद ही तो मैं हाई स्कूल कर लूंगी।इसके लिये तुम बस दो साल का समय मांग लो वो जरूर मान जायेंगे।
   मां को भी गुड़िया की बात सही लगी।वह कम से कम हाई स्कूल तो कर ही ले।बाद में कहां पढ़ाई होती है।और इस तरह उन्होंने गुड़िया की बात मान ली।
  गुड़िया मां से लिपट गई।यही तो वह चाहती थी।दो साल बहुत होते हैं।वह अवश्य इस बीच कोई योजना बना लेगी।
  गुड़िया पूरी लगन और मेहनत से पढ़ाई में जुट गयी।टीचरों से भी उसे भरपूर सहयोग मिलने लगा।हाई स्कूल की परिक्षा भी गुड़िया ने बड़े उत्साह से दी।
  कुछ ही समय बाद हाई स्कूल परीक्षा का परिणाम निकला।गुड़िया बोर्ड की परिक्षा   
की मेरिट लिस्ट में थी।वह भी अच्छे रैंक से।मां पापा फ़ूले नहीं समाये।
    पापा ने मुस्कराते हुये मां से पूछा--अब गुड़िया की आगे की पढ़ाई के बारे में क्या सोचती हो?
  यह सब देख मां का मन भी बदल रहा था।अब वह भी ऐसी होनहार गुड़िया के साथ अन्याय नहीं करना चाहती थी।मगर वो चिंता से बोली- गुड़िया की आगे की सारी पढ़ाई तो शहर में होगी।हम उसका खर्च कैसे उठा पायेंगे।
       इसी सोच विचार में दो तीन दिन बीत गये।तीसरे दिन गुड़िया के स्कूल का चपरासी एक लिफ़ाफ़ा ले कर आया।पापा ने उसे खोलकर पत्र पढ़ा।वह शहर के सबसे बड़े कालेज के प्रिंसिपल का था।उन्होंने गौरी को लिखा था-गौरी तुम हमारे कालेज में पढ़ना चाहोगी तो तुम्हारा स्वागत है।हमारे यहां डिग्री क्लास तक पढ़ाई होती है। हास्टल भी है।हास्टल में रहने खाने और कालेज की पढ़ाई का पूरा खर्च हम उठाएंगे।
मां और पापा की खुशी का ठिकाना न रहा।लेकिन मां ने शंका जतायी-इतने बड़े शहर में हमारी गुड़िया रहेगी कहां?
  पापा खिलखिला कर हंस पड़े और बोले-तुम रहती किस युग में हो?आजकल तो लड़कियां सेना में भर्ती हो रही हैं।वायु सेना में सारा आकाश छान रही हैं।हास्टल में सैकड़ों लड़कियां उसकी दोस्त होंगी। वह कालेज की हजारों लड़कियों के बीच पढ़ेगी।
    गुड़िया बोली-याद है न।मैंने कहा था—एक दिन मैं तुम लोगों के लिये ऐसा उपहार लेकर आऊंगी कि तुम्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होगा।
और पापा गुड़िया का दाखिला उसी कालेज में करा आये।
   गुड़िया ने वहां भी अपने टैलेण्ट का जलवा बिखेरना शुरू कर दिया।जिसकी भी जबान पर देखो बस गुड़िया का नाम।उसने यहां भी इण्टर सम्मान के साथ पास किया।तब एक दिन प्रिंसपल ने गुड़िया को बुला कर पूछा-आगे के लिये तुम्हारा क्या विचार है?
  गुड़िया तुरन्त बोली-मैडम मैं तो पुलिस या सेना की नौकरी में जाना पसंद करूंगी।देश और समाज की सुरक्षा वाला कोई जाब।मगर मेरी मां के कानों तक यह बात न पहुंचे। नहीं तो वो मुझे इसकी इजाजत कभी भी नहीं देंगी।पापा का मुझे कोई डर नहीं है।
     प्रिंसिपल के मुंह से फ़ौरन निकला- शाबाश गुड़िया मैं तुम्हारे फ़ैसले से बहुत खुश हूं लेकिन उसके लिये  पहले तुम बी00 कर लो।
जहां चाह वहां राह।गुड़िया बी00 के बाद ही पुलिस अधिकारी की ट्रेनिंग के लिये चुन ली गई।
   एक दिन पुलिस की एक जीप गुड़िया के दरवाजे पर आकर रुकी।पूरे गांव में खबर फ़ैलते देर नहीं लगी।मास्टर जी,गुड़िया के पापा के दरवाजे पर पुलिस--मगर क्यों?सारा गांव देखने के लिये उमड़ पड़ा।तभी गुड़िया की मां घबरायी हुयी बाहर निकली।पापा तो सब जानते थे तभी मुस्करा रहे थे।
        मां बोली-तुम्हें मुस्कराने की सूझ रही है।पुलिस की गाड़ी देख कर मेरी तो जान सूखी जा रही है।
   तभी पुलिस अधिकारी की चमचमाती हुयी वर्दी में एक महिला जीप से नीचे उतरी।जब उसने आगे बढ़ कर उनके पांव छुए तब उन्होंने पहचाना—अरे यह तो अपनी गुड़िया है।उन्होंने उसे गले से लगा लिया।
गुड़िया बोली— मां मैंने तुमसे वादा किया था न कि तुम लोगों के लिये एक सुन्दर सा उपहार लेकर आऊंगी।क्यों पसन्द आया? 
   मां और पापा के ही नहीं पूरे गांव की आंखों में प्रसन्नता के आंसू आ गये।सभी को गर्व था—उनकी बेटी ने वह कर दिखाया जो अभी तक गांव की किसी बेटी ने नहीं किया।
  तभी गुड़िया  लौटने को हुयी और मां से बोली— अभी मैं ट्रेनिंग में हूं मां।कहीं भी ज्वाइन करने से पहले तुम लोगों के पास रहने आऊंगी।अभी तो मुझे यह सरप्राइज उपहार देना था।
    धूल उड़ाती जीप निकल गयी तब मां को एहसास हुआ—भगवान ने उन्हें अपनी गुड़िया के साथ अन्याय करने से बचा लिया।शायद यही उपहार पाने के लिये।
          0000

   
लेखक-प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
11 मार्च, 1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म। 31 जुलाई 2016  को लखनऊ में आकस्मि निधन।शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम00।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।देश की प्रमुख स्थापित पत्र पत्रिकाओं सरस्वती,कल्पना, प्रसाद,ज्ञानोदय, साप्ताहिक हिन्दुस्तान,धर्मयुग,कहानी, नई कहानी, विशाल भारत,आदि में कहानियों,नाटकों,लेखों,तथा रेडियो नाटकों, रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।
     आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।बाल कहानियों, नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।2012में नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया से बाल उपन्यासमौत के चंगुल में तथा 2018 में बाल नाटकों का संग्रह एक तमाशा ऐसा भी” प्रकाशित। इसके पूर्व कई प्रतिष्ठित प्रकशन संस्थानों से प्रकाशित वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इलाहाबाद उत्तर प्रदेश के शिक्षा प्रसार विभाग में नौकरी के दौरान ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस-पास शुरू हुआ लेखन का यह क्रम जीवन पर्यंत जारी रहा