गुरुवार, 22 जून 2017

खुशियों का गाँव(बाल नाटक)


दृश्य 2
  (मंच पर पार्क का दृश्य।शाम का झुटपुटा।एक कोने में लड़का-1,लड़का-2,लड़की-1और कुछ दूसरे  बच्चे खेलते दिखाई पड़ रहे हैं।कुछ बड़े लोग एक किनारे खड़े कसरत कर रहे।पार्क के एक तरफ से काली,रामू ,दीनू,मल्लिका और सलमा आते हैं।सब खेल रहे बच्चों के पास जाकर कुछ देर उनका खेल देखते रहते हैं।फिर आगे बढ़ कर उनसे बात करते हैं।)
सलमा: सुनो सुनो—क्या तुम लोग हम सब को भी अपने साथ खिलाओगे?
लड़का-1:  नहीं नहीं कभी नहीं।
लड़की-1: नहीं नहीं कभी नहीं
        कभी नहीं,कभी नहीं।
काली: लेकिन क्यूँ?
दीनू: क्या हम तुम्हारा नुकसान करेंगे?
लड़का-1: मैंने तो ऐसा नहीं कहा।
मल्लिका: फिर हमें अपना दोस्त बना कर साथ खिलाने में क्या हर्जा है?
लड़की-1: हम तुम्हें नहीं खिला सकते बस।
लड़का-2: हम तुम्हें अपना साथी नहीं बना सकते बस।
रामू: कोई तो कारण होगा ।
लड़का-1: कारण है पर बताऊंगा नहीं।
रामू: बताना तो पड़ेगा।
मल्लिका: (कुछ सोचकर)तुम्हे क्या लगता है हमें खेलना नहीं आता?
लड़की-1: आता होगा उससे हमें क्या?
रामू: (मुस्कराकर) तुम्हें क्या हम चिता भालू शेर लग रहे?
लड़का-1: (गुस्से में)देखो ज्यादा स्मार्ट मत बनो जब बोल दिया नहीं खिलाना तो नहीं
       खिलाना।
काली: (कुछ सोच कर) क्या हम अच्छे बच्चे नहीं?
(लड़का एक गुस्से में अपने बैट को हाथ में घुमाता हुआ इन सब बच्चों  को घूरता है)
रामू: आखिर कोई तो वजह होगी भाई हमें न खिलाने की।
लड़का-1: (गुस्से में चीख कर)हाँ वजह है---बहुत बड़ी वजह है... ।
मल्लिका: तो वो वजह हमें भी तो बताओ न।
लड़का-1: बता दूँ?
काली: हाँ बता दो।
लड़का-1: (व्यंग्यात्मक मुद्रा में) बुरा तो नहीं मानोगे?
रामू: नहीं,बिलकुल नहीं।
लड़का-2: (थोडा तेज स्वर में)तो सुनो ---हम लोग रहते बिल्डिंगों में,तुम लोग झुग्गी झोपडी वाले।
        (रामू,काली,मल्लिका सब उन बच्चों को आश्चर्य से देखते हैं।और डर कर
        एक दूसरे का हाथ पकड़ लेते हैं।)
लड़की-1: तुम सब पढ़ते हो नगर निगम के सड़े से स्कूल में,और हम सब जाते है कान्वेंट स्कूल में।
       (खेलने वाले सारे बच्चे उनके चारों और घुमने लगते हैं और रामू,काली
      ,मल्लिका सब सिमटने लगते हैं)
लड़का-1: हमारे माँ-बाप के पास है पैसा ---खूब ढेर सारा...इतना सारा इतना सारा कि
       तुम सोच भी नहीं सकते,और तुम सब कंगाल हो निरा कंगाल।
लड़का-२: हम सबके पास खेलने के लिए ढेरों खिलौने,तुम्हारे पास टूटे फूटे बर्तन।
लड़की-1: हमारे कपडे देखो साफ़ साफ़ सुन्दर सुन्दर,तुम्हारे कपडे गंदे चिथड़े।
       (रामू अपने साथियों के साथ और सिकुड़ता जाता है)
लड़का-1: हमारे माँ बाप मालिक हैं,तुम्हारेमाँ बाप हमारे चाकर।
लड़का-2: हमारे पास है ढेरों खुशियाँ,तुम्हारे पास सिर्फ भूख गरीबी ।
लड़का-1: (चीख कर) इसीलिए हम कह रहे हम तुम्हें नहीं खिलाएंगे अपने साथ ---तुम सब चले जाओ  चले जाओ यहाँ से—जाओ जाकर खेलो अपनी गन्दी बस्तियों में ---।
      (दोनों लड़के और लड़की-1 ताली बजाते हुए रामू दीना सलमा के चारों और
      घूमने लगते हैं)
तीनों बच्चे: (गाते हैं)
            हम सब बच्चे बिल्डिंग वाले
            तुम सब झोपड़ पट्टी वाले
            हमारे कपडे अच्छे अच्छे
            तुम सब पहने गंदे वाले
            हमारे पास तो ढेरों खुशियाँ
            तुम्हारे पास दुखों के नाले।
      (उनके गीत का स्वर और तालियाँ तेज होती जाती हैं।सलमा,रामू,कालू सिकुड़ते
      जाते हैं अचानक काली उनके घेरे से बाहर निकलता है अपने दोनों हाथो से
      कानों को बंद करके दर्शकों की तरफ मुंह करके बहुत तेजी से चीखता है)
काली: बस बस --- बंद करो अपनी ये बकवास-----।
      (काली वहीँ अपना माथा पकड़ कर बैठ जाता है।रामू,सलमा सब उसके पास भाग कर आते हैं।बच्चे उसे घेरकर खड़े होते हैं ...सब स्थिर हो जाते हैं।दृश्य फेड आउट होता है।)
                  (क्रमशः)
डा०हेमन्त कुमार   

मंगलवार, 20 जून 2017

खुशियों का गाँव

(मेरे नए बाल नाटक खुशियों का गांव का पहला दृश्य)
खुशियों का गाँव
(बाल नाटक)
०डा०हेमन्त कुमार

                                                                      


पात्र: 1-काली (गरीब बच्चा)-12 साल
        2-रामू(गरीब बच्चा)--11 साल
    3-दीनू (गरीब बच्चा)—11 साल
    4-मल्लिका(मल्लू)-11 साल
    5-सलमा-(सल्लू)-10 साल
    6-लड़का एक-(अमीर बच्चा)-12 साल
    7-लड़का दो–(आमिर बच्चा)-10 साल
    8-लड़की एक–(अमीर बच्ची)-12 साल
    9-भूत राजा-75-80 साल
    10-परी-20 साल
    कुछ अन्य बच्चे एवं बड़े  लोग ।

(दृश्य -1
(संगीत  के साथ ही मंच पर प्रकाश होता है।मंच पर एक तरफ से मल्लिका, सलमा, लड़की एक और दूसरी तरफ से काली,रामू,दीनू,लड़का एक और लड़का दो  नाचते हुए आते हैं।सब बच्चे एक बार नाचते हुए पूरे  मंच का चक्कर लगते हैं फिर बीच में एक लाइन में खड़े हो जाते हैं।लड़का एक और लड़की एक आगे बढ़ते हैं और गाते हैं ।)

लड़की–1     सुबह पढाई शाम पढाई
             दोपहर रात भी करो पढाई
            समय न हमको जरा भी मिलता
            खेल कूद कब करेंगे भाई।
                     हम बच्चों पर आफत आई।
लड़का—1:     खेल कूद कब करेंगे भाई।
            हम बच्चों पर आफत आई।
(लड़की एक और लड़का दो भी आगे बढ़ते हैं और गाते हैं।)
लड़का-2:   मम्मी पापा हरदम टोकें
          किताब उठा लो करो पढाई
          पीठ पे बोझा बढ़ता जाता
          ये कैसा जीवन है भाई।
लड़की–1 :   खेल कूद कब करेंगे भाई।
           हम बच्चों पर आफत आई।
(दीनू और मल्लिका भी आगे बढ़ कर खड़े होते हैं और गाते हैं। )
मल्लिका : घर पे मम्मी पापा डाटें
         खो गया अपना छुपम छुपाई
         गुरु जी स्कूल में छड़ी पटकते
         सबकी करते कान खिंचाई।
दीनू    : खेल कूद कब करेंगे भाई।
         हम बच्चों पर आफत आई।
(सारे बच्चे एक दूसरे का हाथ मजबूती से पकड़ कर मंच के आगे खड़े हो जाते हैं और दर्शकों को देखते हैं।सलमा फिर गाती है। )
सलमा : उपदेशों के मकड़जाल में
        फंस गया अपना बचपन भाई
        भोलापन चेहरों से गायब
        किसी को चिंता है क्या भाई।
(सारे बच्चे दर्शकों से प्रश्न पूछने की मुद्रा में हाथ हिला कर गाते हैं।)
सभी बच्चे : भोलापन चेहरों से गायब
           किसी को चिंता है क्या भाई।
           सुबह पढाई शाम पढाई
            खेल कूद कब करेंगे भाई।
            हम बच्चों पर आफत आई।

(सारे बच्चे तेजी से गाते हुए मंच पर चारों और घूमते हैं।गाने के साथ ही उनके नाचने की भी गति बढती जाती है।अंत में संगीत एक झटके से रुक जाता है बच्चे अपनी अपनी जगहों पर उसी मुद्रा में फ्रीज हो जाते हैं।दृश्य परिवर्तन।)

मंगलवार, 23 मई 2017

हमारा कालू

       ("हमारा कालू" कहानी पिता जी श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी ने निधन के लगभग दो माह पहले ही लिखी थी।)  
         
यही हैं अपने कालू जी 
अखबार उठाने के लिए पापा ने दरवाजा खोला मगर चौंक उठे।अखबार के पास एक कुत्ता खड़ा था।दुम हिलाता,आंखें मटकाता हुआ। रंग?उसकी तो बात ही मत पूछो।जैसे अभी-अभी काली बूट-पालिश से चमकाया गया हो।
     पापा चिल्लाए जल्दी से बाहर आओ।पता नहीं कहां से एक आवारा कुत्ता भटक कर आ गया है।हम सब वाइपर लेकर उसे भगाने दौड़े।देखा-- वह पापा की ओर देख कर आंखे मटका रहा था।जैसे कहना चाह रहा हो।आवारा तो मत कहो यार।हां,घुमन्तू जरूर कह सकते हो।इस घर से तो मेरा पुराना याराना है।मैं अब कुछ दिन यहां बिताने आया हूं।मगर तुम सब तो छड़ी लेकर मेरा स्वागत करने आ गये।
              पहले तो उसे डांटा-डपटा गया।उसका उस पर कोई असर नहीं हुआ।तब पापा ने वाइपर उठाया।उसने आंखे मटकायी।पापा बोले बड़ा ढीठ है।और पापा ने वाइपर लेकर उसे दौड़ाया।वह भागा जरूर मगर पीछे मुड़ कर देखता भी जाता था।मटकती आंखें कह रहीं थीं--अब बस भी करो यार।मुझे यह सब बिल्कुल पसंद नही है।
   मगर पापा ने उसे भागा कर ही दम लिया।सब ने संतोष की सांस ली।पर पापा हांफ़ रहे थे।
      घंटे भर बाद दूध वाले ने आवाज दी।दरवाजा खोला गया तो सब भौंचक्क रह गये।वह फ़िर आ गया था।इस बार आराम से लेटा दुम हिला रहा था।आंखें मटका कर जैसे कह रहा हो----कैसी रही।
पापा फ़िर चिल्लाए—“यह कालू राम बिना कुछ लिये जाने वाला नहीं है।दे दो इसे एकाध रोटी का टुकड़ा।
पापा आप इसे कालू क्यों कह रहें हैं?हम सब ने पूछा।
पापा गुस्से से बोले---तब क्या सफ़ेद कहूं?ला कर पोत दो इसे चूना।
      बहरहाल आगे का किस्सा मजेदार रहा।वह भगा दिया जाता घंटे भर बाद  फ़िर लौट आता।जाने और लौटने का क्रम जारी रहा।एक दिन ऐसा भी आया कि कालू राम जम ही गया हमारे दरवाजे पर।उसे खाने के लिये कुछ ना कुछ दे ही देते।भारतीय संस्कृति में मेहमान को  भूखा रखने का रिवाज नहीं है जो।
    फ़िर सबने सोचा कि जैसे आया है वैसे चला भी जायेगा।मगर ऐसा हुआ नहीं।लाट साहब आराम से खाते रहे।आंखें मटक-मटका कर हम सब को चिढ़ाते भी रहे।अब इस खेल में दोनों को मजा आ रहा था।
     
गुस्से में कालू जी 

 धीरे-धीरे हमने उसे कुछ खेल भी सिखाने शुरू कर दिये।फ़ेंकी हुई गेंद को उठा कर ले आना।इसी तरह लकड़ी के खिलौने आदि भी।वह समझ गया,मुंह में दबा कर ले आता।
  हां,वह अपनी सीमा रेखा भी पहचान गया।
 दरवाजे से बाहर।उसके लिये एक फ़टा पावदान बिछा दिया गया।खाने के लिए अलमुनियम का प्लेट।वैसे ही पानी का बर्तन।अब क्या चाहिए था।कभीकभी पापा से छिपाकर दो-एक बिस्कुट भी।
     इस बीच शहर से बाहर हमारे एक रिश्तेदार के यहां शादी भी पड़ गई।सभी को जाना था।अब सवाल यह उठा----कालू का क्या किया जाए। साथ ले नहीं जा सकते थे।इधर एक आवारा कुत्ते की जिम्मेदारी भी कौन पड़ोसी उठाता?
कुछ नहीं।इसके लिए दो-चार दिन का खाना छोड़ देते हैं।पापा ने कहा।
भला इतने से कालू का पेट भरेगा?हमने पूछा।
तब क्या हम लोगों ने इसके खानेपीने का ठेका ले रखा है?जैसे इधरउधर से अब तक पेट भरता रहा,वैसे ही काम चला लेगा।पापा बोले।
 पापामम्मी के डर से हम लोग चुप लगा गए।जाने के दिन स्टेशन के लिए एक टैक्सी मंगा ली गई।देर  हो रही थी।ट्रेन का टाइम भी हो गया था।हम लोग हड़बड़ी में टैक्सी में बैठ गए।
तभी कालू का ध्यान  टैक्सी से नीचे कुछ गिरने पर गया।रूमाल में बंधी एक पोटली। कालू समझ गया।उसने पोटली को मुंह में दबाया फ़िर टैक्सी के पीछे भागा।मगर टैक्सी कुछ ही पलों में उसकी आंखो से ओझल हो गई।कालू फ़िर भी उसी दिशा में दौड़ता रहा।
  ट्रेन प्लेटफ़ार्म नंबर दो पर आ रही थी।हम ओवर ब्रिज से होकर वहां पहुंच गए।अचानक हम लोगों की नजर प्लेटफ़ार्म एक पर गई।
 वहां कालू मुंह में पोटली दबाए इधर से उधर भाग रहा था।जरूर हम लोगों की तलाश में।मम्मी ने पहचान लिया।उनकी जरूरी दवाएं थीं उसमें। जाने की हड़बड़ी में वह दरवाजे पर टैक्सी से नीचे गिर गई होगी।मगर हममें से कोई नहीं चाहता था कि कालू उसे अपनी मौत की कीमत पर यहां पहुंचाए।
 तभी उसकी नज़र हम लोगों पर पड़ी।मौत सिर पर थी।हम लोगों ने हाथ के इशारे से उसे उधर ही रहने के लिए कहा।इधर ना आने के लिए चिल्लाए भी।मगर कालू कुछ समझ नहीं पाया।वह प्लेट फ़ार्म से नीचे  कूद कर अपनी मौत के मुंह में कूद पड़ा।
       ट्रेन से उसका कटना तय था।एक बार तो लगा कि वह बच जाएगा।वह इंजन के आगे से इस पार निकल आया प्लेटफ़ार्म पर पैर जमाने की कोशिश की।पर वे जम नहीं पाए।हमने उसके मुंह से पोटली तो ले ली।मगर उसे ऊपर नहीं खींच सके।वहां ट्रेन का पड़ाव बहुत कम था।इस लिए हमें सीट पर जाने की जल्दी थी।मगर डिब्बे में घुसते-घुसते यह जरूर देखा --कालू प्लेटफ़ार्म पर चढ नहीं पाया था।फ़िसल कर नीचे जा गिरा।
    वह थक चुका था।घबराया भी।हम लोग आगे की कल्पना से ही सिहर उठे।जैसे तैसे हम अपने रिश्तेदार के यहां पहुंचे।वहां शादी का माहौल था।पर हम उस जश्न को नहीं मना पाए।सबका मन बुझा-बुझा सा था।बार-बार उस आवारा कुत्ते का चेहरा सामने आ खड़ा होता।जिसका नाम कालू था और जिसने हमारे लिए अपनी जान दे दी।
   
चौथे दिन घर पहुंच रहे थे।यह सोच कर ही अजीब लग रहा था कि कालू के बिना घर कैसा लगेगा।मगर चमत्कार हो गया।टैक्सी की आवाज सुनते ही दरवाजे पर बैठा कालू हम लोगों की तरफ़ दौड़ पड़ा।मौत को धता बता कर घर पहुंच जाने वाला कालू।खुशी के मारे सबके पैर सूंघ रहा था।
     पापा को देख कर उसने आंखे मटकाईं----देखो यार,अब मुझे परेशान ना करना।मुझे यह सब बिल्कुल पसंद नहीं है।
     पापा की आंखों में आंसू आ गए।एक आवारा कुत्ते की सूझ-बूझ और वफ़ादारी के जज्बे से उन्होंने उसे सलाम किया।हमारी आंखें भी छल-छला आयीं।
000

लेखक--
प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।31जुलाई 2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन। शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम0ए0।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन मे संलग्न।देश की प्रमुख स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।
          नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित बाल उपन्यास "मौत के चंगुल में " के साथ ही बाल कहानियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र 87 वर्ष की उम्र तक निर्बाध चला।बाल नाटकों का एक संग्रह नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशनाधीन

गुरुवार, 18 मई 2017

कहां खो गए गीत

बांसों के झुरमुट से वंशी,
झरनों का कलकल संगीत,
सूना जंगल पूछे हमसे,
कहां खो गए मेरे गीत।

धरती पर से घटता क्यूं जल,
दूर दूर ना दिखते बादल,
बारिश भी तो पूछे हमसे,
कहां खो गए मेरे गीत।

कंकरीट के जंगल बीच,
गौरैया की सूनी आंखें,
पाखी सारे पूछ रहे हैं,
कहां खो गए मेरे गीत।

सूनी घाटी सूने पर्वत,
पूछ रहे पेड़ों के ठूंठ,
क्या गलती कर दी थी हमने,
कहां खो गए सबके गीत।
000000


डा0हेमन्तकुमार

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

बच्चों की लाटरी----।

बंद हुए स्कूल सभी जब
बच्चों की लग गयी लाटरी
कोई छत पर पतंग उड़ाता
कथा कहानी किसी को प्यारी।

कुछ बच्चों ने बना ली टोली
बांध खिलौने उठा ली गठरी
जिनको गाने लगते प्यारे
कर दिया शुरू अन्त्याक्षरी।


गुड्डे गुड़िया ब्याह रचाने
निकली गांव की बिटिया सारी
जो बच्चे रह गये थे पीछे
दौड़ पड़े ले साइकिल प्यारी।

जिनके पास नहीं थी किताबें
नहीं थे खेल खिलौने न्यारे
एक कतार में खड़े हुये सब
टेशन से छूटी रेलगाड़ी।
000

डा0हेमन्त कुमार

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

शाबाश तन्मय

शाबाश तन्मय
                                                      लेखक-प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव
      
        तन्मय हर तरह से एक अच्छा लड़का था।पढ़ाई-लिखाई मे तेज।स्कूल से आते ही अपने  जूते-मोजे,स्कूल ड्रेस सब ठीक से रख देता।स्कूल का होम वर्क रोज़-रोज़ का रोज़ पूरा करता।फ़िर मम्मी-पापा के कामों में हाथ बटाता।
    यह सब ठीक था।पर मम्मी उसकी एक आदत को एकदम।नापसन्द करती थीं।अभी उस दिन एक घायल गिलहरी को उठा लाया।शायद दौड़ भाग मे पेड़ से गिर कर घायल हो गई थी।मम्मी के बिगड़ने पर बोला--आप परेशान मत हो। ऐसे ही छोड़ देता तो कुत्ता बिल्ली कोई भी इसे खा जाता।अभी डाक्टर अंकल से इसे दवा लगवा कर आता हूं।ठीक होते ही इसे फ़ुदकने के लिये छोड़ दूंगा।
                  इस तरह कभी चोटिल गौरेया को तो कभी घोंसले से गिरा कोयल का बच्चा।सबका इलाज करते थे डाक्टर अंकल।वे एक पशु चिकित्सालय मे डाक्टर थे।तन्मय के इस काम से उन्हें बड़ी खुशी मिलती थी।वो कहते-बेटा,जीव जन्तुओं के प्रति तुम्हारा यह प्रेम औरों के लिये भी आदर्श बनेगा।
       बेचारे पापा मम्मी का मान रखने के लिये उनकी हाँ में हां मिलाते रहते थे।वरना वे समझते थे,तन्मय एक बड़ा ही नेक काम कर रहा है।
        मगर कल तो गज़ब हो गया।तन्मय सड़क पर आवारा घूमते एक छोटे से पिल्ले को उठा लाया।देखते ही मम्मी गुस्से से आग बबूला होकर बोली-अब तेरी यह आदत तो हद पार कर रही है।देखो तो कितना गँदा पिल्ला उठा लाया।
       
मम्मी जी आप चिन्ता ना करें।मैं इसे अभी नहलाता हूं।इसे बाहर जाकर पोटी भी करना सिखा दूंगा और हां मम्मी,अब यह कुत्ते का पिल्ला नहीं,मूलन्द है।आपको कैसा लगा यह  नाम? तन्मय मुस्कुरा कर बोला।
       मूलचंद के नाना,इसका नाम मूलचन्द रक्खो या फूलचन्द।मगर इसे उठा लाने की क्याजरूरत थी।यह तो मुझे अन्धा भी दिखाई दे रहा है।मम्मी और भी गुस्सा होकर बोलीं।
जानता हूं मम्मी जी।इसीलिए तो इसे और भी उठा लाया। इधर से उधर भटक रहा था बेचारा।अगर मैं न ले आता तो जरूर किसी गाड़ी के नीचे आकर मर जाता।
      ठीक है। शाम को तेरे पापा आएँगे तो वो ही तेरी खबर लेंगे।यह कह कर मम्मी अपने काम मेँ लग गईं।
   पापा ने शाम को आफ़िस से आते ही शिकायत सुनी।उन्होंने भी गुस्से से आंखें लाल पीली कीं।एक आंख दबा कर तन्मय की ओर देखा।फ़िर छ्डी लेकर उसके पीछे दौड़े।अब आलम यह था कि आगे -–आगे तन्मय  पीछे मूल्चन्द  और उसके भी पीछे छड़ी लिए पापा आंगन मेँ दौड़ लगा रहे थे।मम्मी यह सब देख कर संतुष्ट।फ़िर बोलीँ---जाने दो मारना मत।पापा और तन्मय मम्मी के मुंह से यही तो सुनना चाहते थे।इस बार तन्मय ने पापा को एक आंख दबा कर देखा और मुस्कुरा दिया।
      अब तो घर में मूलचन्द के मजे ही मजे थे।तन्मय के हाथोँ स्नान,उसी के पास दौड़ कर खाना।बड़ा अच्छा लग रहा था उसे यहां आकर।
            एक दिन तन्मय को अचानक खयाल आया—मूलचंद कभी भूल से भी घर के बाहर निकल गया तो ना जाने क्या गुजरे।सबसे बढ़ कर आवारा कुत्तों को पकड़ने वाली गाड़ी ही उसे पकड़ कर ले जा सकती है।अच्छा हो कि उसके गले के लिये एक पट्टा खरीद लूं।पट्टे वाले कुत्तों को लोग जानते हैं कि यह पालतू है।एक छोटी सी चेन भी।मगर मम्मी पापा इसके लिये पैसे क्यों देंगे?फ़िर भी पास वाले किराना स्टोर वाले अंकल के यहां देख तो लिया ही जाय।
        वह किराना स्टोर पहुंच गया।पीछे पीछे मूलचंद।अंकल उसे पहचानते थे।देखते ही बोले—अरे तन्मय तुम यहां?साथ में यह पिल्ला भी?
      हां,अंकल,मूलचंद अंधा है।मगर सूंघकर और आहट से बहुत कुछ जान जाता है।मैं इसे घर ले आया नहीं तो किसी दिन किसी गाड़ी से दब कर मर ही जाता।
यह तो तुमने बड़ा शाबाशी का काम किया बेटे।क्या कुछ चाहिये?
    क्या इसके गले के नाप का पट्टा होगा?
    हां,क्यों नहीं होगा?
    और एक चेन भी।
   हां वह भी मिल जायेगी।क्या निकालूं?अंकल ने पूछा।
   नहीं अंकल। अभी चुकाने के लिये मेरे पास पैसे नहीं हैं।
   चलो,इसके बदले में देने के लिये तुम्हारे पास क्या कुछ है?
    अंकल,मेरे पास तो बस ये एक लाल रंग का कंचा है।यह मुझे बहुत प्रिय है।तन्मय कुछ निराशा से बोला।
जरा देखूं तो सही।तन्मय ने जेब से कंचा निकाल कर दिखाया।उसे देख कर अंकल बोले—नहीं तन्मय,मुझे तो हरा कंचा चाहिये था।तुम सामान ले जाओ।पैसे हो जायें तो दे जानां। नहीं तो हरे रंग का कंचा।
  धन्यवाद अंकल।कह कर तन्मय चलने को हुआ तो अंकल फ़िर बोले—अरे बेटे,इसके खाने वाले बिस्कुट और नहलाने वाला साबुन भी तो लेते जाओ।
बेल्ट में लगी चेन को पकड़ कर मूलचंद को घर ले जाते समय तन्मय बहुत खुश था।
      उसके जाते ही किराने वाले की पत्नी बोली-भला उसे मुफ़्त में इतना सामान क्यों दे दिया?गरीब बच्चों के साथ ऐसा करते हो तो कुछ समझ में आता है।ये तो पैसे वाले लोग हैं। हरा कंचा लेकर आयेगा तो बहाना बना दोगे कि नहीं,मुझे तो अब नीला कंचा चाहिये।क्यों?
       तुम नहीं समझोगी राधा।पर जरा इस बच्चे का इतना नेक काम तो समझो।मम्मी पापा इसे क्या पैसे देंगे?उलटे उस पर ही डांट पड़ेगी।पैसे चुरा कर ये सब ले आने का आरोप लगेगा।उसके लिये हम इतना भी नहीं कर सकते?देखना आज या कल में इसकी मम्मी मुझसे पूछने दौड़ी आएंगी।
        मम्मी पहले आक्टर अंकल के पास पहुंच गयीं।उनसे बोलीं—डाक्टर साहब,आप तन्मय के इन बेतुके कामों को क्यों बढ़ावा देते हैं?
     डाक्टर बोले—बहन जी,आपका तन्मय तो शाबाशी पाने का काम कर रहा है।उसे बेतुका मत कहिये।आज हम प्रकृति से कितना दूर होते जा रहे हैं।उसके बुरे नतीजे भी हम भोग रहे हैं।आप जरूर जानती होंगी ये पशु-पक्षी उसी प्रकृति के ही तो अंग हैं।तन्मय तो जाने अन्जाने उनकी सेवा कर हमें प्रकृति से जुड़ने की प्रेरणा दे रहा है।आपको तो प्रसन्न होना चाहिये।
   
इस अच्छी बात के आगे मम्मी क्या बोलतीं।चुपचाप लौट पड़ीं।यहां से वे किराना स्टोर पहुंच गयीं।उन्होंने उसके मालिक से पूछा----आपने तन्मय को इतना सामान पैसे लेकर ही दिया है न?
नहीं बहन जी।मालिक ने जवाब दिया।
तो आपने इतने रूपयों का सामान उसे यों  ही दे दिया?मम्मी ने अविश्वास से पूछा।
    जी हां,आपका बच्चा इतना नेक काम कर रहा है।मासूम पशु-पक्षियों की जान बचाना तो हमारे धर्म में भी लिखा हैअम जिस अंधे पिल्ले को ठोकर मारते उसकी जान बचाने के लिये वह उसे घर ले आया।हम तन्मय के लिये इतना भी नहीं कर सकते?और हां,उसे वह सामान एक हरे कंचे के बदले में दिया है।उससे कहियेगा कि इधर आए तो हरा कंचा लेता आए।मालिक मुस्कुराकर बोला।
           मम्मी के भीतर अभी तक डाक्टर के शब्द गूंज रहे थे।अब किराना वाले के ये शब्द।उनकी आंखें भर आईं।बेचारा तन्मय पढ़ाई में भी इतना तेज है।घर के भी इतने काम संभाले रहता है।उस पर से पशु-पक्षियों के लिये इतना लगाव,इतना सेवा भाव।
         अगले दिन तन्मय और उसके पापा आश्चर्य में पड़ गये।मम्मी मूलचंद के बिछाने और ओढ़ने के लिये गद्दियां सिल रही थीं।पापा ने मुस्कुरा कर तन्मय की पीठ ठोंकी---शाबाश तन्मय।
     मम्मी की शाबाशी तो उनके काम में ही बोल रही थी।तन्मय आज पहली बार भीतर से गदगद हो उठा।वह दौड़कर मम्मी से लिपट गया।
    मम्मी ने देखा—उनके सामने खड़ा मूलचंद भी दुम हिला रहा था।अंधा होते हुये भी जैसे उसे मम्मी के प्यार का एहसास हो रहा था।
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प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।31जुलाई 2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन। शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम0ए0।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन मे संलग्न।देश की प्रमुख स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।
बाल कहानियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र 87 वर्ष की उम्र तक निर्बाध चला।