गुरुवार, 17 अगस्त 2017

लालच की सजा

लालच की सजा
(दृश्य-5 एवं दृश्य-6)
 (दृश्य-5
(राजा का दरबार।बूढ़ा राजा सिंहासन पर बैठा है। चारों तरफ उसके मंत्री और दरबारी अपने स्थान पर बैठे हैं उसी समय मछुआरा मछलियां लेकर आता है।)
मछुआरा-- महाराज की जै हो।
राजा--    कहो युवक ,तुम्हे क्या कष्ट है?मेरे दरबार में किसकी  फरियाद लेकर आए हो ?
मछुआरा-- महाराज, मुझे कोई कष्ट है और ही मैं किसी की फरियाद ले कर आया हूं।
राजा-- (तेज स्वरों में गुस्से से) तो फिर तुम्हारी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई? क्या तुम जानते नहीं कि मेरा समय कितना कीमती है?
मछुआरा-- (कांपते हुए) हुजूर गुस्ताखी माफ हो! मैं आपके लिए मछलियां ले कर आया हूं।
(राजा अपनी जगह से उछलता है मछुआरे की तरफ बढ़ने की कोशिश करता है और उसी कोशिश में लड़खड़ा कर गिरने लगता है।मंत्री उसे सम्हालता है।)
मंत्री-- धीरज रखें महराज....धीरज रखें
राजा(बहुत निरीह स्वरों में) कैसे  रखूं धीरज मंत्री जी....(प्रसन्नता भरे स्वरों में) मछलियां.......अरे  वाह!(मंत्री से)अरे मंत्री जी, देखो यह वीर युवक मछलियां लेकर आया है।(युवक से) युवक, तुम कहां से मछलियां ले कर आए हो? लाओ जरा जल्दी लाओ ---अब मुझसे बिलकुल भी नहीं रहा जा रहा जरा मैं भी तो देखूं कौन सी मछलियाँ लाये हो तुम ?
मछुआरा-- (हाथ जोड़ कर) महाराज, मैं दूर गांव का रहने वाला एक गरीब मछुआरा हूं दूर देश की  प्यारी, ताजी मछली आपके लिए ही लाया हूं।
(मछुआरा मछलियां ले जाकर राजा को दिखलाता है।राजा उसे सूंघता है।)
राजा-- (मंत्री से) वाह,कितनी प्यारी खुशबू है ?(टोकरी मंत्री को पकड़ाकर) मंत्री जी इस वीर पुरूष को ढ़ेर सारा पुरस्कार दो।बोलो युवक, तुम्हें क्या  पुरस्कार दिया जाय ?हाथी,घोडे़,धन,जो भी चाहो मांग लो।मैं आज तुमसे बहुत खुश हूँ।
मछुआरा--  नहीं महाराज, मुझे पुरस्कार में धन नहीं चाहिए।
राजा-- (आश्चर्य से) बोलो-बोलो, फिर तुम्हें क्या दिया जाए?
मछुआरा(सोचते हुए) महाराज, मुझे पुरस्कार में एक हजार कोड़े मारने का आदेश दें।
(सभी मंत्री एवं दरबारी राजा के साथ हंसते हैं।)
मंत्री-- अरे भाई, यह तो सजा हुई। तुम यह सजा क्यों चाहते हो? कोई और पुरस्कार मांगो।महाराज तुम पर प्रसन्न हैं।
मछुआरा-- नहीं महाराज, मुझे यही पुरस्कार चाहिए।
राजा-- अच्छा ठीक है। यदि इसकी यही इच्छा है तो इसे यही पुरस्कार दिया जाय। इसे धीरे-धीरे एक हजार कोड़े मारे जायं।
(राजा की आज्ञा पाकर एक सिपाही मछुआरे को कोड़े मारना शुरु करता है।500 की गिनती पूरी होते ही मछुआरा  खड़ा हो जाता है।)
राजा(हंस कर) क्यों भाई, अभी तो तुम्हारे 500 कोड़े और बाकी हैं।
मछुआरा-- नहीं महाराज, मैं अपने हिस्से के कोड़े खा चुका।बाकी कोड़े दूसरे व्यक्ति को जिसे मैं कहूंगा उसे लगाए जाएं।
(राजा मंत्री दरबारी  सभी आश्चर्य से उसे देखते हैं)
राजा(उलझन भरे स्वर में)तुम्हारी बात कुछ समझ में नहीं रही है युवक। साफ-साफ कहो क्या चाहते हो?
मछुआरा-- महाराज, आपके महल के मुख्य द्वार पर नियुक्त पहरेदार ने मुझे मछली लेकर आपके पास इस शर्त पर आने दिया था कि पुरस्कार में प्राप्त धन में से आधा मैं उसे दे दूंगा।इसलिए पुरस्कार की  आधी राशि अर्थात् 500 कोड़े उस पहरेदार को लगाए जाएं।
राजा-- (क्रोध में) कौन है वह पहरेदार! उसका नाम बताओ?
मछुआरा-- महाराज, उसने अपना नाम ‘‘काना बैलबताया है।
राजा-- (मंत्री से) मंत्री जी, ‘‘काने बैल‘‘ को फौरन दरबार में हाजिर करवाकर आप उसे दो हजार कोड़े लगवाइए और उसे महल से धक्के देकर बाहर निकलवा दीजिए।ताकि भविष्य में फिर कभी वह रिश्वत लेने की हिम्मत करे।और हां इस वीर युवक को एक हजार सोने की मुहरें देकर इसे सम्मान सहित इसके घर पहुंचवा दीजिए।
 (मंत्री सिपाहियों को काने बैल को लाने की आज्ञा देकर मछुआरे को साथ लेकर खजाने की तरफ चले जाते हैं।)
                            (दृश्य-6
(प्रारम्भिक संगीत के साथ मंच पर एक तरफ से नट और दूसरी तरफ से नटी नाचते गाते हुए आते हैं।)
     नट(गाता है)     लालच कभी करना बच्चो
                         रिश्वत कभी किसी से लेना।
     नटी(गाती है)     वरना कभी बढ़ोगे आगे
                          जीवन भर पछताओगे.....
      नट नटी-(गाता है)- काने बैल ने जैसा खाया
                           तुम भी कोड़े पाओगे,
                           लालच कभी करना बच्चो,
                           रिश्वत कभी किसी से लेना।
       ( दोनों नाचते हुए मंच पर से जाते हैं।दृश्य यहीं फेड आउट होता है।)
००० 
डा०हेमन्त कुमार  

बुधवार, 16 अगस्त 2017

लालच की सजा

लालच की सजा 
(बाल नाटक दृश्य-3 एवं दृश्य-4) 
(दृश्य-3)
            ( एक मछुआरे की झोपड़ी का दृश्य।मछुआरे की पत्नी बराम्दे में बैठी एक फटा कपड़ा सिल रही है। उसी समय मछुआरा एक टोकरी में कुछ मछलियां लेकर गाना गाता हुआ आता दिखाई पड़ता है।मछुआरा जल्दी से टोकरी एक तरफ रख देता है और मछुआरिन को दोनों हाथों से पकड़ कर खडा करता है और तेजी से गोल गोल चक्कर लगता है।मछुआरिन गुस्से से उसे झिटक कर अपने हाथ छुड़ाती है।)
मछुआरिन(गुस्से में) अरे छोडो भाई मुझे बहुत काम करने हैं और तुम्हें ठिठोली सूझी है
मछुआरा(खुशी से) अरी भागवान मेरी बात तो सुनोकम करने को तो सारा दिन पडा है।
मछुआरिन(माथे पर हाथ मारकर) हे भगवान इस आदमी से तो तंग गयी हूँ मैं बोलो क्या कह रहे?
        (मछुआरा एक बार फिर मछली की टोकरी उठा कर मंच पर चारों और नाचता है।फिर टोकरा एक तरफ रख कर मछुआरिन का हाथ पकड़ कर गाता है।)     
मछुआरा-- राजा से मैं आज मिलूंगा
                मछली उन्हें दिखाऊंगा
                सुन्दर-सुन्दर मीठी मछली
                आज उन्हें मैं  खिलाऊंगा।
                मछली राजा जी को खिलाकर,
                पुरस्कार में पाऊंगा
                पुरस्कार में मिलेगा पैसा
                मैं अमीर बन जाऊंगा।
                राजा से मैं आज मिलूंगा
                मछली उन्हें.....
(मछुआरिन उसे  इतना खुश देखकर आश्चर्य में पड़ जाती है।वह एक बार मछुआरे के आगे जाती है,फिर पीछे।वह उसका हाथ फिर पकड़ कर नचाने की कोशिश करता है,मछुआरिन उसे रोककर पूछती है।)
मछुआरिन-- अरे क्या बात है?आज तुम बहुत खुश नजर रहे हो?कहीं कोई खजाना मिल गया है क्या?
मछुआरा(ख़ुशी से)  खजाना मिला नहीं है, बल्कि मिलने वाला है।
मछुआरिन-- (उत्सुकता भरे स्वरों में) सच्ची में?कहां मिल रहा है खजाना....? कहां है...मुझे भी तो कुछ बताओ?                       (दौड़ कर उसके  हाथ से लेकर मछलियां देखती है।)
मछुआरिन-- (मछलियां देखकर गुस्से से) ये मछलियां हैं कि  खजाना? तुम्हें तो बस हर चीज में बस  खजाना  ही दिखायी पड़ता है।
मछुआरा--   अरी भागवान, इन्हीं मछलियों से ही मुझे खजाना मिलेगा....
मछुआरिन--  जाओ, बेवकूफ  किसी और को बनाओ। मुझे अपना काम करने दो।
मछुआरा--   मैं सच कह रहा हूं। मुझे इन्हीं मछलियों से खजाना मिलेगा।
मछुआरिन--  भला कैसे  मिलेगा खजाना? जरा मैं भी तो सुनूं।
मछुआरा--   देखो, हमारे राजा को अकाल  और सूखे के कारण खाने के लिए मछलियां नहीं मिल पा रही हैं।वह  मछली के बिना खाना नहीं खाता।इसीलिए उसने आज ही यह घोषणा करवाई है कि यदि कोई उसे मछलियां लाकर देगा तो राजा उस व्यक्ति को खूब पुरस्कार देगा।आज संयोग से मुझे एक तालाब में ये कुछ विदेशी मछलियां मिल गयी हैं।मैं इन्हें राजा को देकर खूब इनाम पाऊंगा।फिर  हमारे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे।
मछुआरिन(ख़ुशी से चीख कर) अर्रे----भैया तो फिर देर क्यों कर रहे हो ?जल्दी इसे महाराज के पास ले जाओ और पुरस्कार पाओ।(कुछ सोचकर)और हां,एक बात तो  सुनो। जरा वह गीत मुझे भी बता दे ताकि,तुम्हारे वापस आने तक मैं भी वह गीत गाती रहूं।
मछुआरा--    लो सुनो वह गीत।
(मछुआरा गाता है)
                 राजा से मैं आज मिलूंगा,
                 मछली उन्हें दिखऊंगा
                 सुन्दर-सुन्दर मीठी मछली
                  आज उन्हें मैं खिलाऊंगा।
( गाते गाते वह नाचने लगता है।साथ में मछुआरिन भी नाचती है।)
                   मछली राजा जी को खिलाकर
                   पुरस्कार मैं पाऊंगा
                   पुरस्कार में मिलेगा पैसा
                   मैं अमीर बन जाऊंगा।
(मछुआरे के साथ मछुआरिन भी गाने लगती है ओर नाचती है।)
मछुआ--मछुआरिन-- (एक साथ नाचते हुए)
                    राजा से मैं आज मिलूंगा,
                    मछली उसे खिलाऊंगा...
(दोनों पूरा गीत गाते हैं ओर नाचते हैं।)
(दृश्य-4)
( राजा के महल का प्रवेश द्वार।पहरेदार ,सैनिक टहल रहे हैं।मछुआरा एक टोकरी में मछलियां ले कर गाता हुआ आता है।)
मछुआरा-- (गाता हुआ)
            राजा से मैं आज मिलूंगा
                       मछली उन्हें दिखाऊंगा
                       सुन्दर-सुन्दर मीठी मछली
                        आज उन्हें मैं खिलाऊंगा।
                    (पहरेदार उसे रोकता है और पूछता है।)
पहरेदार मछुआरे,तू बिना मुझसे पूछे कैसे चला जा रहा है?जानता नहीं कि यह  महाराजा का राजमहल है ?
मछुआरा-- हा भइया हां मैं जानता हूं कि यह महल महाराजा का है।मैं  महाराज से ही मिलने जा रहा हूं।
पहरेदार--  चल-चल बड़ा आया है राजा से  मिलने,चल भाग यहां से
मछुआरा-(खुशामद भरे शब्दों में) सुनिए पहरेदार जी, मैं बहुत दूर से आया हूं।मुझे महाराज से बहुत  जरूरी काम है।
पहरेदार-- (मछुआरे को डांट कर) मैंने कहा , तू भाग जा यहां से।तेरे जैसे फटीचरों  से मिलने का समय महाराज के पास नहीं है।
मछुआरा--  भइया, मैं महाराज के लिए बहुत अच्छी सी मछलियां लेकर आया हूं।
(पहरेदार मछलियों का नाम सुनते ही उसके पास जाता है।)
पहरेदार--  मछलियां...? कहां हैं मछलियां मैं भी तो देखूं?
(मछुआरा टोकरी  खोल कर उसे दिखाता है।)
पहरेदार-- अरे वाह,ताजी लगती हैं।
मछुआरा-- हां भैया हाँ एकदम ताजी ही हैं।आज सबेरे ही तो पकड़ा है मैंने इन्हें इसीलिए ये ताजी तो हैं ही और बहुत स्वादिष्ट भी होंगी।इसीलिए तो मैं इन्हें महाराज को देने आया हूं।
पहरेदार-- (मन में सोचते हुए) अच्छा तो यह मछुआरा राजा को मछलियां दे कर ढेर सारा पुरस्कार पाना चाहता है।(मछुआरे से)सुनो भाई ये मछलियां तुम मुझ ही दे दो।मैं इन्हें महाराज के पास पहुंचा दूंगा।
मछुआरा-- (मछलियों की टोकरी छिपाता हुआ) नहीं-नहीं इन्हें मैं खुद ही महाराज को दूंगा।आखिर मैं इतनी दूर से इन्हें ले कर आया हूं बिना महाराज से मिले कैसे चला जाऊंगा?
पहरेदार-- (कुछ सोचकर)अच्छा ठीक है। मैं तुम्हें महाराज के पास एक शर्त पर ही जाने दूंगा।
मछुआरा-- बोलो भाई कौन सी शर्त है तुम्हारी?
पहरेदार-- देखो,मछलियां देने पर महाराज से जो भी पुरस्कार तुम्हें मिलेगा उसका आधा तुम मुझे लाकर दोगे।अगर मेरी यह शर्त तुम्हें मंजूर है तो अन्दर जा सकते हो।नही तो यहां से दफा हो जाओ।
मछुआरा-- (कुछ देर सोचकर) ठीक है मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है।
पहरेदार-- अच्छा तो तुम अन्दर जाओ।लेकिन याद रखना मुझे धोखा देने की कोशिश मत करना।
मछुआरा-- ठीक है भाई..ठीक है।लेकिन तुम मुझे अपना नाम तो बता दो।नहीं तो तुम्हारा हिस्सा मैं किसे दूंगा?
पहरेदार--(अकड़कर) मेरा नाम है(अपनी मूंछें ऐंठता है) काना बैल।भूलना नहीं....हां....काना बैल

(मछुआरा मछलियां ले कर मुस्कराता हुआ अन्दर जाता है।)
००० 
(क्रमशः )
डा०हेमंत कुमार