रविवार, 17 अक्तूबर 2010

रिक्शा

ट्रिन ट्रिन करके
घण्टी बजाता
तीन पहियों से
चलता जाता
मैं हूं रिक्शा
मैं हूं रिक्शा ।

अम्मा बाबू
दादा दादी
मुन्ना मुन्नी
बड़की छुटकी
सबको मैं हूं
सैर कराता
मैं हूं रिक्शा
मैं हूं रिक्शा ।

पतली गलियां
चौड़ी सड़कें
सब पर मैं तो
चलता जाता
जहां न पहुंचे
मोटर गाड़ी
वहां भी मैं
सबको पहुंचाता ।

मैं हूं रिक्शा
मैं हूं रिक्शा ।
******
हेमन्त कुमार

बुधवार, 29 सितंबर 2010

पहाड़


कहीं पे तो आकाश को छूते
कहीं पे आ धरती पर मिलते
कहीं पे नीचे कहीं पे ऊंचे
ऊंचे नीचे नीचे ऊंचे
 कितने सुन्दर हैं ये पहाड़।

कहीं पे काले कहीं पे भूरे
कहीं बरफ़ से ढके हुये तो
कहीं बड़े पेड़ों में छुपके
हरे भरे दिखते ये पहाड़
कितने सुन्दर हैं ये पहाड़।

कहीं पे कल कल का संगीत
कहीं पे कलरव पाखी का
कहीं दिखे जो देश के दुश्मन
तुरत भुजायें लेते तान
कितने सुन्दर हैं ये पहाड़।
000
  हेमन्त कुमार 

सोमवार, 23 अगस्त 2010

मुनमुन चुहिया ने बिल्ले को राखी बांधी


          एक गांव के किनारे एक खेत था। खेत में चूहों के कई परिवार रहते थे। सारे चूहे चुहिया रात में अपनी बिलों से निकलते और घूम घूम कर अनाज खाते।।दिन में सब अपनी बिलों में घुसे रहते। वक्त जरूरत पड़ने पर एक दूसरे की सहायता करते थे।
          उसी खेत में मुनमुन चुहिया भी अपने मम्मी पापा के साथ रहती थी। मुनमुन पढ़ने लिखने, खेलकूद हर चीज में तेज थी। सभी उसकी तारीफ करते थे।फिर भी मुनमुन अक्सर उदास रहती।उसकी उदासी का सबसे बड़ा कारण यह था कि वह मां बाप की अकेली लड़की थी।उसके कोई भाई नहीं था।
               हर साल राखी का दिन आने पर सारी चुहिया लोग अपने-अपने भाइयों को राखी बांधती थी। पर मुनमुन अपनी बिल में उदास बैठी रहती। इस बात का दुःख उसके मम्मी पापा को भी होता था।
         इस साल भी राखी वाले दिन मुनमुन खेत में एक तरफ उदास बैठी थी। सुबह से ही हर चुहिया अपने भाई को राखी बांध रही थी। सारे चूहे अपने अपने गले में सुन्दर राखियां बॅंधवाए घूम रहे थे। बेचारी मुनमुन अकेली बैठी चूहों चुहियों को आते जाते देख रही थी।मुनमुन को वहां बैठे दो तीन घण्टे हो चुके थे।।उसी समय मोती कुत्ता उधर टहलाता हुआ आ गया। मोती ने मुनमुन को अकेले बैठा देखा तो उसके पास चला आया। मोती ने मुनमुन से पूछा-

मुनमुन रानी मुनमुन रानी
क्यों बैठी हो यहां अकेले
मुझे सुनाओ अपनी कहानी।

            मुनमुन दुःखी मन से बोली, ‘

कुत्ते भाई कुत्ते भाई
मैं अकेली कुत्ते भाई
नहीं है मेरा कोई भाई,
किसको राखी बांधू भाई
क्या तुम बनोगे मेरे भाई,
मुझसे राखी बंधवाओ भाई
      मुनमुन की बात सुनकर मोती कुत्ता हंसने लगा।वह थोड़ी देर तक हंसता रहा।फिर बोला,         
मुनमुन रानी मुनमुन रानी
तुम चुहिया हो, मैं कुत्ता हूँ
कैसे बनूं तुम्हारा भाई,
चूहे को किसी बना लो भाई
उसी को राखी बांधो भाई।
                       मोती की बात सुन कर मुनमुन और दुःखी हो गयी। मोती अपनी दुम हिलाता हुआ वहां से चला गया। मुनमुन वहीं बैठी रही।
          थोड़ी देर बाद ही वहां घूमता घामता मटरू बछड़ा आ गया। मुनमुन उसे देख थोड़ा खुश हुई। उसने सोचा शायद यह मेरा भाई बन जाएगा। जब वह नजदीक आ गया तो मुनमुन ने उससे भी वही बात कही। पर मटरू तो और शैतान निकला। वह बोला,

तू है काली छोटी चुहिया
मैं हूं गोरा तगड़ा बछड़ा
क्यों बनूं मैं तेरा भाई,
बिल्ले को ही बना लो भाई
         बिल्ले का नाम सुनते ही मुनमुन डर गयी। मटरू बछड़ा उछलता कूदता वहां से दूर चला गया। मुनमुन ने सोचा मैं अब घर वापस चलूं। कहीं सममुच कोई बिल्ला यहां न आ जाए। वह वहां से जाने ही वाली थी कि सचमुच में वहां कालू बिल्ला आ गया। उसे देख मुनमुन डर गयी। कालू बिल्ला नजदीक आ गया और बोला,

मुनमुन रानी मुनमुन रानी,
क्यों बैठी हो यहां अकेली
मुझे बताओ अपनी कहानी।

                  मुनमुन पहले तो चुप रही। फिर डरते डरते बोली,

बिल्ले भाई बिल्ले भाई,
मैं अकेली बिल्ले भाई,
नहीं है मेरे कोई भाई,
किसको राखी बॉंधू भाई,
क्या तुम बनोगे मेरे भाई,
मुझसे राखी बंधवा लो भाई
        मुनमुन की बात सुनकर कालू बिल्ले की आंखों में आंसू आ गये। वह भरे गले से बोला,

मुनमुन रानी मुनमुन रानी
मैं भी तो मां बाप का अकेला
नहीं है मेरी कोई बहना,
खुशियां सारी मुझे मिलेगी
तुम बन जाओ यदि मेरी बहना।
जाओ जल्दी राखी लाओ,
बांधो मुझको मेरी बहना।
कालू बिल्ले की बात सुनते ही मुनमुन चुहिया खुशी से रोने लगी। वह जल्दी से भाग कर अपनी बिल में गयी। उसने वहां अपने पापा मम्मी को भी यह खुश-खबरी दी। और एक तश्तरी में राखी, फूल, रोली, मिठाई वगैरह सजा कर ले आई। पीछे पीछे उसके मम्मी पापा भी आ गये। कालू बिल्ला खेत में बैठा उसका इन्तजार कर रहा था। मुनमुन राखी ले कर आई तो कालू उसके सामने आकर बैठ गया। मुनमुन ने पहले उसके माथे पर तिलक लगाया। फिर उसके अगले पंजे में उसने राखी बांधी। राखी बांध कर मुनमुन ने एक खोए का लड्डू कालू बिल्ले के मुंह में डाल दिया। कालू ने भी इमरती का एक छोटा टुकड़ा मुनमुन के मुंह में रख दिया। दोनों मिठाईयॉं खा रहे थे। मारे खुशी के भाई बहन दोनों की आंखों में आंसू आ गये।
     पास में ही खड़े मुनमुन के मम्मी पापा और दूसरे चूहे चुहिया भाई बहन के इस सुखद मिलन को आश्चर्य से देख रहे थे।
                             000
                                                                  
                                             
हेमन्त कुमा
   

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

मर गया शेर

खबर एक फ़ैली जंगल में
मर गये अपने राजा शेर
गुफ़ा के भीतर उल्टे हो कर
पड़े हैं अपने राजा शेर।
खबर एक------------।

भागे सभी जानवर सुन के
गुफ़ा के बाहर मच गया शोर
कोई कहता ढोंग रचाया
कोई कहता मर गया शेर।
खबर एक------------।

लोमड़ आला लेकर पहुंचा
देखूं क्या सच मर गया शेर
आंख खोल के शेर जो झपटा
लोमड़ फ़ौरन हो गया ढेर।
खबर एक------------।

भागे तुरत जानवर सारे
जंगल में फ़िर मच गया शोर
भागो भागो जल्दी भागो
नहीं मरा जिन्दा है शेर।

खबर एक फ़ैली जंगल में
मर गये अपने राजा शेर।
000
हेमन्त कुमार



गुरुवार, 17 जून 2010

काले मेघा आओ ना



काले मेघा आओ ना

गर्मी दूर भगाओ ना।



गगरी खाली गांव पियासा

नदिया से ना कोई आशा।

सूख गये सब ताल तलैया

कैसे गायें छम्मक छैयां।

धरती को सरसाओ ना

काले मेघा आओ ना॥



सुबह सुबह ही सूरज दादा

गुस्सा जाते इतना ज्यादा।

कष्टों की ना कोई गिनती

सुनते नहीं हमारी विनती।

कुछ उनको समझाओ ना

काले मेघा आओ ना॥



हमने तुमको भेजी चिट्ठी

खतम करो अब अपनी छुट्टी।

जल्दी से जल्दी तुम आना

आने की तारीख बताना।

मस्ती के दिन लाओ ना

काले मेघा आओ ना॥

000

कवि-कौशल पांडेय

हिन्दी अधिकारी

आकाशवाणी,पुणे(महाराष्ट्र)













गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

थाने में हंगामा

शेरू कुत्ता ले कर सोटा
सीधे पहुंचा थाने में
पटक के सोटा मेज पे बोला
क्या हंगामा थाने में।

थानेदार उठा बिस्तर से
झट से पहुंचा थाने में
हाथ जोड़ के बोला फ़िर वो
सारी सर, कुछ देर हुई बस आने में।

कुर्सी पर फ़िर चढ़ कर शेरू
लगा भौंकने थाने में
कहां मर गये सभी सिपाही
रपट लिखानी थाने में।

सभी सिपाही फ़ौरन भागे
गिरते पड़ते थाने में
शेरू ने फ़िर क्लास लगाई
सरे आम बस थाने में।

थानेदार से उट्ठक बैठक
हवलदार से झाड़ू पोंछा
मेज पे बैठा मुर्गा तोड़े
अपना शेरू थाने में।

शेरू कुत्ता ले कर सोटा
सीधे पहुंचा थाने में।
000
कवियत्री--नित्या शेफ़ाली



रविवार, 18 अप्रैल 2010

बिल्ली मौसी



बिल्ली मौसी घर से चली
आंख पे चश्मा हाथ में थैला
बिल्ला मौसा को बाय कहा
और फ़ोन मिलाती आगे चली।

हंस के बोले मौसा जी फ़िर
चटक मटक कर कहां चली
झटक के अपनी झबरी पूंछें
आंख मटका कर झट से बोली।

पहले बालीवुड जाऊंगी
शाहरुख संग फ़िल्म बनाऊंगी
पैसा खूब कमाऊंगी
फ़िर बनारस जाऊंगी।






जा के गंगा में नहाऊंगी
चूहे पकड़ के लाऊंगी
पेट भरकर खाऊंगी
फ़िर वापस मैं आऊंगी।

कवि-कुलेश नन्दन
                        पुत्र श्री वीरेन्द्र सारंग
                     कक्षा-5 बाल गाइड इन्टर कालेज
                                        लखनऊ-

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

कठफ़ोड़वा

घूम घूम कर पेड़ों पर ही
ठक ठक करता मैं कठफ़ोड़वा।

चोंच मेरी है बहुत ही लम्बी
बहुत ही लम्बी बहुत ही पैनी
मोटी से मोटी लकड़ी को
काटे जैसे लुहार की छेनी।

रंग मेरा है गाढ़ा भूरा
उस पर काली भूरी धारी
पर उससे भी अच्छी लगती
मेरे सिर पर कलगी प्यारी।

घूम घूम कर पेड़ों पर ही
ठक ठक करता मैं कठफ़ोड़वा।
*****
हेमन्त कुमार

शनिवार, 27 मार्च 2010

खुली खुली खिड़की सी दीदी





खुली खुली खिड़की तुम हमको
च्छी बहुत बहुत लगती हो
हमको तो तुम प्यारी प्यारी
बिलकुल दीदी सी लगती हो।

जैसे बिजली के जाने पर
दीदी हमको पंखा झलती
तुम भी खिड़की हवा भेजकर
वैसे ही तो पंखा झलती।
 
जब हम होते कुछ उदास तो
हमको नींद नहीं है आती
तो कहानियों के मेले में
दीदी हमको सैर कराती।

खिड़की तुम भी आसमान का
नीला टुकड़ा हमें दिखाती
जिस पर बिठा बिठा कर जाने
कहां कहां की सैर कराती।
000
दिविक रमेश
श्री दिविक रमेश हिन्दी साहित्य  के प्रतिष्ठित कथाकार,कवि,एवम बाल साहित्यकार हैं।
आपकी अब तक कविता,आलोचनात्मक निबन्धों,बाल कहानियों,बालगीतों की 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।तथा आप कई राष्ट्रीय एवम अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किये जा चुके हैं।वर्तमान समय में आप दिल्ली युनिवर्सिटी से सम्बद्ध मोती लाल नेहरू कालेज में प्राचार्य पद पर कार्यरत हैं।
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित

शनिवार, 20 मार्च 2010

मेरी प्यारी गौरैया

रोज सुबह आती गौरैया

गीत नये गाती गौरैया

उठ जाओ तुम नित्या रानी

कह के मुझे जगाती गौरैया।


चीं चीं चूं चूं मीठी बोली

दाना मांग रही गौरैया

अम्मा जल्दी दे दो चावल

भूखी है प्यारी गौरैया।


पंख छपक कर पानी में तो

रोज नहाती है गौरैया

चोंच रगड़कर पेड़ की डाली

चावल चुनती ये गौरैया।


झूला झूलूं बाग में जब भी

चुपके से आती गौरैया

उड़ उड़ मेरे चारों ओर

खुशी से इतराती गौरैया।
000
कवियत्री:नित्या शेफ़ाली