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गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

कठफ़ोड़वा

घूम घूम कर पेड़ों पर ही
ठक ठक करता मैं कठफ़ोड़वा।

चोंच मेरी है बहुत ही लम्बी
बहुत ही लम्बी बहुत ही पैनी
मोटी से मोटी लकड़ी को
काटे जैसे लुहार की छेनी।

रंग मेरा है गाढ़ा भूरा
उस पर काली भूरी धारी
पर उससे भी अच्छी लगती
मेरे सिर पर कलगी प्यारी।

घूम घूम कर पेड़ों पर ही
ठक ठक करता मैं कठफ़ोड़वा।
*****
हेमन्त कुमार