बुधवार, 17 दिसंबर 2014

बड़ी बहादुर चींटी

                   
    जंगल के सारे जानवर सन्न रह गये।जैसे ही उन्हें पता चला कि चीं चीं चींटी ने रामू हाथी को कुश्ती के लिये ललकारा है,सब के सब भौचक।हर जानवर यही सोच रहा था कि चीं चीं चींटी का दिमाग खराब हो गया है।कहां इतना बड़ा रामू हाथी और कहां चीं चीं चींटी।कोई मेल ही नहीं दोनों का।जंगल के हर कोने में यही चर्चा चल रही थी।
     कई जानवर सच्चाई पता करने रामू हाथी के घर की ओर दौड़े।कुछ ने सोचा चलो चीं चीं चींटी से पता कर लें।बात सही भी है या नहीं।
        खबर उड़ते उड़ते जंगल के राजा गबरू शेर तक भी पहुंच गयी।सुनते ही माथे पर बल पड़ गये।उसने फ़ौरन खबर लाने वाले शेरू कुत्ते से पूछा,क्या जो बात तू कह रहा है वो सच है?
             “हां महाराज,बिल्कुल सही खबर दी है मैंने आपको।शेरू अपनी झबरी पूंछ हिलाता हुआ बोला।
                          गर्र----।गबरू की दहाड़ ने पूरे जंगल को हिला दिया।उसकी दहाड़ सुनकर शेरू कुत्ता भी कांप उठा।चीं चीं चींटी तो गई काम से।अब उसे गबरू शेर के गुस्से से कोई नहीं बचा सकता।शेरू ने कांपते हुए सोचा।अभी गबरू शेर उससे कुछ कहता कि सामने से रामू हाथी अपनी लंबी सूंड़ हिलाता हुआ कई दोस्तों के साथ हाजिर हो गया।वह बहुत गुस्से में दिख रहा था।
           “महाराज---की जय हो। रामू हाथी ने सूंड़ उठा कर गबरू को अभिवादन किया।
    “आओ----आओरामू बैठो।गबरू दहाड़ते हुये भी मुस्करा पड़ा।वह समझ गया कि रामू क्यों इतने गुस्से में है।
                  “क्या बैठूं महाराज---अब तो जंगल में रहना भी दूभर हो गया है।रामू फ़िर चिग्घाड़ा।अब देखिये उस---चीं चीं चींटी को---उसने मुझे कुश्ती लड़ने को ललकारा है।
       “अरे तो इसमें परेशानी की क्या बात?लड़ लो उससे कुश्ती।गबरू मुस्करा कर बोला।
   महाराज अब आप भी ऐसी बात कहेंगे।रामू हाथी दयनीय सूरत बना कर बोला।
       आप खुद ही सोचिये महाराज----अगर छोटे छोटे कीड़े मकोड़े हमें ऐसे ही ललकारते रहेंगे तो हमारा भय ही खतम हो जाएगा जंगल में।भला कौन हम बड़े जानवरों की इज्जत करेगा?भालू अपनी घुरघुराती आवाज में बोला।
    हां बात तो तुम लोगों की सही है।पर इसका उपाय क्या किया जाय?गबरू शेर कुछ सोचता हुआ बोला।
       इसका उपाय यही है महाराज कि मैं जा कर चीं चीं चींटी की पूरी बिल को तोड़ दूं।न रहे बांस न बजे बांसुरी।रामू हाथी गुस्से में पैर पटकता हुआ बोला।
        ना ना ---ऐसी गलती मत करो।सब तुम्हें ही कहेंगे कि चुपके से जाकर चींटी के घर में उसे मार दिया।गबरू शेर ने उसे समझाने की कोशिश की।
   तो क्या करूं?उसको यूं ही जंगल में सबसे कहने दूं कि वो मुझसे कुश्ती लड़ने वाली है।रामू हाथी खिसिया कर बोला।
      नहीं मेरी मानो तो तुम उसका चैलेंज स्वीकार कर लो।और खुले मैदान में उसे सबके सामने हराओ।ताकि दूसरे जानवरों और कीड़े मकोड़ों को भी सबक मिल सके।गबरू दहाड़ कर बोला।
     हां रामू दादा---महाराज ठीक कह रहे हैं।भालू अपने नथुने खुजला कर बोला।
         “ठीक है महाराज----फ़िर मैं कब लड़ूं उससे कुश्ती?रामू ने पूछा।
       “शुभ काम में देर किस बात की।कल ही रख लो।गबरू ने जवाब दिया।
            “और हां,शेरू तुम जाकर चींटी को बता दो कि रामू हाथी उससे लड़ने को तैयार है।और बंदर से कहकर पूरे जंगल में इस बात की डुगडुगी पिटवा दो कि मेरी गुफ़ा के सामने कल दोनों की कुश्ती होगी।फ़िर रामू हाथी,भालू और शेरू वहां से चले गये और गबरू भी आराम करने लगा।
      अगले दिन सबेरे ही जंगल के सारे जानवर,पक्षी,कीड़े मकोड़े गबरू शेर की गुफ़ा के सामने इकट्ठे हो गये।आखिर इतनी मजेदार कुश्ती जो होनी थी वहां।ज्यादातर जानवर जमीन पर और पक्षी पेड़ों पर बैठे थे।गबरू अपनी गुफ़ा के चबूतरे पर बैठा था।रामू हाथी भी आ चुका था।सबको इन्तजार था तो बस चीं चीं चींटी का।सब आपस में बात कर ही रहे थे तभी चीं चीं चींटी भी आ गयी।गबरू शेर ने दहाड़ कर सबको खामोश कराया।
  अब आप लोग शान्त हो जाइये।रामू और चींटी दोनों आ चुके हैं।गबरू के कहते ही सब खामोश हो गये।
     गबरू ने रामू हाथी और चीं चीं चींटी को सामने आने का इशारा किया।दोनों बीच की खाली जगह पर आ गये।भालू हाथ में सीटी लेकर रेफ़री बन कर खड़ा हो गया।रामू हाथी बहुत ही गुस्से में चीं चीं चींटी को घूर रहा था।
   सुनो रामू हाथी और चीं चीं चींटी---तुम लोग मेरे पंजे का इशारा होते ही कुश्ती शुरू कर दोगे।कोई एक दूसरे को जान से मारने की कोशिश नहीं करेगा। गबरू शेर दहाड़ा।
       ठीक है महाराज---।रामू भी चिग्घाड़ पड़ा।साथ ही चींटी भी अपनी महीन आवाज में कुछ बोली पर उसकी आवाज रामू की चिग्घाड़ में दब गई।
    जैसे ही गबरू ने पंजे का इशारा किया रामू ने अपना अगला पैर उठा कर चीं चीं चींटी के ऊपर रखना चाहा।सबकी सांसें रुक गयीं।लगता है नन्हीं चींटी गयी—”पेड़ पर बैठा तोता चीखा।पर हाथी का पैर पड़ने से पहले ही चींटी अपनी जगह छोड़ कर उसके पीछे वाले पैर की तरफ़ भागी।रामू  हाथी फ़ुर्ती से फ़िर घूमा।इस बार हाथी ने दूसरा पैर उठाया तब तक चीं चीं करती हुयी चींटी उसके एक पैर पर चढ़ चुकी थी।रामू हाथी पैर पटकता हुआ जमीन पर चींटी को ढूंढ़ रहा था और चीं चीं चींटी तेजी के साथ भागती हुयी उसकी सूंड़ में घुस गयी।रामू अभी भी उसे जमीन पर ही खोज रहा था।भालू कभी रामू के आगे कभी पीछे जा रहा था कि शायद कहीं चीं चीं चींटी दिख जाय।
           ठीक उसी समय चींटी ने रामू की सूंड़ में काटना शुरू कर दिया।रामू हाथी अपनी सूंड़ ऊपर उठा कर बड़ी जोर से चिग्घाड़ा।चींटी ने उसे फ़िर काटा।रामू फ़िर चिग्घाड़ा।और फ़िर तो चींटी रामू की सूंड़ में काटती रही और रामू पैर पटक पटक कर चिग्घाड़ता रहा।अंत में रामू हाथी बेदम होकर जमीन पर बैठ गया।वह बहुत ही दयनीय आवाज में बोला,,अरे चीं चीं चींटी अब मत काटो मुझे---तुम जीत गयी मैं हार गया।अब छोड़ दो मुझे---।
             रामू की हालत देखकर सारे जानवर हंसने लगे।गबरू भी हंस पड़ा।उसने भी चींटी को समझाया—“अब इसे छोड़ भी दो नन्हीं चींटी---बेचारा हार तो गया है।अंत में चीं चीं चींटी फ़ौरन चीं चीं करती हुयी रामू की सूंड़ से बाहर आ गयी।और रामू हाथी तेजी के साथ घने जंगल की ओर भागता चला गया।
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डा0हेमन्त कुमार

सोमवार, 17 नवंबर 2014

सर्कस से भागा जब भालू----।

सर्कस से भागा इक भालू
साथ में उसके बंदर कालू
भालू के था हाथ में सोटा
सीटी लिये था साथ में कालू।

चौराहे पर जाम दिखा तो
पहुंचे पुलिस बूथ पर दोनों
बंदर सीटी बजा रहा था
सोटा ले के जुट गया भालू।

सारे पुलिस बूथ से भागे
नया दरोगा सबसे आगे
बंदर भालू ने जल्दी से
जाम हटा के सड़क की चालू।
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डा0हेमन्त कुमार

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

बाल दिवस और चाचा नेहरू

                           

                   
14 नवम्बर का दिन सारे भारतवर्ष में स्वर्गीय पं0 जवाहर लाल नेहरू जी के जन्म-दिन तथा बाल-दिवस के रूप में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है।नेहरू जी के हृदय में बच्चों के लिए असीम स्नेह था।नेहरू जी बच्चों को जितना प्यार करते थे उससे कहीं अधिक बच्चे उन्हें प्यार करते थे।बच्चे उनमें इतनी अधिक आत्मीयता का अनुभव करते थे कि वे उन्हें प्यार से चाचा-नेहरू कहने लगे। यदि आप किसी बच्चे से यह पूछें कि 14 नवम्बर को क्या है ? तो वह तुरन्त ही आपसे कहेगा कि उस दिन हम सबके चाचा नेहरू का जन्म दिन है।
         वास्तव में नेहरू जी ही संसार में सम्भवतः एक ऐसे महापुरूष हुए हैं जिनके नाम पर करोड़ों बच्चे अपना उत्सव दिवस मनाते हैं।वैसे तो विश्व में अनेक ऐसे महापुरूष हुए हैं जिन्होंने बालहित के बहुत से कार्य किये हैं।उदाहरण के लिए शिक्षा के क्षेत्र में मैरिया मान्टेसरी और जान ड्यूक का बहुत बड़ा योगदान रहा है।इन शिक्षा-शास्त्रियों ने बाल शिक्षा के स्वरूप् को बिल्कुल ही बदल दिया।लेकिन नेहरू जी ने बच्चों को जो स्नेह, जो प्यार दिया वह शायद कोई नहीं दे सका।नेहरू जी जब कभी भी बच्चों से मिलते थे उनका चेहरा खिल उठता था, उनकी उदासी छंट जाती थी।यही कारण है कि 14 नवम्बर उनका जन्म-दिवस बाल-दिवस के रूप में पूरे भारत में बड़े धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।
       नेहरू जी ने एक स्थान पर स्वयं लिखा है कि, ‘‘ बच्चों के बीच आत्मा के सारे द्वार खुल जाते हैं, मन के सारे प्रवाह मुक्त हो जाते हैं, मैं अपने जीवन को बोझ से मुक्त करने के लिए बच्चों के निकट जाता हूं। मेरी थकान, मेरे मन की क्लान्ति इन शुद्ध-बुद्ध फरिश्तों के बीच ही दूर होती है-- काफी खोज के बाद इस राज को मैंने हासिल किया है।
    उन्हें बच्चों से इतना अधिक स्नेह था कि भारतवर्ष जैसे महान देश के प्रधानमन्त्री पद पर होने के कारण, अपने अत्यन्त व्यस्त जीवन में से भी नेहरू जी बच्चों से मिलने, उनके साथ खेलने-कूदने तथा उन्हें ज्ञान की बातें बताने के लिए समय निकाल लेते थे।नेहरू जी जिस समय बच्चों के बीच पहुंचते थे वे यह भूल जाते थे कि वे एक देश के प्रधानमन्त्री हैं। वे स्वयं को भी बच्चा ही समझने लगते थे।नेहरू जी बच्चों के साथ क्रिकेट भी खेलते थे, कबड्डी भी खेलते थे, वे बच्चों के साथ हरी-हरी घास में दौड़ते भी थे और छोटे-छोटे बच्चों की भांति रंग-बिरंगी तितलियों को पकड़ने भी दौड़ पड़ते थे।जब तक नेहरू जी जीवित रहे वे हर 14 नवम्बर को बच्चों से जरूर मिलते थे।इस दिन बच्चे भी अपने प्यारे चाचा नेहरू को उनका प्यारा गुलाब का फूल भेंट करते थे और नेहरू जी अपने जन्म-दिन के अवसर पर बच्चों को तरह-तरह की चीजें भेंट करते और बाल-दिवस का दिन चाचा नेहरू जिन्दाबाद के नारों से गूंज उठता था।
       
नेहरू जी हमेशा दूर की बात सोचते थे।वे जानते थे कि आज के बच्चे ही कल के नेता होंगे और उनके द्वारा ही भारतवर्ष के भविष्य का निर्माण होगा। इसीलिए उनका कहना था कि ‘‘यदि हमें देश में खुशहाली लानी है तो इसकी शुरूआत बच्चों से ही होनी चाहिए। वे बच्चों को हमेशा अपने पैरों पर खड़े होने की सलाह देते थे।वे उनमें ही भारत की खुशहाली के बीज देखते थे।उन्हें हमेशा मेहनत करने की बात समझाते थे।सन् 19580 में बाल-भवन की नींव रखते हुए नेहरू जी ने कहा था-- ‘‘मां-बाप को चाहिए कि बच्चों को अपनी जिम्मेदारी समझने दें जो अपने लिए खुद काम नहीं कर सकता वह दूसरों के लिए क्या काम करेगा ?
देश के बच्चे चाचा नेहरू को कभी भी नहीं भूल सकते। उन्हें उनके उपदेश, उनकी बातें सब पूरी तरह याद हैं। नेहरू जी का जीवन उनके लिए एक आदर्श है। पंडित नेहरू का अंग्रेजी में लिखा एक निबन्ध ‘‘मेरे प्यारे बच्चों (माई डियर चिल्ड्रेन) जो बच्चों के नाम है, एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
       नेहरू जी का विचार था कि बालक अपने भावपूर्ण नेत्रों में कुछ सपने लिए रहता है। उन सपनों की पूर्ति ही बालक का व्यक्तित्व है और उसकी पूर्ति निर्भर है अभिभावकों अथवा उनके माता-पिता पर।बालक के व्यक्तित्व का निर्माण माता-पिता के पारस्परिक सम्बन्ध तथा बालक के प्रति स्नेह प्रदर्शन से लेकर स्कूली शिक्षा तथा उन बाल-पुस्तकों पर निर्भर करता है, जिन्हें वह पढ़ता है। माता-पिता जहां स्नेह की मूर्ति होते हैं वहीं शिक्षक भी होते हैं।वे बालकों को प्रत्यक्ष शिक्षा देते हैं।
        बालक के विकास के दो प्रमुख पहलू हैं--शारीरिक और मानसिक।मानसिक विकास शारीरिक विकास से अधिक महत्वपूर्ण है।किन्तु शारीरिक विकास भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। बालक का शारीरिक विकास उसके उचित पोषण, खेल-कूद, खुले वातावरण तथा चिकित्सा पर निर्भर है।स्वस्थ रहने के लिए जहां बच्चे को उचित पोषण देना, स्वस्थ वातावरण में रखना आवश्यक है वहीं उसके लिए खेल-कूद भी जरूरी है।खेल-कूद से बालक में संयम तथा उत्तरदायित्व की भावना बढ़ती है। गांधी जी भी बच्चों के खेल-कूद पर बड़ा बल देते थे। उन्होंने एक लेख में लिखा था।‘‘बच्चों के लिए खेलना जरूरी है।खेल-कूद से अधिक श्रम और संयम से काम करने का बल मिलता है।
             बच्चों के मानसिक विकास की समस्या अधिक पेचीदी है।इसकी व्यवस्था का उत्तरदायित्व बड़े लोगों, अभिभावकों या माता-पिता, परिवार तथा समाज पर होता है। बालक के भावी सामाजिक जीवन की नींव छोटी-छोटी घटनाओं से पड़ती है।परिवार में बालक सामाजिक मूल्यों के प्रति आस्था भी सीखता है और अनास्था भी।अतः अच्छा नागरिक बनने के लिए यह आवश्यक है कि बालक स्वस्थ समाज में ही बड़ा हो।
         यदि बालक को स्नेह, सौहार्द्र, त्याग एवं बलिदान की शिक्षा दी जाय, तो वह योग्य नागरिक, कर्मठ कार्यकर्ता तथा निष्काम समाजसेवी बन सकता है।विकास की प्रक्रिया उसी क्षण से आरम्भ हो जाती है जब शिशु धरती पर आंखें खोलता है।नेहरू जी का भी विचार था कि बालक में विशिष्ट गुणों का समावेश समाज को स्वयं सुन्दर बना सकता है।
    समाज देश के उत्थान की मुख्य इकाई है।यदि हम देश का कल्याण चाहते हैं तो हमें स्वस्थ समाज की रचाना करनी होगी और वह तभी सम्भव होगा जब हम आज से ही इन नन्हें-मुन्ने बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने के लिए पूरी तरह से जुट जाएं। इस कार्य को पूरा करने के लिए मां-बाप, परिवार, समाज तथा शासन सभी का सहयोग मिलेगा तभी इसका फल प्राप्त होगा।
         बच्चों को चाहिए कि वह अपने प्रिय चाचा नेहरू के आदर्शों का पालन कर अच्छे नागरिक बनें और देश की, समाज की सेवा करें।तथा अपने जीवन में कुछ ऐसे महान कार्य करें जिससे उनके तथा हम सबके प्यारे भारत देश का मस्तक गर्व से और ऊंचा हो जाय। नेहरू जी को बच्चों पर बड़ा भरोसा था। एक बार उन्होंने कहा था, ‘‘प्यारे बच्चों ! लो यह सबसे बड़ा तोहफा मैं तुम्हें देता हूं-- हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक का हिन्दुस्तान--इसे सम्भालों। इस तोहफे की हर बच्चे को जी जान से रखवाली करने है तथा अपने आचरण और कार्य कलापों से अपने चाचा नेहरू के उस स्वर्णिम भारत के स्वप्न को पूरा करना है जिसके लिए वे जीवन भर लड़ते रहे।
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ड़ा0हेमन्त कुमार

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

हमारा प्यारा गांव

   छोटे छोटे बच्चों द्वारा अपने गांव को आदर्श गांव बनाने की कहानी

                                                   

                                                                             


सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

नन्हें चित्रकार

नन्हें बच्चों की अपनी दुनिया होती है।उनकी अपनी कल्पनाएं होती हैं।उनकी अपनी सोच होती है और किसी चीज को देखने परखने का नजरिया भी एकदम अनोखा होता है।जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। आज मैं यहां ऐसे ही कुछ नन्हें मुन्ने चित्रकारों के खुद के बनाए चित्रों को प्रदर्शित कर रहा हूं।जरा आप भी देखिये इन चित्रों में इन बच्चों ने अपनी किन कल्पनाओं को रंगों के माध्यम से साकार किया है।



चित्रकार- 
       
धान्या यादव
कक्षा-नर्सरी
सेण्ट डोमिनिक सेवियो कालेज
लखनऊ


चित्रकार
       
चैतन्य शर्मा।
इनकी उम्र मात्र 6 साल है।राजस्थान में इनका घर है।चित्र बनाना इनका प्रिय शौक है।इनका अपना एक ब्लाग भी हैचैतन्य का कोना।जिसे आप इस लिंक पर देख पढ़ सकते हैं।-- http://chaitanyakakona.blogspot.com



चित्रकार-
       
मौलिक यादव
कक्षा-2 ए
सेण्ट डोमिनिक सेवियो कालेज
लखनऊ













चित्रकार-
       
खुशबू
कक्षा-4
सरोज शिक्षा मान्टेसरी स्कूल
लखनऊ





गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

कीड़े खाने वाले पौधे

        आप ये तो जानते ही होंगे कि पेड़-पौधों का भोजन पानी और खाद है।लेकिन क्या आपको पता है कि कुछ पेड़-पौधे इन्सेक्ट्स ईटिंग प्लांट्स (कीटभक्षी) भी होते हैं।यानि मिट्टी में पनप रहे कीडे-मकोड़ों को अपना आहार बनाते हैं।
      दरअसल ये पौधे दलदली जमीन पर उगते हैं।दलदली जमीन पर नाइट्रोजन बहुत कम मात्रा में पाई जाती है इसलिये मिट्टी से पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन न मिल पाने के कारण ये पौधे अपने लिये प्रोटीन नहीं बना पाते।यही कारण है कि यह अपना भोजन कीड़े-मकोड़ों को बनाते हैं।
       
फ़्लाईट्रैप(चित्र-गूगल से साभार)
विश्व में कीड़े खाने वाले पौधों की लगभग 400 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं।
वीनस या फ़्लाईट्रैप प्रजाति के कीटभक्षी पौधों का भोजन करने का अंदाज़ काफ़ी दिलचस्प होता है। वीनस की ऊपरी सतह पर छोटे-छोटे बाल उगे होते हैं, जैसे ही कोई कीड़ा इन पौधों की पत्तियों के बालों से छू जाता है, वैसे ही पत्ती किताब की तरह बंद हो जाती है।कुछ ही सेकेंड्स में कीड़े का दम घुट जाता है।जानते हो यह पौधा कीड़े को पचाता कैसे है?जब कीड़ा पत्ती के अंदर बंद हो जाता है,उसी समय पत्ती की ऊपरी सतह में मौजूद ग्लैंड्स (ग्रंथियां) कीड़े के मुलायम हिस्से को पचा लेती हैं।इस पूरे काम में सिर्फ़ एक सेकेंड लगता है। एक सेकेंड के बाद ही पत्ती खुल जाती है और कीड़े मृत शरीर को नीचे फ़ेंक देती है।
           
ड्रासेरा(चित्र-गूगल से साभार)
सनड्यू
या ड्रासेरा भी इसी तरह का पौधा होता है,जिसकी लंबाई आठ से बीस सेंटीमीटर तक होती है।इस कीटभक्षी पौधे की पत्तियों से चिपचिपा पदार्थ निकलता रहता है।यह पदार्थ ओस की तरह दिखता है,जिसमें से बहुत तेज़ महक निकलती है।इस महक से कई कीट-पतंगे पौधे की ओर खिंचे चले आते हैं। लेकिन पत्ती पर बैठते ही कीट-पतंगे उसमें चिपक जाते हैं।उसी समय पौधे में निकले रोएं कीड़ों को अपनी चपेट में ले लेते हैं।इस चिपचिपे पदार्थ में एंजाइम होते हैं,जो कीड़े के शरीर से नाइट्रोजन सोख लेते है। कीड़े के शरीर से रस चूसने के बाद पत्तियों के रोएं फ़िर से सीधे हो जाते हैं और मरा हुआ कीड़ा नीचे गिर जाता है।
            
रैफ़्लेशिया(चित्र-गूगल से साभार)
इन कीड़े खाने वाले पौधों के अलावा भी
अमरबेल, रैफ़लेशिया जैसे परजीवी पौधे भी हैं,जो दूसरे पेड़-पौधों के सहारे अपना भोजन तैयार करते हैं। ये पौधे लताओं की शक्ल में होते हैं। ये जिस पेड़ या पौधे पर बेल कि तरह चढ़े होते हैं उसी के शरीर से पोषक तत्व खींचकर अपना काम चलाते हैं। धीरे-धीरे वह पौधा सूखता जाता है और परजीवी पौधा या बेल हरा-भरा होता जाता है।

                       ***

रविवार, 21 सितंबर 2014

अखबार पढ़ा जब मुर्गे जी ने---।

मुर्गे जी को मिला कहीं से
अखबार पुराना एक
खबर सुनाकर सबको भैया
काम करूं मैं नेक।

खोज रहा खबरों में मुर्गा
जंगल पर्वत नदी की बातें
पर इनकी ना खबर थी कोई
ना ही फोटो छपी थी एक।



खबरें थीं बस लूट पाट की
चोरी झूठ फ़रेब की
दुनिया के हर कोने में बस
दुर्घाटनाएं हुयीं अनेक।

खबरें पढ़ गुस्साया मुर्गा
अखबार दिया फ़िर फ़ेंक
हवा में गर्दन ऊंची करके
बांग लगाई एक।
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डा0हेमन्त कुमार


रविवार, 14 सितंबर 2014

विज्ञान लेख--चींटियां सिखाती हैं सहयोग और काम के प्रति लगन---।

(चित्र-गूगल से साभार)
      अपने घरों की रसोई में छोटी छोटी लाल या काली चींटियों की लम्बी लम्बी कतारें तो आपने देखी  ही होंगी।कैसा एक दूसरे के पीछे एक लाइन बना कर चलती हैं।कभी ये अपने खाने की खोज में रहती हैं तो कभी नए घर की तलाश में।क्या आपने कभी इन नन्हीं चींटियों के जीवन के बारे में सोचा है।क्यों ये एक दूसरे के पीछे ही चलती हैं?कभी इनकी कतार को छेड़ दो तो ये सब एक ही दिशा में भागती हैं?क्योंकि इनके अंदर आपस में एक दूसरे का सहयोग करने के साथ ही अपने काम को पूरी जिम्मेदारी से पूरा करने की जबर्दस्त भावना होती है।आइये हम इन नन्हीं चींटियों के जीवन के बारे में विस्तार से जानते हैं।
(चित्र-गूगल से साभार)
0प्रजातियां : हमारी पूरी धरती पर चींटियों की लगभग 11,000प्रजातियां मिलती हैं।ये धरती के हर कोने में मौजूद हैं इनकी कुछ मुख्य प्रजातियों के नाम हैं-आर्मी ऐण्ट्स,ड्राइवर ऐण्ट्स ये दक्षिणी अमेरिका और अफ़्रीका में ज्यादा पाई जाती हैं।हार्वेस्टर चींटियां रेगिस्तानों में ज्यादा पाई जाती हैं।इनका मुख्य भोजन बीज है।एफ़िड टेण्डिंग चींटियां छोटे छोटे कीड़ों से एक रस निकाल कर खाती हैं।स्लेव मेकर चींटियां दूसरी जाति की चींटियों के बच्चों को उठा ले जाती हैं।इन बच्चों को पालकर इनसे वो अपने सारे काम करवाती हैं।चींटियों की एक और प्रजाति प्रसिद्ध है—“हनीपाट वर्कर।ये अपने शरीर में पौधों का मीठा रस इकट्ठा करके अपनी बस्ती की सारी चींटियों को खिलाती हैं।
0सबके काम अलग-अलग:जैसे तुम्हारे स्कूल में हर व्यक्ति का काम अलग अलग बंटा है उसी तरह चींटियों की बस्तियों में भी सभी के काम बंटे हुये होते हैं।इनकी हर बस्ती में तीन तरह की चींटियां रहती हैं।
0मजदूर चींटियां:मजदूर चींटियों के जिम्मे थोड़ा ज्यादा काम रहते हैं।ये बिल बनाने,छोटे बच्चों को पालने,खाना इकट्ठा करने और बिल को साफ़ सुथरा रखने का काम करती हैं।
0रानी चींटियां:इनका काम सिर्फ़ अंडे देना और बच्चे पैदा करना रहता है।ये और कोई दूसरा काम नहीं करती हैं।
0पुरुष चींटियां:ये रानी चींटियों को गर्भवती बनाते हैं और कुछ समय बाद मर जाते हैं।
     
(चित्र-गूगल से साभार)
0तरह तरह के घर:इन चींटियों की बस्ती में ज्यादातर काम बिल के अंदर ही होते हैं।इनमें भी हर प्रजाति के बिल बनाने के तरीके अलग होते हैं।कुछ जमीन के नीचे मिट्टी में बिल बनाती हैं।कुछ जमीन की सतह के ऊपर मिट्टी के ढूहों पर बांबी बना कर उसमें रहती हैं।कुछ अपना बिल पेड़ों के कोटरों में तो कुछ चट्टानों के बीच अपना बिल बनाती हैं।दुनिया में ऐसी भी चींटियां हैं जिनका अपना कोई घर नहीं होता।
0 चींटियों का शरीर:इतनी नन्हीं चींटियों के शरीर की बनावट तो सामान्य आंख से नहीं दिखाई देगी।किसी माइक्रोस्कोप से देखकर ही उसके शरीर की बनावट को समझ जा सकता है।
 
(चित्र-गूगल से साभार)
इनके छः तो नन्हें नन्हें पैर होते हैं।तुम्हें जान कर आश्चर्य होगा दुनिया की सबसे छोटी चींटी की लम्बाई कुल 0.7होती है।जबकि सबसे बड़ी की लंबाई 1इंच तक होती है।इनके शरीर के बीच एक बहुत पतली कमर होती है।जमीन के नीचे बिलों में जाते समय चींटियां अपने शरीर को इसी पतली कमर से मोड़ लेती हैं।पुरुष और रानी चींटियों के पंख भी होते हैं।कुछ जातियों की मजदूर चींटियों के शरीर पर नुकीले रोएं होते हैं।इनसे वो दुश्मनों से लड़ती भी हैं।
           इनके मुंह के भीतर तीन हिस्से होते हैं।इनका जबड़ा सबसे काम का होता है।इसे ये हर तरफ़ घुमा लेती हैं।ये अपने जबड़ों का इस्तेमाल खोदने,खाना इकट्ठा करने,बिल बनाने,दुश्मनों से लड़ने और काटने में कर सकती हैं।ये अपने छोटे जबड़े से चबाती हैं।और नन्हीं सी जीभ से तरल पदार्थ पीती हैं।कुछ चींटियों की दो और कुछ की एक आंख होती है।कुछ अंधी भी होती हैं।इनके कान तो नहीं होते पर वो अपने आस पास होने वाले कंपनों से आवाज का पता लगा लेती हैं।शायद आपको जान कर आश्चर्य होगा कि हमारी तरह ये आपस में बातें भी करती हैं।चींटियों की सबसे खास बात ये है कि वो बोल तो नहीं सकतीं पर एक दूसरे को छू कर,शरीर से गंध छोड़ कर,जमीन में कंपन पैदा करके भी एक दूसरे तक अपनी बातें पहुंचाती हैं।
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डा0हेमन्त कुमार

सोमवार, 1 सितंबर 2014

घायल हुये शिकारी


जंगल  में जैसे ही पहुंचे,
मोटे कई शिकारी,
सभी जानवर भागे फ़ौरन
आया संकट भारी।

कोई भागा गुफ़ा में अपनी
कोई नदी में कूदा
पर भालू सियार ने मिलकर
तरकीब निकाली न्यारी।

दोनों ने पत्थर फ़ेंके फ़िर
मधु मक्खी के छ्त्तों में
भन भन करती टूट पड़ीं सब
जिधर  छुपे थे शिकारी।


कुछ के चेहरों पर था काटा
किसी के डंक चुभोया
चीख चीख कर वापस भागे
घायल सभी शिकारी।
0000
हेमन्त कुमार

रविवार, 17 अगस्त 2014

धूर्त भेडि़या

                     
आज से सैकड़ों साल पहले विन्ध्याचल की पहाडि़यों से घिरा हुआ एक अत्यन्त मनोरम जंगल था। उस जंगल में सभी पशु-पक्षी चैन से रहते थे। क्योंकि वहां का राजा सिंह और उसका मन्त्री बन्दर दोनों ही बहुत न्यायप्रिय और प्रजापालक थे। राजा सिंह सदैव प्रजा के कष्टों को दूर करने के लिए तत्पर रहता था। इसीलिए वहां की प्रजा को किसी प्रकार का दुःख नहीं था और सब सुख-चैन की वंशी बजाते थे।

      जंगल के एक छोर पर एक सुन्दर झरना था। उसका पानी बड़ा मीठा था। जंगल के सभी पशु-पक्षी वहीं पानी पीते थे। उसी झरने के पास एक धूर्त भेडि़या रहता था। वह जंगल में रहने वाले सभी पशु-पक्षियों को हमेशा परेशान किया करता था। जंगल में कोई उत्सव होता अथवा किसी भी प्रकार का अच्छा कार्य होता तो वह सदैव उसमें विघ्न उत्पन्न करता था। उससे सभी पशु-पक्षी परेशान थे। कई बार सिंहराज के दरबार में फरियाद भी की गई, परन्तु कोई असर नहीं हुआ। भेडि़या धूर्त होने के साथ ही बहुत चालाक भी था। वह अपराध करते हुए कभी भी रंगे हाथ नहीं पकड़ा गया। तब सिंहराज ने सभी पशु-पक्षियों को सान्त्वना दी कि समय आने पर इसे उचित दण्ड दिया जाएगा।
          कुछ दिनों बाद ही पूरे जंगल भर में सूखा पड़ गया। एक ओर गर्मी का महीना, ऊपर से वह सूखा। अब झरने का पानी भी धीरे-धीरे सूखने लगा था। कुछ दिनों बाद झरने का पानी एकदम सूख गया। जंगल के पशु-पक्षी प्यासे मरने लगे। पूरे जंगल में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई थी। जंगल में सभी परेशान हो उठे थे।अन्त में सिंहराज ने एक दिन जंगलवासियों की एक सभा बुलाई। जंगल में डुग्गी पीट दी गई कि इस सभा में सभी का आना आवश्यक है।
          दूसरे दिन पूरा दरबार खचाखच भरा हुआ था, कहीं भी तिल रखने की जगह नहीं थी। सिंहराज के लिए एक ऊंचा सिंहासन बना था। उसके नीचे प्रधान मन्त्री बन्दर का स्थान था। उसके बाद अन्य मन्त्रियों तथा सभी प्रजाजनों का। सभी जानवर आ चुके थे और बड़ी उत्सुकता से सिंहराज तथा मन्त्री बन्दर के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। थोड़ी ही देर में सभाभवन के द्वार पर खड़े द्वारपाल कुत्ता प्रसाद ने ऐलान किया--‘‘महाराजधिराज ‘‘ सिंहराज पधार रहे हैं ..सभी लोग सावधानी से बैठ गये।
          जैसे ही सिंहराज पधारे सभी पशु-पक्षी उनके सम्मान में खड़े हो गये। सिंहराज बैठ गये तथा उन्होंने सभी को बैठने का संकेत किया। सिंहराज के चेहरे पर छायी हुई चिन्ता की रेखाएं साफ झलक रही थीं। बैठने के बाद सिंहराज ने एक बार उत्पन्न गम्भीर दृष्टि से पूरे दरबार में नजर दौड़ाई। इसके बाद सिंहराज ने एक गम्भीर गर्जना की जिससे सारा जंगल कांप उठा।
          सिंहराज ने कहना आरम्भ किया--‘‘इस जंगल के सभी प्रजागण तथा मन्त्रीगण ! आप जैसा देख रहे हैं कि इस समय चारों ओर अकाल का भीषण प्रकोप है तथा सारे जंगल के पशु-पक्षी उससे परेशान हैं। मुझे यह भी पता लगा है कि जिस झरने से हमस ब जल लेते थे वह भी सूख गया है। अब आप लोग भी अत्यन्त परेशान हैं। मैंने यह समस्या इस जंगल के प्रसिद्ध इंजीनियर नन्हें चीता के सामने रखी थी जो कि अभी पिछले दिनों ही अफ्रीका के जंगलों से इंजीनियरिंग का विशेष अध्ययन करके लौटे हैं। काफी सोच-विचार के बाद वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यदि जंगल के सभी लोग मिलकर सभा भवन के द्वार पर एक कुआं खोद लें तो उससे अच्छी जल की व्यवस्था और कोई नहीं होगी। क्योंकि सभा भवन जंगल के बीचों-बीच स्थित है। यहां से जल ले जाने में सभी को सुविधा रहेगी। यही बात कहने के लिए मैंने आज की यह सभा बुलाई है। मैं यह जानना चाहूंगा कि क्या आप लोग नन्हें चीता की इस योजना से सहमत हैं ? क्या आप लोग उन्हें इस कार्य में सहयोग देंगे ?”
          महाराज सिंह के चुप होते ही सारे जानवर बोल पड़े --‘‘हां, हम लोग इस योजना से सहमत हैं और हम लोग उन्हें पूरी-पूरी सहायता देंगे। सिंहराज ने यह सुनकर कहा, --‘‘आप लोग इस कार्य में सहयोग देंगे, यह जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। मेरा विचार है कि इस शुभ कार्य में देर नहीं करनी चाहिए। कल से ही यह कार्य आरम्भ कर दिया जाय। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आज की यह सभा समाप्त करता हूं।यह कहकर सिंहराज सभा भवन से निकलकर मन्त्रियों के साथ चले गये। उनके जाने के बाद के बाद सभी पशु-पक्षी भी अपने-अपने घर चले गये।
          दूसरे दिन से इंजीनियर नन्हें चीता की देख-रेख में कुए की खुदाई शुरू हो गई। थोड़ी-थोड़ी देर पर खोदने वाले बदल दिए जाते थे। शाम तक सभी लोगों ने मिलकर करीब दस फुट गहरा गड्ढा खोद लिया। इसके बाद दूसरे दिन आने का निश्चय करके सब अपने-अपने निवास में चले गये।
          अगले दिन जब सब लोग वहां पहुंचे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, क्योंकि उन लोगों ने जितना गड्ढा खोदा था वह किसी ने पाट दिया था। किसी की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि यह काम किसने किया। खैर, उस दिन फिर मेहनत करके उन लोगों ने गड्ढा खोदा। परन्तु जब वे तीसरे दिन वहां आए तो फिर उस गड्ढे में मिट्टी भरी हुई थी। इसी तरह प्रतिदिन होने लगा।
          परेशान होकर सभी पशु-पक्षियों ने एक सभा की और उसमें निश्चय किया कि दो लोग मिलकर रात में गड्ढे के पास पहरा देंगें। सबसे पहले दिन खरगोश और हिरन को पहरा देना था। दोनों शाम होते ही अपने-अपने घरों से खाना खाकर सभा-भवन के पास पहुंच गये। दोनों वहीं टहलते हुए आपस में बात करने लगे। बात करते-करते जब काफी रात हो गयी तो दोनों वहीं सभा-भवन के द्वार पर बैठ गये। उनको बैठे हुए अभी थोड़ी ही देर हुई होगी कि उन्हें तरह-तरह की भयानक आवाजें सुनाई पड़ने लगीं। दोनों ने ही इधर-उधर देखा कहीं कुछ नहीं था।
          थोड़ी देर बाद फिर उसी तरह की आवाजें आने लगीं। इस बार जब दोनों ने सामने देखा तो चीख पड़े। उन्हें उस गड्ढे के पास एक सफेद काली छाया हिलती हुई दिखलाई पड़ी जो उन्हीं की तरफ बढ़ रही थी। दोनों भूत-भूत चिल्लाते हुए भाग निकले।

          दूसरे दिन सुबह जब सभी पशु-पक्षी गड्ढे के पास पहुंचे तो गड्ढा फिर पटा हुआ था। खरगोश और हिरन से पूछा गया तो रात की पूरी घटना उन्होंने बता दी। उस घटना को सुनकर किसी भी जानवर को उस पर विश्वास नहीं हो रहा था। तभी भेडि़या बोला, ‘‘अरे मैंने तो पहले ही मना किया था कि वहां पर कुआं मत खोदो। वहां पर तो भूतों का राजा रहता है। भेडि़ये की यह बात सुनकर सभी जानवर डर गये । तब गधे ने कहा, ‘‘अच्छा आज हम और घोड़ा भाई पहरा देंगे। देखते हैं कौन आता है। उस दिन घोड़ा तथा गधा पहरा देने गये। रात में इन लोगों के साथ भी वही घटना घटी। भूत को देखते ही दोनों डर का भाग गये।
          अगले दिन जंगल के सभी जानवर भयभीत होकर सिंहराज के पास पहुंचे और उन्होंने अपनी समस्या उनको बतायी। सिंहराज ने काफी सोच-विचार के यह मामला जंगल के गुप्तचर विभाग की चीफ चुलबुल लोमड़ी को सौंपा। चुलबुल लोमड़ी रात को अकेले ही कुएं के पास गई। रात में जब भूत निकला तो पहले वह डर गयी। फिर ध्यान से देखने पर उसने पहचान लिया। यह तो झरने के पास वाला धूर्त भेडि़या था। वह उस समय चुपचाप उठकर चली गयी।
          दूसरे दिन रात में वह जंगल के पुलिस कप्तान शेरू कुत्ते तथा पुलिस के चार जवानों को लेकर वहां पहुंची। रात में जैसे ही भूत के वेश में भेडि़या निकला चुलबुल लोमड़ी ने तुरन्त पुलिस कप्तान शेरू कुत्ते तथा उसके पुलिस के जवानों को इशारा किया। उन लोगों ने दौड़कर भेडि़ये को दबोच लिया और जंजीरों से बांध दिया।    
          रात किसी तरह व्यतीत हुई। सुबह चुलबुल लोमड़ी तथा पुलिस कप्तान शेरू उस भेडि़ए को लेकर सिंहराज के दरबार में पहुंचे और सिंहराज को बताया कि यी प्रतिदिन भूत बनकर लोगों को डराता था और यही गड्ढे में मिट्टी भर देता था। अब इसे जो चाहें सजा दें।
         सिंहराज ने उस भेडि़ए  की नाक-कान कटवाकर और उसके मुंह में कालिख लगवा कर पूरे जंगल में घुमाया और उसको सभी जानवरों ने मिलकर जंगल से बाहर खदेड़ दिया। इसके बाद सभा-भवन के द्वार पर एक बहुत ही सुन्दर कुआं बना और जंगल के सभी पशु-पक्षी सुख-पूर्वक रहने लगे।
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डा0हेमन्त कुमार