शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

देश बचाना है हमको---।

पढ़ लिख के मूंछों की रौनक
नहीं बढ़ाना है मुझको
खादी के कपड़ों पे धब्बे
नहीं लगाना है मुझको
पढ़ लिख के मूंछों की रौनक
नहीं बढ़ाना है मुझको।

आतंकी हमलों पर तो अब
रोक लगाना है मुझको
देश को देखें तिरछी नजरें
सबक सिखाना है उनको
पढ़ लिख के मूंछों की रौनक
नहीं बढ़ाना है मुझको।

कलम किताबों संग हाथो में
बन्दूक उठाना है हमको
देश को भीतर बाहर से
मजबूत बनाना है हमको।
पढ़ लिख के मूंछों की रौनक
नहीं बढ़ाना है मुझको।
000
डा0हेमन्त कुमार




3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16-08-2015) को "मेरा प्यार है मेरा वतन" (चर्चा अंक-2069) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    स्वतन्त्रतादिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार...

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  3. सुंदर प्रस्तुति. सलाम देश के रक्षकों को.

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