गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

कुहरे में—।

कुहरे में जब सोया रहता
पूरा शहर हमारा
कोई कम्बल ओढ़े रहता
किसी को हीटर प्यारा।

ऐसी ठण्ढक में भी रखते
कुछ लोग ध्यान हमारा
मीलों सायकिल चला के लाते
अखबार हमारा प्यारा।

अलसाए हम सोते रहते
वो करते काम हमारा
चौका बर्तन करती काकी
गुदड़ी का उन्हें सहारा।


हाड़ कंपाते जाड़े में भी
भैया जी रिक्शा ले आते
क्या सोना उनको पसन्द नही
या फ़िर कुहरा उनसे हारा।
000

डा0हेमन्त कुमार

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (19-12-2015) को "सुबह का इंतज़ार" (चर्चा अंक-2195) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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