सोमवार, 27 मई 2013

उफ़्फ़ ये गर्मी----।


सूरज ने बरसायी आग
सूख गये सब ताल-तालाब
पेड़-पौधे मुरझाए सारे
सूख गये फ़ूलों के बाग।

पानी का पड़ गया अकाल
दुनिया में हो रहा बवाल
चहूं ओर सूरज का राज
कहां छिप गये मेघराज।

नदियां सारी सूख गयीं
क्यों वर्षा रानी रूठ गयीं
बच्चे बूढ़े सब हैरान
सूरज की बढ़ रही है शान।

सूरज दादा अब रुक जाओ
इतनी आग ना अब बरसाओ
इस गर्मी को अब ना बढ़ाओ
प्यासों को ना अब तड़पाओ।

मांग रही मै माफ़ी तुमसे
पूरे जग की ओर से
जगह जगह पे वृक्षारोपण
करेंगे पूरे जोर से।

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नित्या शेफ़ाली
कक्षा-10-सी,सेण्ट डोमिनिक सेविओ कालेज
इन्दिरानगर,लखनऊ--226016

1 टिप्पणी:

  1. वाह कविता में अच्छी सीख दी है. प्रेरणादायी कविता.

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