गुरुवार, 22 जनवरी 2015

आलस्य का फल

           
(चित्र-श्री राजीव मिश्र)
बहुत दिनों पहले की बात है जौनपुर जिले के पास एक छोटा सा गांव था परसरामपुर। इस गांव की आबादी बहुत कम थी। कुल आठ-दस परिवार पूरे गांव में रहे होंगे। इस गांव की मिट्टी उपजाऊ नहीं थी।इसीलिए गांव के लोग मजदूरी
, लुहारी, बढ़ईगीरी आदि अलग-अलग तरह के काम करके अपनी जीविका चलाते थे।
            इसी गांव में रघुनाथ नाम का एक बढ़ई रहता था। रघुनाथ का परिवार बहुत छोटा था। उसके परिवार में केवल उसकी पत्नी और उसका लड़का गोविन्द था।गोविन्द बहुत आलसी स्वभाव का था।वह दिन भर घर में बैठा रहता था कभी कोई काम नहीं करता था।इसी से रघुनाथ और उसकी पत्नी दोनों ही गोविन्द से नाराज रहते थे।रघुनाथ जंगल से लकड़ियां ले आता और उनसे छोटे-छोटे खिलौने बना कर बाजार में बेचने ले जाता।
                        एक दिन रघुनाथ की तबियत कुछ खराब थी। उसकी बाजार जाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी।इसलिए उसने गोविन्द को अपने पास बुलाया और उससे कहा,‘‘अरे गोविन्द! आज मेरी तबियत कुछ खराब है।मैं बाजार नहीं जा पाऊंगा। ऐसा कर कि तू ही बाजार चला जा और ये खिलौने बेचकर चला आ।रघुनाथ की बात सुनकर पहले तो गोविन्द बहुत आनाकानी करता रहा फिर जब रघुनाथ और उसकी पत्नी दोनों ने उसे डांटा तो वह किसी तरह बाजार जाने को तैयार हो गया।
                        गोविन्द जब लकड़ी के सारे खिलौने लेकर बाजार जाने लगा तो रघुनाथ ने उसे पास बुलाकर कहा,‘‘देखो बेटा गोविन्द अब तुम काफी बड़े और समझदार हो गये हो। आज मेरी तबियत खराब है इसलिए मैं तुम्हें बाजार भेज रहा हूं।तुम मेरी दो बातों का ध्यान रखना। पहली बात तो यह कि रास्ते में कहीं पर सोना मत।दूसरी बात यह कि तुम बाजार में किसी अनजान आदमी पर विश्वास करके उसका साथ मत करना।मेरी इन दो बातों का ध्यान रखोगे तो तुम अपने काम में जरूर सफल होगे।
                        गोविन्द ने उस समय तो रघुनाथ की दोनों बातों को बड़े ध्यान से सुन लिया लेकिन घर से निकलते ही वह उन बातों को भूल गया और बहुत आराम से धीरे-धीरे बाजार की तरफ बढ़ने लगा।
                        बाजार परसरामपुर गांव से करीब चार मील दूर था।रास्ते में एक बहुत घना आम का बगीचा भी पड़ता था।परसरामपुर से बाजार जाने वाले लोग बाजार जाते तथा लौटते समय उसी बगीचे में कुछ देर आराम करके तब आगे जाते थे।इसलिए हमेशा वहां पर दस बीस आदमी जरूर ठहरे रहते थे।
                        लेकिन उस बगीचे में ठहरने वालों को एक परेशानी होती थी।उस आम के बगीचे में बन्दर बहुत रहते थे जो जहां पर ठहरने वाले यात्रियों को काफी परेशान करते थे। बन्दर कभी किसी आदमी का खाना उठाकर भाग जाते, कभी किसी आदमी का कपड़ा या और दूसरा सामान लेकर भाग जाते।इसलिए उस बगीचे में ठहरने वाले लोग बड़े सावधान होकर आराम करते थे और प्रायः सोते नहीं थे।बस वहां कुछ देर आराम करके आगे बढ़ जाते थे।
                        गोविन्द भी पैदल चलते-चलते करीब एक घण्टे बाद उसी बगीचे में पहुंचा। बगीचे में पहुंचकर पहले उसने कुएं से पानी लेकर हाथ मुंह धोया फिर घर से लाया हुआ खाना वगैरह खाकर आराम से लेट गया।लेटते ही गोविन्द को नींद आने लगी।उसने सोचा कि क्यों न थोड़ी देर सो लिया जाय ? उसके बाद उठकर थोड़ा तेज चलकर मैं बाजार पहुंच जाऊंगा।बन्दरों से बचने के लिए उसने खिलौने की पोटली अपने सिरहाने रख लिया।गोविन्द तो आलसी था ही।थोड़ी ही देर में वह खर्राटे भरकर सोने लगा।
                        जब गोविन्द खाना खा रहा था उसी समय से आम के पेड़ पर बैठा मोटा बन्दर बड़े ध्यान से उसकी खिलौने की पोटली देख रहा था।उसने सोचा कि जरूर इस पोटली में भी कुछ खाने की चीज होगी।जब गोविन्द सो गया तो वह मोटा बन्दर धीरे से नीचे उतरा और गोविन्द के सिर के नीचे से खिलौने की पोटली लेकर बड़ी तेजी से भागा।मगर गोविन्द तो ठहरा आलसी उसकी नींद सिर के नीचे से पोटली निकल जाने पर भी नहीं खुली।परन्तु वहीं पर आराम कर रहे दूसरे कुछ लोगों ने बन्दर को पोटली ले जाते देख लिया।उन्होंने जल्दी से गोविन्द को हिला कर जगाया और उसे बताया कि उसकी पोटली बन्दर लेकर भागा जा रहा है।अब गोविन्द को होश आया।वह जल्दी से दूसरे लोगों के साथ बन्दर के पीछे लाठी लेकर दौड़ा।लेकिन बन्दर जल्दी से उछल कर पेड़ पर चढ़ गया और आराम से एक डाल पर बैठ गया।गोविन्द खड़ा देखता रहा।
           
(चित्र-राजीव मिश्र)
पेड़ पर बैठे बन्दर को जब पोटली खोलने पर उसमें खाने की कोई चीज नहीं मिली तो वह पोटली के सारे खिलौने उठा-उठा कर फेंकने लगा।कुछ खिलौने जमीन पर गिर कर टूट गये कुछ साबित बच गये।गोविन्द पेड़ के नीचे खड़ा रो रहा था।उसने जब बन्दर को खिलौने फेंकते देखा तो उसे थोड़ा सन्तोष हुआ कि चलो जो साबित खिलौने बचे हैं उन्हें ही बेचकर कुछ पैसा मिल जाएगा।बगीचे में ठहरे आदमियों की सहायता से उसने अपने टूटे तथा साबित दोनों तरह के खिलौनों को इकठ्ठा किया और बेचने के लिए बाजार चला गया।
                        गोविन्द जब खिलौने लेकर बाजार पहुंचा तो उसे काफी देर हो चुकी थी। बाजार में सभी दुकानदारों के सामान बिक चुके थे तथा वे सभी वापस जाने की तैयारी कर रहे थे।गांव से जो लोग सामान खरीदने आए थे वे भी अब वापस जाने की तैयारी कर रहे थे। गोविन्द अपने खिलौने सड़क पर सजाकर करीब एक घन्टे तक बैठा रहा परन्तु उसका कोई भी खिलौना नहीं बिका।गोविन्द को बहुत पछतावा हो रहा था कि बेकार ही बगीचे में सो गया था।अगर वह बगीचे में न सोया होता तो शायद उसका इतना नुकसान भी न होता और उसके सारे खिलौने भी बिक जाते।
                        अभी गोविन्द बैठा यह सोच ही रहा था कि घर चलकर वह अपने पिता को क्या जवाब देगा कि अचानक उसने एक मोटे आदमी को अपनी तरफ आते देखा।मोटा आदमी एक लुंगी और कुर्ता पहने हुए था।उसकी बड़ी-बड़ी मूंछें थीं और देखने में वह कोई बदमाश किस्म का आदमी लगता था।गोविन्द ने उसे अपनी तरफ आते देखा तो डर गया उसने सोचा कहीं ऐसा न हो कि यह आदमी मेरे खिलौने छीन ले।गोविन्द के पास आकर उस आदमी ने बहुत प्यार भरी आवाज में उसे पूछा,‘‘ क्यों बेटा।तुम्हारा अभी एक भी खिलौना नहीं बिक पाया ?
                        उसको इस तरह प्यार से बोलते देखकर गोविन्द को बड़ा आश्चर्य हुआ।उसने तो समझा था कि यह आदमी बड़ा बदमाश होगा।परन्तु यह तो बहुत सीधा आदमी लगता है। गोविन्द ने कहा, ‘‘नहीं बाबू जी।अभी तक मेरा कोई खिलौना नहीं बिका।
                        ‘‘इस पर वह आदमी बोला,ओहो..... बेटा! तब तुम्हें बड़ा दुःख होगा।तुम इतनी मेहनत से बनाकर खिलौने लाए पर अभी तक तुम्हारा एक भी खिलौना नहीं बिक सका। उस आदमी की बात सुनकर गोविन्द की आंखों में आंसू भर आए।वह धीरे-धीरे रोने लगा और मोटे आदमी से उसने जब तक घटी सभी घटनाएं बता दीं।
                        गोविन्द की बात सुनकर मोटे आदमी ने कहा,‘‘ऐसा करो बेटा!तुम ये सारे खिलौने मेरे हाथ बेच दो।मैं तुम्हें इन सारे खिलौनों के बदले में एक हजार रूपये दूंगा।                 एक हजार रूपये------ सुनकर गोविन्द की आंखें आश्चर्य से खुली रह गयीं।उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह आदमी इतने थोड़े से खिलौनों के लिए एक हजार रूपये दे सकता है।गोविन्द ने मोटे आदमी से पूछा, ‘‘आप सचमुच एक हजार रूपये देने की बात कर रहे हैं या मजाक कर रहे हैं ?
                        ‘‘भला मैं क्यों मजाक करूंगा ? अरे तुम्हें खिलौना बेचना है तो मुझे अभी दे दो और तुम यहीं बैठो।पास में ही मेरा घर है वहां जाकर मैं अभी एक हजार रूपये लेकर आता हूं। मोटे आदमी ने गोविन्द से कहा।
                        गोविन्द मोटे आदमी के बहकावे में आ गया। उसकी आंखों के सामने एक हजार रूपये के नोट नाच उठे।उसने सोचा चलो ठीक है मैं यहीं थोड़ी देर इसका इन्तजार करता हू।यह आदमी अभी घर से एक हजार रूपये लेकर आ जाएगा।मेरे पिता जी जब एक हजार रूपये देखेंगे तो वे कितने प्रसन्न होंगे।यह सोचकर गोविन्द ने अपने सारे खिलौने उस आदमी को दे दिए और उससे बोला, ‘‘बाबू जी! आप रूपये लेकर जरा जल्दी आइएगा।क्योंकि मुझे अभी बहुत दूर वापस जाना है।
                        मोटे आदमी ने हॅसते हुए कहा, ‘‘हां! हां! बेटा!मैं बस पन्द्रह मिनट में वापस आ जाऊंगा।लेकिन जब तक मैं वापस न आऊं तुम यहीं बैठे रहना और एक हजार रूपये वाली बात किसी से कहना मत।
                        इतना कहकर मोटा आदमी गोविन्द के सारे खिलौने लेकर वहां से चला गया। इसके बाद गोविन्द वहां बैठकर मोटे आदमी के वापस आने का इन्तजार करने लगा।गोविन्द को वहां बैठे-बैठे करीब बीस मिनट बीत गये और वह आदमी अभी तक वापस नहीं आया। गोविन्द को थोड़ी चिन्ता होने लगी।उसने सोचा कहीं ऐसा तो नहीं कि वह आदमी मुझे धोखा देकर चला गया। फिर उसने सोचा थोड़ी देर और देख लूं तब किसी से उसके बारे में पूछूं। इसके बाद गोविन्द करीब एक घन्टे तक वहां बैठा रहा पर मोटे आदमी को न वापस आना था न वह वापस आया।गोविन्द वहीं बैठकर रोने लगा।जब बाजार के दूसरे दूकानदारों ने उसके रोने का कारण पूछा तो गोविन्द ने रोते-रोते अपने साथ अब तक घटी घटनाएं उन्हें बता दी। उसकी बात सुनकर एक बूढ़े दूकानदार ने गोविन्द को डाटते हुए कहा, ‘‘अरे बेटा! पहली गलती तो तूने यह की, कि रास्ते में आलस्य करके सो गया और तेरे सारे खिलौने बन्दर ने तोड़ दिए।उसके बाद भी तेरी अक्ल ठीक नहीं हुई और तूने यहां आकर एक अन्जान आदमी पर विश्वास कर लिया।और एक हजार रूपये के लालच में अपने सारे खिलौने उसे दे दिए।  बेटा वह आदमी तो बहुत बड़ा ठग है।इस बाजार में बहुत से दूकानदारों को वह अब तक धोखा दे चुका है।
                        बूढ़े आदमी की बात सुनकर गोविन्द जोर-जोर से रोने लगा।उसे अपने पिता जी की बतायी बातें याद आने लगीं।उसे दुःख हो रहा था कि अगर उसने अपने पिता जी की बातें मान ली होती तो इतना नुकसान न होता।गोविन्द को रोते देखकर उस बूढ़े आदमी को दया आ गई।उसने अपने पास से कुछ रूपये निकालकर गोविन्द को दे दिए और उससे बोला, ‘‘बेटा! अब यहां खड़े होकर रोने से कोई फायदा नहीं होगा।तुम ये रूपये लेकर अपने घर वापस चले जाओ।लेकिन आगे से ध्यान रखना कि कभी किसी काम में आलस्य मत करना और अपने माता-पिता की बतायी बातों को हमेशा ध्यान में रखना।
                        गोविन्द को बड़ा पश्चाताप हो रहा था।वह बूढ़े आदमी से रूपये लेकर अपने गांव की तरफ वापस चल पड़ा और उसने निश्चय किया कि अब वह हमेशा अपने माता-पिता की सलाह मानेगा और किसी काम में आलस्य नहीं करेगा।
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डा0हेमन्त कुमार

4 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (24-01-2015) को "लगता है बसन्त आया है" (चर्चा-1868) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    बसन्तपञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. वाह क्या बात है ........बहुत बढ़िया कहानी! आभार पढवाने के लिए!

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