शनिवार, 2 मई 2015

लेख--छिपकली के नाना ......।

पृथ्वी कब और कैसे बनीइस विषय पर पूरे संसार के वैज्ञानिको ने बहुत खोज की है।और आज भी कर रहे है।ज्यादातर वैज्ञानिक यह मानते हैं कि पृथ्वी की रचना सूर्य से हुई है।सूर्य में से कुछ गैसों और धूल के बादल निकल कर अलग हो गये। इन्हीं गैसों और धूल के समूह से हमारी इस पृथ्वी का निर्माण हुआ।
                        पृथ्वी पर जीवन के शुरू होने की कहानी ही बहुत पुरानी है लगभग 57 करोड़ साल पुरानी। इसीलिए उस युग को प्रागैतिहासिक काल कहा गया।प्रागैतिहासिक काल में हमारी पृथ्वी पर तरह-तरह के भयंकर जीव जन्तु मिलते थे। आज वे जानवर पृथ्वी पर नहीं है। लेकिन कहीं-कहीं उनके पदचिन्ह, कंकाल या चट्टानों में दबे अंडे मिल जाते हैं, जिससे उनके पृथ्वी पर होने की जानकारी हमें मिलती है। यहाँ हम उन्हीं प्रागैतिहासिक जीवों में से कुछ के बारे में आपकों बता रहे हैं।
                                

v  डायनासोर:- डायनासोर ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है भंयकर छिपकली।  आज से लगभग बीस करोड़ साल पहले पृथ्वी पर रेंगने वाले जीवों का साम्राज्य था। उस युग को वैज्ञानिकों ने मिसोजोइक काल नाम दिया है।उसी युग में विशालकाय भयंकर डायनासोरों की पैदाइश हुई। इन डायनासोरों में कुछ का आकार तीन चार मंजिले मकानों जैसा विशाल था और कुछ साधारण पक्षियों के आकार के थे। कुछ भयंकर मांसाहारी होते थे तो कुछ विशुद्ध शाकाहारी।
v  टाइरेनोसारस:- टाइरेनोसारस मांसाहारी डायनासोरों में सबसे बड़ा और शक्तिशाली था।इसकी लंबाई लगभग 15 मीटर, ऊँचाई 6 मीटर तथा वजन 7 टन के आसपास होता था। विशाल जबड़े और सिर वाला यह जन्तु अपनी बिरादरी के अन्य जन्तुओं की तुलना में काफी अधिक बुद्धिमान था। यह अपने भयंकर दांतों से मोटी से मोटी हड्डी चबा जाता था।इसकी पिछली टांगों मे लंबे और तेज नाखून होते थे।इतना विशाल आकार और वजन होने के बावजूद यह तेजी से दौड़ता और कभी-कभी छलांगें भी लगाता था।
v एलोसारस:- एलोसारस जुरासिक काल का सबसे भयंकर मांसाहारी डायनासोर था।इसकी भी लंबाई लगभग 12 मीटर थी और वजन 12 टन।और इसके दांतों की लम्बाई तो पढकर ही आपकी रूह फना हो जाएगी।अपने 15-15 से0मी0 लंबे पैने दांतों और नाखूनों की सहायता से यह बड़े जीवों को चीर डालता था।
v  स्टैगोसारस:- डायनासोरों में मांसाहारी की तरह शाकाहारी भी थे। लेकिन इनका भी आकार प्रकार या वजन मांसाहारियों से कम नहीं होता था। अब स्टैगोसारस को ही लीजिए। इसकी लंबाई थी लगभग नौ मीटर और वजन 10 टन। लेकिन इतने विशालकाय जीव के मस्तिष्क या दिमाग  का वजन जानते हैं कितना था।मात्र 85 ग्राम यानी लगभग एक अखरोट के आकार का।
            स्टैगोसारस के शरीर की बनावट बड़ी आकर्षक थी। इसके शरीर पर एक किनारे से दूसरे किनारे तक हड्डियों की दुहरी प्लेटें होती थी।जो देखने में ढालों की तरह लगती थीं। इसकी पूंछ पर नुकीले सींगों की तरह चार बडे-बड़े कांटे होते थे। अपने शरीर की इसी अजीबो गरीब बनावट के कारण यह सीधा सादा शाकाहारी जंतु अपने मांसाहारी दुश्मनों से बच जाता था।

v डिप्लोडोकस:- अभी तक पृथ्वी पर मिले डायनासोरों के कंकालों से यह बात पता चली है कि डिप्लोडोकस अब तक का सबसे भारी भरकम शाकाहारी जन्तु था। इसका शरीर लगभग 28 मीटर लंबा था और वजन लगभग 10 टन। उसके शरीर के अनुपात में गर्दन और पूंछ बहुत लंबी होती थी। यह अपनी चारों टांगों से चलता था। मुंह का आकार बहुत छोटा होने के कारण ही शायद इसे पेड़ पौधे खाना पड़ता था।
v प्लैसियोसारसः-प्लैसियोसारस समुद्र में रहता था। इसका शरीर कछुए की तरह और गर्दन सांपों की तरह लम्बी होती थी । इसकी लम्बाई होती थी 12 मीटर । यह चप्पू  जैसे पैरों से पानी में तैरा करता था। यह अपने जबड़े के अंदर मौजूद तेज नुकीले दांतो से शिकार व अपनी रक्षा करता था ।

v डाइमेट्रोडोनः-डायनासोरों के अलावा प्रागैतिहासिक काल में एकाध ऐसे भी जन्तु थे जिनमें  स्तनपाइयों के लक्षण मिलते थे। ऐसे ही एक जन्तु डाइमेट्रोडोनके कंकाल अमेरिका की परामियन युग की चट्टानों में मिलें थे ।
                        विचित्र बनावट वाले इस जन्तु की लंबाई लगभग 3 मीटर थी।  इसके दांत तो स्तनपाइयों की तरह थे पर इसकी त्वचा सरीसृपों की तरह थी। इसकी पीठ पर पूरी रीढ की लम्बाई में नावों के पाल जैसी एक विचित्र झिल्ली मढी रहती थी।यह इसकी त्वचा का ही एक अंग थी।यह विचित्र झिल्ली इसके लिए एयरकंडीशनर का काम करती थी।यह झिल्ली उसके शरीर के तापमान को नियंत्रित करने, धूप, या हवा से उसे बचाने के लिए आवश्यक दिशा में झुक जाती थी।भयंकर दांतो वाला यह जन्तु भी मांसाहारी होता था।
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डा0 हेमन्त कुमार

2 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा है। अच्चों के लिए उपयोगी बढिया जानकारी।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (04-05-2015) को "बेटियों को सुशिक्षित करो" (चर्चा अंक-1965) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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