गुरुवार, 18 मई 2017

कहां खो गए गीत

बांसों के झुरमुट से वंशी,
झरनों का कलकल संगीत,
सूना जंगल पूछे हमसे,
कहां खो गए मेरे गीत।

धरती पर से घटता क्यूं जल,
दूर दूर ना दिखते बादल,
बारिश भी तो पूछे हमसे,
कहां खो गए मेरे गीत।

कंकरीट के जंगल बीच,
गौरैया की सूनी आंखें,
पाखी सारे पूछ रहे हैं,
कहां खो गए मेरे गीत।

सूनी घाटी सूने पर्वत,
पूछ रहे पेड़ों के ठूंठ,
क्या गलती कर दी थी हमने,
कहां खो गए सबके गीत।
000000


डा0हेमन्तकुमार

3 टिप्‍पणियां:

  1. समय की माँग, अति सुन्दर।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (21-05-2017) को
    "मुद्दा तीन तलाक का, बना नाक का बाल" (चर्चा अंक-2634)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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