शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

नन्दू की समझदारी(भाग -२)

नन्दू की समझदारी
(गीतात्मक कहानी)

घर के बाहर दिखा जो पिल्ला
प्यारा सुन्दर झबरा पिल्ला
भूल गया दुख सारे नन्दू
दौड़ के गोद में ले लिया पिल्ला।

पिल्ला ले घर पहुंचा नन्दू
दौड़ के मां से रोटी लाया
फ़िर पिल्ले को गोद में ले के
लगा खिलाने रोटी नन्दू।

रोटी दाल खिला पिल्ले को
लगा सोचने बैठ के नन्दू
क्या रक्खूं मैं इसका नाम
मोती शेरा या फ़िर चन्दू ।

मोती कहकर लगा बुलाने
प्यारे पिल्ले को फ़िर नन्दू
सुबह शाम संग मोती के ही
खेला करता अपना नन्दू।
( शेष अगले अंक में )
००००००००००००
हेमंत कुमार



4 टिप्‍पणियां:

  1. wow bahut sunder! bachpan yaad aa gaya.... aapse inspire hokar bachcho ke liye kikhne ka mera bhi man karne laga hai

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  2. मोती इतना प्यारा है कि उसके साथ हर किसीको खेलने का मन करेगा! मैं तो आपकी कहानी पढ़कर अपने बचपन के दिनों में लौट गई! बचपन का समय..क्या दिन थे वो जो अब यादें बनकर रह गई!

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