शनिवार, 14 नवंबर 2009

फरियाद


काली कोट में लाल गुलाब,
चाचा तुमको करते याद,
बाल दिवस हम संग मनायें,
बस इतनी सुन लो फ़रियाद।

बचपन क्यों अब रूठा रहता,
हर बच्चा क्यों रोता रहता,
आओ चाचा नेहरू आओ,
सारे जहां को तुम बतलाओ।

खेल खिलौने साथ छीन कर,
क्यूं सब हमें रुलाते हैं,
भारी बस्तों और किताबों,
में हमको उलझाते हैं।

क्या हमने कुछ गलत किया है,
जिसकी हमको सजा मिली है,
प्यारे थे सब बच्चे तुमको,
सुन लो इनकी ये फ़रियाद।

आओ चाचा नेहरू आओ,
जन्म दिवस हम संग मनाओ।
000
पूनम

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचना में भाषा का ऐसा रूप मिलता है कि वह हृदयगम्य हो गई है।

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  2. हँस लें चाहे कितना भी, पर
    कमी आपकी खलती है !
    मन के कोमल कोने में जो
    बनकर दर्द सिसकती है !!

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  3. सुन्दर रचना!
    इसकी चर्चा यहाँ भी है-
    http://anand.pankajit.com/2009/11/blog-post_15.html

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  4. बचपन क्यों अब रूठा रहता,
    हर बच्चा क्यों रोता रहता,

    Sundar bal rachna ke liye badhai.
    Aaj bachhon ka bachpan lagta hai jaise unse bahut door ho chala chai, unhe samay se pahle hi bada samjhane ki jo kavayad chali hai, yah sochniya hai.

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