बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

बालगीत

बन्दर जी की चिंता
कंप्यूटर पर बैठे देखो
अपने प्यारे बन्दर जी
गूगल सर्च पे क्लिक किया
और लगे ढूँढने जंगल जी।

पूरब ढूँढा पश्चिम ढूँढा
उत्तर दक्खिन घूमे जी
दुनिया का हर कोना ढूँढा
नहीं मिला पर जंगल जी।

चिंता हुयी उन्हें फ़िर भारी
पायें कहाँ चुकंदर जी
कट जायेंगे जंगल सारे
रहें कहाँ सब बन्दर जी।
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हेमंत कुमार

3 टिप्‍पणियां:

  1. Respected Hemant Ji,
    bahu achchha bal geet .badhai
    main bhee bachchon kee kavitayen kabhee kabhee likhtee hoon.kya unhen FULBAGIYA blog ke liye bhej saktee hoon?

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  2. बहुत सुन्दर रचना है बच्चों को पशु प़क्षियों से प्रेम करना सिखाती हैं ऐसी कविताये बधाई

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  3. bandar ji ki चिंता बिलकुल नए रूप में प्रस्तुत की है
    कंप्युटर के इस युग में इस तरह की चिंता भी जरूरी है
    बालगीत सचमुच बहुत ही अच्छा है
    बधाई
    अरविन्द राज
    शाहजहांपुर U.P.

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